लोकसभा चुनाव से पहले केन्द्र सरकार अपने एक फैसले के कारण सवालिया निशाने पर आ गई हैं। बताया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी वाली केन्द्र सरकार ने देश के छह एयरपोर्ट्स को राज्यों से बगैर कोई चर्चा किए ही अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड को सौप दी हैं। केन्द्र सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह बिना किसी से चर्चा किए इन सभी एयरपोर्ट्स को अडानी ग्रुप को सौंप दी है। इसके लिए ना ही राज्यों से और ना ही राज्य की जनता से इस बारे में कोई बातचीत की गई है।

गौतम अडाणी। फोटो सोर्स: गूगल

मिली जानकारी के अनुसार अडानी ग्रुप को मिलने वाले छह एयरपोर्ट्स है- लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, जयपुर, अहमदाबाद, गुवाहाटी और मंगलौर।  हालांकि मंत्रालय ने इस बात को स्वीकारा है कि एयरपोर्ट्स को अडानी ग्रुप को सौपने से पहले दो बैठक (27 व 28 दिसंबर को) हुई जिसके बाद यह फैसला लिया गया। एयरपोर्ट्स को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के अंतर्गत विकसित व संचालित आदि करने को लेकर विस्तृत ब्यौरा दिया गया था। साथ ही साथ उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि इस बारे में राज्य सरकार से कोई बातचीत नहीं हुई है। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) इन एयरपोर्ट्स का प्रबंधन संभालती है।

बताया जा रहा है कि कोलकता के रहने वालें सप्तऋषि देब ने एएआई के तहत आने वाले एयरपोर्ट्स के आधुनिकिकरण को लेकर याचिका दी थी। जिसके बाद राज्य सरकार ने मंत्रालय से इस बारे में जवाब मांगा कि एयरपोर्ट पट्टे लीज पर दिए जाने से पहले राज्य सरकार से क्यों नहीं सलाह लिया गया?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो सोर्स: गूगल

अपने बचाव में हालांकि, मंत्रालय ने इस संबंध में निजीकरण की जरूरत का पक्ष लेते हुए कहा कि पीपीपी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के कारण सर्विस डिलीवरी में बढ़ोतरी आई है। लेकिन अगर हम एक कानूनी तौर पर बात करें तो 11 जनवरी, 2019 के प्रक्रिया के अनुसार, एएआई के एयरपोर्ट पीपीपी मोड के जरिए पट्टे पर किसी को देने को लिए जनता से या फिर राज्यों से चर्चा करना जरूरी होता है।

अगर इसके पीछे के कारणों को तलाश करें तो नवंबर 2018 में सरकार ने उस प्रस्ताव को मंजुरी दे दी थी जिसमें ये कहा गया था कि एएआई के अंतर्गत आने वाले छह एयरपोर्ट को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अधार पर नीलामी से जोड़ने की मांग की गई थी।

नीलामी के वक्त 10 कम्पनीयों के द्वारा 32 बोली लगाई गई थी जिसमें अडानी ग्रुप पांच एयरपोर्ट्स पर बोली लगाने में अव्वल रही थी। प्रति यात्री शुल्क के आधार पर अडाणी समूह ने अहमदाबाद के लिए 177 रुपये, जयपुर के लिए 174 रुपये, लखनऊ के लिए 171 रुपये, तिरुवनंतपुरम के लिए 168 रुपये और मेंगलुरु के लिए 115 रुपये की बोली लगाई। यह राशि अडानी समूह इन हवाईअड्डों का परिचालन मिलने पर प्राधिकरण को देगा. माने कि जितने लोग एयरपोर्ट में यात्री के तौर पर एक महीने में आएंगे उतने लोगों के लिए अडानी समूह हवाई अड्डे के प्राधिकरण को बोली लगाई गयी राशि में गुना कर के जमा करेगा। इसको ऐसे समझिए कि अगर लखनऊ एयरपोर्ट में एक महीने में एक ही यात्री आता है तो अडानी समूह को अपनी बोली लगाई गयी धनराशि जोकि 171 रुपये हैं, उस व्यक्ति के लिए प्राधिकरण को जमा करना पड़ेगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स: गूगल

अडानी समूह के अलावे दूसरी बोली लगाने वाली कंपनी में जीएमआर एयरपोट्र्स लिमिटेड ने इनके लिए क्रमश: 85 रुपये, 69 रुपये, 63 रुपये, 63 रुपये और 18 रुपये की बोली लगाई थी। जीएमआर दिल्ली और हैदराबाद हवाईअड्डों का परिचालन करती है। अहमदाबाद और जयपुर के लिए दूसरी सबसे ऊंची बोली क्रमश: 146 रुपये और 155 रुपये राष्ट्रीय निवेश एवं अवसंरचना कोष (एनआईआईएफ) और ज्यूरिख एयरपोर्ट इंटरनेशनल ने संयुक्त तौर पर लगाई थी। इस बोली के विजेता का चुनाव मासिक प्रति यात्री शुल्क के आधार पर किया गया था जिसमें अडानी ग्रुप सबसे आगे रही थी।

गुवाहाटी एयरपोर्ट की बोलीयां अगले दिन यानी मंगलवार को खोली जानी थी जिसके बाद गुवाहाटी एयरपोर्ट को भी अडानी ग्रुप के हवाले कर दिया गय़ा। इस तरह से अडानी ग्रुप को अगले पांच सालों तक परिचालन का ठेका मिला है।

अब ऐसे में यह सवाल जायज है और सरकार से पूछा भी जाना चाहिए कि जब एएआई के एयरपोर्ट पीपीपी मोड के जरिए पट्टे पर किसी को देने को लिए जनता से या फिर राज्यों से चर्चा करना जरूरी होता है तो फिर अडानी समूह को इन एयरपोर्ट्स सौंपने से पहले इस प्रक्रिया का अनदेखा क्यों किया गया? लेकिन सरकार से सवाल पूछे तो पूछे कौन? क्योंकि सवालों के बदले में जवाब देने के बजाय हर सवाल पुछने वाले को देशभक्त या फिर देशद्रोही के तराजू में तौल दिया जाता है।

यह आर्टिकल जनसत्ता पर छपी एक खबर पर आधारित है।

Facebook Comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here