अगर आपका हिन्दी साहित्य या उर्दू अदब से ज़रा भी तअल्लुक है तो आपने बच्चन साहब की “मधुशाला” की रुबाइयाँ कहीं न कहीं ज़रूर पढ़ी या सुनी होंगी। मधुशाला हर उस मसअले और समाज के हर उस पहलू पर बात करती है जो हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में देख रहे होते हैं, लेकिन कहने की या तो जुर्रत नहीं करते या हमें लफ्ज नहीं मिलते।
बच्चन साहब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अँग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर थे और मधुशाला के बाद मिली ख्याति ने उन्हें अदबी हल्कों के बड़े नामों की फेहरिस्त मे शामिल कर दिया था। बच्चन साहब हिन्दी साहित्य की “नई कविता” विधि के शुरुवाती कवियों में से एक थे।
इसके सिवा उन्होंने तमाम अँग्रेजी साहित्य के नाटकों का हिन्दी में बेहतरीन अनुवाद किया और उनके खुद के कई काव्यसंकलन भी छपे, माशूकलश, खय्याम की मधुशाला उनकी बेहतरीन किताबों में से हैं।
आज की कविता में आज पढ़िये बच्चन साहब की कविता “रात आधी खींच कर मेरी हथेली

रात आधी खींच कर मेरी हथेली

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग इस संसार में
है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर।
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अंधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने
पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ।
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली

हरिवंशराय बच्चन