महिलाओं को कई हज़ारों सालों से पितृसत्तात्मक समाज द्वारा दबाया गया. लेकिन अब स्थिति बदल रही है. महिलाएं अपने अधिकारों और अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठा रही हैं लेकिन आज़ादी इतनी आसानी मिल जाने वाली चीज़ नहीं है. विश्व भर में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए आवाज़े उठ रही हैं और कैम्पेन चल रहे हैं लेकिन सफलता अभी दूर नज़र आती हैं.

ईरान में मानवाधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रही महिला नसरीन सोतौदेह को सज़ा सुनाई गई है.

नसरीन सोतौदेह. फोटो सोर्स-गूगल

नसरीन सोतौदेह ईरान में हिजाब का विरोध करने के लिए जानी जाती हैं. पेशे से वकील हैं. ईरान में इन्हें 148 कोड़े मारने और 38 साल जेल की सज़ा सुनाई गई है. उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा को खिलाफ लोगों को इकट्ठा करने और नेता का अपमान करने के जुर्म में यह सज़ा सुनाई गई है.

ईरान में महिलाओं की जो हालत है वो जग-जाहिर है. नसरीन ईरान में रहने वाली महिलाओं के हिजाब पहनने के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थी. वहां के महिलाओं का हिज़ाब पहनना अनिवार्य है.

नसरीन के पति ने फेसबुक पर लिख कर लोगों को सज़ा के बारे में जानकारी दी. उन्होने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा कि नसरीन को 33 साल की जेल, 148 कोड़ो की मार और 5 साल कारावास की सज़ा सुनाई गई है.

नसरीन सोतौदेह. फोटो सोर्स-गूगल

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसकी आलोचना करते हुए कहा है कि नसरीन ने महिलाओं के अधिकारों के लिए खुद को समर्पित किया है. मानवाधिकार के कार्यों के खिलाफ ईरान प्रशासन का सज़ा सुनाना बहुत क्रूर है.

इससे पहले भी नसरीन को जेल भेजा जा चुका है. यूरोपियन पार्लियामेंट से सखारोव पुरस्कार पाने वाली नसरीन को जून 2018 में गिरफ्तार किया गया था और इविन जेल में रखा गया था. नसरीन के वकालत करने पर और देश छोड़कर जाने पर 20 साल तक रोक लगाई गई है. उन्हें देश की सुरक्षा के खिलाफ काम करने, मानव अधिकार सेंटर का मेंबर होने के लिए दोषी करार दिया गया है. जिस सेंटर से नसरीन जुड़ी थी वो मानवाधिकारों के लिए काम करता था जिसकी मुखिया नोबेल प्राइज़ विजेता शिरीन इबादी है.

ये बिलकुल गलत है. जब कोई महिला खिलाड़ी किसी खेल में हिजाब पहनकर विजेता बनती है तो वो आकर्षण का केंद्र भी होती है और तारीफ का विषय भी. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा कर के वह आपके धर्म का नाम ऊंचा करती है. तब वो लड़की आपके हिसाब से बिलकुल सही होती हैं क्योंकि वो एक पुरुषवादी सोच के हिसाब से एक आदर्श नारी बन जाती है. लेकिन अगर वही खिलाड़ी हिजाब उतारकर खेलना चाहती है तो आप उसे क्यों नहीं खेलने देना चाहते हैं? धर्म के आड़ में महिलाओं के अधिकारों का हनन क्यों? धर्म के नाम पर महिलाओं को कब तक गुलाम बना कर रखा जाएगा ? महिलाओं पर इतनी पाबन्दियाँ लगाने से पहले आपको यह समझ में आना बहुत जरूरी है कि उन्हें भी ठंड लगती है, गर्मी लगती है, दर्द होता है, खुशी होती है. महिला को एक मांस के लोथड़े के बजाय अगर हम उन्हें अपने जैसा ही इंसान समझें तो शायद आप उनकी मुश्किलों को समझ पाएंगे।

नसरीन को सज़ा दिया जाना इस समाज की बौखलाहट है और उसका डर है एक महिला का किसी पुरुष के बराबरी में आने का.

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