चुनाव में कुछ ही दिन शेष रह गए है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी रण के लिए बिगुल फुंक दिया है। इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि राजनीतिक पार्टियों का आपस में सामंजस्य नहीं हो पा रहा है तो वहीं कुछ पार्टियां सीटों के बँटवारे में फंसी पड़ी हैं। इस बार अगर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में चुनाव को लेकर कई तस्वीरें सामने आई हैं। जहां एक तरफ महागठबंधन की तस्वीर बदली है तो वहीं राजनीति में अपनी पारी की शुरुआत कर प्रियंका ने सपा औऱ बसपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। इस बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जो कि बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। यह मामला है दलितों के खिलाफ़ अपराध का।

उत्तर प्रदेश में जब से योगी सरकार सत्ता में आई है तो उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के बड़े-बड़े वादे किए गए। इसके लिए कई सारी रणनीतियां भी बनी जो कि जगजाहिर हैं। चाहे वो एंटी रोमियों स्क्वायड का हो या फिर योगी आदित्यनाथ के अनुसार उत्तर प्रदेश में चल रहे गुंडागर्दी का। लेकिन इन सबके बीच दलितों के खिलाफ हो रहे अपराध को नजरअंदाज कर दिया गय़ा। जब इस बारे में मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंडिया ने एक सर्वे किया तो पाया गया कि पूरे देश में अगर सबसे ज्यादा किसी राज्य में दलितों को सताय़ा जा रहा है तो वह उत्तर प्रदेश है।

योगी आदित्यनाथ। फोटो सोर्स: गूगल

रिपोर्ट में जो बातें निकलकर सामने आई हैं उसके अनुसार 2018 में 218 घटनाओं के मामले सामने आए हैं। जिसमें 142 मामले दलितों के, 50 मामले मुसलमानों के और आठ-आठ मामले ईसाई और अन्य के खिलाफ हैं। रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि कुल 40 मामले ऐसे है जो यौन हिंसा के हैं और इनमें 30 मामले दलितों के खिलाफ हैं। इस तरह की घटनाओं में उत्तर प्रदेश लगातार तीसरे साल से शीर्ष पर विराजमान है। इसके पहले 2017 में 50 और 2016 में 60 मामले उत्तर प्रदेश में हुए है। एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख आकार पटेल ने कहा,

‘घृणा अपराध के संबंध में सबसे पहला कदम न्याय सुनिश्चित करना होगा, यह देखना होगा कि कहां सबसे ज्यादा लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। हमारी वेबसाइट पर दिए गए आंकड़े पूरी तस्वीर का बस एक छोटा हिस्सा भर हैं. कई मामलों की शिकायत पुलिस से नहीं की जाती है और जब शिकायत की भी जाती है तो कई बार मुख्यधारा के मीडिया में उसकी जानकारी नहीं आती.’

बताया जा रहा है कि इस तरह के मामलों में शीर्ष पांच राज्यों की अगर बात करें तो उत्तर प्रदेश (57), गुजरात (22), राजस्थान (18), तमिलनाडु (16) औऱ बिहार (14) कथित तौर पर सामने आए हैं। एमनेस्टी इंडिया के इस रिपोर्ट के बाद अब एक बार फिर योगी आदित्यनाथ सवालों के घेरे में घिरते हुए दिखाई दे रहें हैं। अब सवाल यह है कि क्या यही नए भारत का नया उत्तर प्रदेश है?

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स: गूगल

जिस तरह से योगी आदित्यनाथ शहरों के नाम के साथ-साथ रेलवे स्टेशन तक के नाम को बदलने में लगे हैं। एक बार उन्हे दलितों के लिए भी सोचने की ज़रुरत है क्योंकि भीम राव अंबेदकर ने कहा था जिस देश में अगर दलित पिछड़े हुए हैं उस देश का विकास संभव नहीं हैं। अब योगीजी को कौन समझाए कि केवल नाम बदलने से किसी राज्य का या देश का विकास नहीं होता। उसके लिए देश के विकास में एक अहम कड़ी माने जाने वाले दलितों के उपर भी ध्यान देने की ज़रुरत है।

खैर, उत्तर प्रदेश के इस मामले का असर लोकसभा चुनाव पर कितना पड़ने वाला है यह वक्त बताएगा।

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