दिल्ली रेलवे स्टेशन से महज 500 मीटर की दूरी पर एक गली, जिसे जीबी रोड के नाम से जाना जाता है। जहां सड़क के दोनों किनारे अपनी मजबूरी लिए महिलाएं खड़ी रहती हैं। हमारा समाज इन महिलाओं को वेश्या की संज्ञा देता है। इन गलियों से होकर गुजरना हर किसी को अपने आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाने जैसा लगता है। जो लोग दिन के उजालों में इन गलियों से गुजरने मे कतराते है वही लोग अपनी रात रंगीन करने इन गलियों में आते हैं। बात रात को रंगीन करने तक ही सीमित होती तो कोई बात नहीं लेकिन इन गलियों में रहने वाली महिलाओं को इंसान ऐसी नज़रो से देखते है जैसे गिद्ध की निगाह सड़े मांस को घूर रहे हों।

इस वक्त इन गलियों की बात करना इसलिए भी ज़रुरी है क्योंकि लोकसभा चुनाव के आते ही सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता गलियों से होकर सड़को तक घूमकर वोट मांगने के लिए जाते है। लेकिन क्या दिल्ली की इस ‘बदनाम गली’ में भी कोई आता है, इन महिलाओं से वोट देने की अपिल करने?  इस सवाल पर जवाब देना थोड़ा अटपटा लगेगा लेकिन सवाल इसलिए भी पूछना पड़ रहा है क्योंकि आजकल जिस दिल्ली पर लोग जान लूटा रहे हैं, शाम होते ही उसी दिल्ली की इन गलियों में जाने कितनी जानें लूटी जाती हैं।

यहां की महिलाएं जो रोज किसी ना किसी की रात को रंगीन बनाने को मजबूर होती है। उनलोगों से मतदान को लेकर बात की गई कि क्या वे वोट देंगी तो उनका कहना था कि वोट तो वो देंगी लेकिन चुनाव में कोई जीते उनकी ज़िन्दगी नहीं बदलने वाली है। क्योंकि आजतक कोई भी नेता चाहे वो किसी भी पार्टी को हो ये आकर जानने की कोशिश नहीं करता कि आखिर हम ऐसा धंधा क्यों कर रहे हैं? कोई तो मजबूरी रही होगी। अब जिस धंधे को पहले ही गलत मान लिया गया हो भला उसपर कैसे ध्यान दिया जाए?

जीबी रोड, नई दिल्ली, फोटो सोर्स: गूगल

अब सवाल ये है कि सेक्स वर्कर की जिंदगी तो जैसे-तैसे चल रही है लेकिन जिस तरह से भेदभाव इनके साथ किए जा रहे हैं उसका असर इनके बच्चों पर देखा जा सकता है। आज इनके बच्चे शिक्षा के आभाव में और समाज से बेइज्जती पाने को मजबूर है। लेकिन यह समाज जिसे हम और आप काफी इज्जतदार मानते हैं। इसी समाज के कुछ दरिंदे इसमें रुकावट डालने के किसी मौके को नहीं छोड़ना चाहते हैं। आसपास रह रहे लोगों के बीच जीबी रोड का नाम आते ही कई तरह की तस्वीरें सामने आ जाती है लेकिन जीबी रोड इलाके में कई सालों पुरानी इमारतें जर्जर जैसे-तैसे होकर खड़ी हैं। जहां पहचान अंधेरी सुरंगों में बंद है। रहने वाले न ही अपना नाम बता सकते है और न ही अपना चेहरा किसी को दिखा सकते हैं।

इस इलाके में रहने वाले लोगों को भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिस पर आज तक न ही किसी पार्टी के नेता ने एक्शन लिया और न ही पुलिस ही कुछ कर पाती है। सत्ता में पार्टी के बदलने का असर पूरे देश में देखने को मिलता है लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली में होने को बावजूद यह इलाका और यहां रहने वाले लोग ख़ासकर सेक्स वर्कर उस बदलते तस्वीर से बिल्कुल अलग हैं।

जीबी रोड , नई दिल्ली, फोटो सोर्स: गूगल

इस लेख को लिखने का एक मात्र उद्देश्य यह है कि देश को मजबूत लोकतंत्र प्रदान करने में इन सेक्स वर्कर का भी उतना ही हाथ है जितना की आम जनता का। फिर भी भेदभाव के जंजिरों में जकड़े इन सेक्स वर्कर को कब न्याय मिलेगा? कब  इन्हें आम लोगों की तरह समाज में देखना शुरु किया जाएगा? क्या इसके लिए कोई राजनीतिक पार्टी पहल नहीं करेंगी या फिर इनके लिए कोई संविधान में संशोधन करने के लिए इंतजार किया जा रहा है? चुनावी रंग में रंगे कुछ राजनेता बस उन्हीं मुद्दों को फोकस करते हैं जिन से अधिक से अधिक जनता को प्रभावित किया जा सके।

सबसे दु:ख की बात है कि सेक्स वर्कर को अगर किसी ने समाज से अलग करने की कोशिश की है तो ये वही लोग है जिनकी राते यहीं के कोठियों में हसीन होती है। खैर, आज चुनाव महापर्व की शुरुआत हो चुकी है इसलिए इस बात को भी समझना चाहिए कि अगर हम लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए वोट कर रहे है तो जरा समाज की सोच को भी मजबूत करने के लिए कोई पहल की जाए जिससे ऐसे मजबूर लोगों को भी समाज में इज्ज़त मिल सके। ये महिलाएं हमारे ही समाज के बीच से उपजी हैं और ये हमारी और हमारे देश की ज़िम्मेदारी है कि हम इनकी ज़िंदगी बेहतर करें।

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