जब-जब देश में चुनाव आते हैं देश की राजनीति एक अलग ही रूप ले लेती है. सब कुछ थोड़ा ज़्यादा हो जाता है. राजनीतिक बहसें, आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति और नेताओं की नौटंकी. भारत की राजनीति में बड़े महान-महान नेता हुए हैं. ऐसे नेता जिन्हें देख कर लगता है कि राजनीति से अच्छा अगर ये कॉमेडी करते तो शायद जनता का थोड़ा भला हो जाता, क्योंकि ऐसे नेता जनता के लिए काम तो करते नहीं है लेकिन मनोरंजन के लिए फुल नौटंकी कर देते हैं.

चुनाव के मौसम में जिस चीज़ को लेकर सबसे ज़्यादा हल्ला होता है वो है टिकटों के वितरण का. नेता टिकट पाने की खूब कोशिश करते हैं. मिल जाती हैं तो “बल्ले बल्ले” वर्ना “ये पार्टी ये महफिल मेरे काम की नहीं”

कुछ नेता टिकट न मिलने से इतने रूष्ट हो जाते हैं कि बागी रूख अपना लेते हैं. पार्टी छोड़ निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं और पार्टी के लिए मुश्किल बन जाते हैं. एक ऐसे ही नेता महाराष्ट्र में हुए हैं जिन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट नहीं मिला तो उन्होने अपने पार्टी ऑफिस की कुर्सियां उठवा ली.

 


कांग्रेस के विधायक अब्दुल सत्तार लोकसभा टिकट कटने से इतने नाराज़ हुए कि उन्होने समर्थकों के साथ जाकर मंगलवार को पार्टी के कार्यालय जाकर वहां से 300 कुर्सियां उठवा ली. अपनी नाराज़गी दिखाने का सत्तार जी ने ये अनोखा तरीका अपनाया.

अब्दुल सत्तार को इस बात की पूरी उम्मीद थी आने वाले लोकसभा चुनावों में उन्हें औरंगाबाद से टिकट दिया जाएगा. लेकिन पार्टी ने विधानपरिषद सदस्य सुभाष झंबाद को टिकट दे दिया. जिससे नेता जी आग-बबूला हो गए और जब कुछ नहीं कर पाए तो पार्टी कार्यालय से कुर्सियां ही उठवा लाए.

जब मीडिया ने सत्तार जी कुर्सियों के उठा लाने के लेकर सवाल किया तो उन्होने कहा- “मेरा सामान था तो मेरा ले जाना सही है”

बहुत सही नेता जी! सरकार वाली कुर्सी न मिली तो प्लास्टिक की कुर्सी ही सही। बस तशरीफ़ टिकाने से मतलब है।

देश की राजनीति में इस समय इस तरह की ही उतल-पुथल बची हुई है. टिकट न मिलने से नेता आपनी नाराज़गी को खुलकर उजागर कर रहे हैं. कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़ रहे हैं, कुछ टिकट के लालच में दूसरी पार्टियों में जाकर शामिल हो रहे हैं.

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