साहिर लुधियानवी. उर्दू शायरी का एक बड़ा नाम. जिन्हे अमृता ने प्यार किया, जिनकी गज़ले फिल्मी दुनिया के मशहूर गीतों में शामिल हैं. जिनकी शायरी आज भी लोगों को ब्लैक एंड वाइट ज़माने के रंगीन पलों की झलक दिखाती है.
जंग के माहौल में एक शायर क्या चाहता है. अपनी इस रचना में साहिर ने वही बखूबी बयां किया है. आज की कविता में पढ़िए साहिर लुधियानवी की ये नज़्म. जो जंग की मांग नहीं करती जंग टलने की बात करती है

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है
इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।

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