गोरखपुर में पैदा होने वाले फिराक़ का असली नाम रघुपति सहाय फिराक था. ये शायर और आलोचक होने के साथ-साथ राष्ट्रवादी भी थे. उन को साहित्य अकादमी, ज्ञान पीठ, पद्म भूषण और नेहरू-लैनिन पुरुस्कार आदि सम्मान मिले। फिराक़ उर्दू की दुनिया के एक ऐसे तरीन शायर थे जिन्होने उर्दू से खिलवाड़ किए बिना नए लहज़े में शायरी की. इन्होने शायरी के नए मिज़ाज़ स्थापित किए.

आज उनके जन्मदिन पर पढ़िए उनकी ये दो नज़्मेः

एकः

क़रीब चाँद के मंडला रही है इक चिड़िया
भँवर में नूर के करवट से जैसे नाव चले
कि जैसे सीना-ए-शाइर में कोई ख़्वाब पले
वो ख़्वाब साँचे में जिस के नई हयात ढले
वो ख़्वाब जिस से पुराना निज़ाम-ए-ग़म बदले
कहाँ से आती है मदमालती लता की लिपट
कि जैसे सैकड़ों परियाँ गुलाबियाँ छिड़काएँ
कि जैसे सैकड़ों बन-देवियों ने झूले पर
अदा-ए-ख़ास से इक साथ बाल खोल दिए
लगे हैं कान सितारों के जिस की आहट पर
इस इंक़लाब की कोई ख़बर नहीं आती
दिल-ए-नुजूम धड़कते हैं कान बजते हैं

दोः

ये साँस लेती हुई काएनात ये शब-ए-माह
ये पुर-सुकूँ ये पुर-असरार ये उदास समाँ
ये नर्म नर्म हवाओं के नील-गूँ झोंके
फ़ज़ा की ओट में मर्दों की गुनगुनाहट है
ये रात मौत की बे-रंग मुस्कुराहट है
धुआँ धुआँ से मनाज़िर तमाम नम-दीदा
ख़ुनुक धुँदलके की आँखें भी नीम ख़्वाबीदा
सितारे हैं कि जहाँ पर है आँसुओं का कफ़न
हयात पर्दा-ए-शब में बदलती है पहलू
कुछ और जाग उठा आधी रात का जादू
ज़माना कितना लड़ाई को रह गया होगा
मिरे ख़याल में अब एक बज रहा होगा

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