भारत में 2014 के बाद अगर कोई विवाद सबसे ज्यादा मीडिया के नजरों में रहा है तो वह है ‘अयोध्या मामला’। कुछ लोगों का कहना है कि बीजेपी ने सत्ता में आने के लिए इस विवाद को उछाला और एक नई हवा दी और बीजेपी की सरकार बनने के बाद से यह मामला भी पूरी तरह से सरकार के आस-पास ही घूमता रहा। लेकिन कभी इस पर खुलकर फैसला नहीं हो सका।

कई बार इस पर लोगों ने विरोध भी किया लेकिन यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर राजनीतिक पार्टियां अपनी वोट की ‘रोटियां’ शुरु से सेंकती आ रही है. कोई करे भी तो क्या करे आखिर यह मुद्दा राजनेता जैसे दुकानदारों की दुकान चलाने के लिए एक अहम हथियार जो बन गया है।

खैर, 2014 से लेकर अभी तक इस मामले में कई परिवर्तन देखने को मिले। लोकसभा चुनाव के नजदीक होने से सरकार भी इस मामले का पूर्ण रुप से समाधान करना चाहती है। इसी सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मध्यस्थता को सौपने का फैसला किया है। सरकार द्वारा जिन तीन सदस्यों को मध्यस्थता के लिए नियुक्त किया गया है उनमें जस्टिस फकीर मोहम्मद कलीफुल्ला (रिटायर्ड), आध्‍यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्‍ठ वकील श्रीराम पंचू को शमिल किया गया है।

आइए जानते है कि ये कौन हैं जिनके उपर इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौपी गई है। कहा जा रहा है कि हिन्दु और मुस्लिम पक्षों के द्वारा कही गई बातों को ध्यान से सुनने के बाद ये कमेटी अपनी बात सुप्रीम कोर्ट के सामने रखेगी।

जस्टिस फकीर मोहम्मद कलीफुल्ला 

जस्टिस कलिफुल्ला। फोटो सोर्स: गूगल

जस्टिस फकीर मोहम्मद कलीफुल्ला का जन्म 23 जुलाई 1951 को कराइकुडी शिवगंगाई जिला, तमिलनाडु में हुआ था। मोहम्मद कलीफुल्ला को इस कमिटी का चेयरमैन बनाया गया है। 20 अगस्त 1975 को वकालत शुरु किया और फिर टी एस कंपनी की लॉ फर्म में श्रम कानून का अभ्यास शुरु किया। इनकी मेहनत औऱ इमानदारी को देखते हुए 2 मार्च 2000 को मद्रास उच्च न्यायालय का न्यायाधिश बना दिया गया। इनके जीवन में काफी उतार चढ़ाव के बाद जब यह फरवरी 2011 में जम्मू और कश्मीर के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधिश के रुप में कार्यभार लिया तब उन्होने कहा था,

‘अगर कार्यों में इमानदारी हो तो हर बड़ा से बड़ा लक्ष्य छोटा नज़र आने लगता है’।

इनका सफर यहीं नहीं थमा, 22 जुलाई 2016 को को ये भारत के सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हुए। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया के लिए इन्होंने जस्टिस लोढ़ा के लिए भी काफी काम किया है।

श्रीराम पंचू

श्रीराम पंचू। फोटो सोर्स: गूगल

वैसे तो श्रीराम पंचू एक वरिष्ठ वकिल है लेकिन साथ ही साथ यह मध्यस्थता को सेवाएं प्रदान करने वाले मध्यस्थता के मंडल को भी चलाते हैं। इन्हें बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा ‘इंडिया डे’ अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। अगर इनके अनुभव की बात करें तो यह पहली बार नहीं है जब यह किसी कमेटी में मध्यस्थता के रुप में नियुक्त किए गए है इसके पहले भी इनहोंने असम-नागालैंड सीमा विवाद को सुलझाया था। मुंबई में पारसी कम्युनिटी के पब्लिक डिस्प्युट में भी मध्यस्थता निभा चुके हैं। पंचू मध्यस्थता के उपर दो किताबें भी लिख चुके हैं। -इन्होंने कई इंटरनेशनल कॉमर्शियल डिस्प्युट में भी मध्यस्थता की जिम्मेदारी निभाई है।

क्या है असम-नागालैंड सीमा विवाद

यह विवाद नागा विद्रोहियों द्वारा दो छात्रों को छुड़ाने के लिए शुरु हुआ। बताया जाता है कि एक जमीन को लेकर विवाद शुरु हुआ औऱ फिर यह हिंसा में बदल गया। दरअसल, असम और नागालैंड सीमा के बीच के एक जमीन पर आदिवासी सामा खेती करना चाहता था। वहीं लोथा का कहना था कि वहां पर वो खेती करेगा। फिर इन दोनों के बीच बवाल शुरु हुआ और फैसला हुआ कि इस पर ना ही घर बनेगा और ना ही खेती होगी क्योंकि यह सीमावर्ती क्षेत्र है। मामला शांत होता कि 12 अगस्त को एक बात सामने आई कि नागा ने एक छात्र को गोली मार दी और दो घायल हो गए जिसके बाद दोनों पक्षों में जमकर झगड़ा हुआ घर जलाए गए औऱ फिर 12-13 अगस्त को नागा विद्रोही ने असम के कई इलाकों में घुसकर कई घरों को जला दिया और साथ ही 14 गांव वालों को मार दिया। जिसके बाद यह विवाद शुरु हो गया था।

श्री श्री रविशंकर

श्री श्री रविशंकर। फोटो सोर्स: गूगल

लोगों को जीने और खुश रहने की कला सिखाने वाली संस्था ‘द आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्री श्री रविशंकर के विश्व में लाखों प्रशंसक हैं। विश्व के 151 देशों में इनकी संस्था की ब्रांच है। इसके अलावा इनकी फार्मेसी और स्वास्थ्य केन्द्र भी है। 2017 में इन्होंने योगगुरु बाबा रामदेव की तरह श्री श्री तत्वा ब्रांड नाम से रिटेल बाजार में उतराने की बात कही थी औऱ इस बात की भी पुष्टी की थी कि उनके नाम के ब्रांड श्री श्री समर्थकों के बीच पहले से ही मौज़ुद है। दो सालों में 1000 फ्रेंचाइजी स्टोर खोलने की बात कहने वाले श्री श्री रविशंकर आज 1000 करोड़ रुपये के मालिक हैं। श्री श्री रविशंकर ने इसके पहले भी इस मामले में मध्यस्थता के लिए अपनी रुचि ज़ाहिर की थी और कई बैठक में भाग लेकर इसका प्रयास भी किया था।

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