भारत में आजादी के बाद से जितने भी हथियार की खरीद करी गई, शायद ही ऐसा कोई सौदा होगा जो बिना दाग के हुआ हो. चाहे सेना के लिए जीप खरीद का मामला हो या बोर्फोस तोप का मामला हो. यहां तक कि VVIP हेलिकॉप्टर खरीद में भी घोटाले की जांच चल रही है जो अभी कोर्ट में विचाराधीन है. देश में नेता गाय-भैंस का चारा पचा जाते है तो हथियार तो भरपेटवा पकवान हो गया.

पर नेताओं के इन घोटालों की चक्की में पिसती है सेना. जिस तरह स्वस्थ शरीर के लिए स्वच्छ खाने की जरूरत होती है वैसे ही सेना को युद्ध के लिए स्वस्थ हथियार की जरुरत होती है. पर, भारत में जो भी हथियार आते है उसे कोई ना कोई घोटाले की बिमारी लग ही जाती है.

फोटो सोर्स गूगल

राफेल विमान भी घोटाले की बिमारी लेकर आया है. जब से राफेल खरीद की प्रक्रिया पूरी हुई है, राफेल को भी घोटाले की बिमारी लग गई है. इसका इलाज फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

दरअसल राफेल डील मामले में केद्र की मोदी सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने जांच की हामी भर दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 14 दिसंबर को राफेल विमान सौदे में कथित अनियमितताओं की वजह से इसे निरस्त करने और अनियमितताओं की जांच के लिये दायर याचिकाएं यह कहते हुये खारिज कर दी थीं कि राफेल सौदे के लिये फैसले लेने की प्रक्रिया पर वास्तव में किसी प्रकार का संदेह करने की कोई वजह नहीं है. 

आपको बता दें कि वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने पुनर्विचार याचिका में अदालत से राफेल आदेश की समीक्षा करने के लिए अपील की थी. अपील में कहा गया कि सरकार ने राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया है. मोदी सरकार ने Price, Procedure और Partner के चुनाव में गफलत बनाए रखी और इसका अनुचित लाभ लिया है.

इस मामले में केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा था कि तीनों याचिकाकर्ताओं यशवंत सिन्हा, अरूण शौरी और प्रशांत भूषण के अलावा अधिवक्ता विनीत ढांडा ने जो पुनर्विचार याचिकायें दायर की है, उसकी समीक्षा याचिका में जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है उनपर केंद्र का विशेषाधिकार है और उन दस्तावेजों को याचिका से हटा देना चाहिए. सरकार का कहना था कि मूल दस्तावेजों की फोटोकॉपी गलत रूप से तैयार की गईं और इसकी जांच की जा रही है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि रक्षा मंत्रालय से ये दस्तावेज चोरी करके फोटोकॉपी करवाई गई और कोर्ट में सुनवाई के लिए पेश किए गए. आपको बता दे कि केंद्र सरकार लीक हुई दास्तवेजों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है. केद्र सरकार का कहना है कि राफेल से जुड़ी दस्तावेजों को मीडिया में प्रकाशीत करना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करना है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की नहीं सुनी और अब वह इस पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है.

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इस मामले पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय के कौल ने बुधवार को दिए अपने एक फ़ैसले में एक बार फिर से प्रेस की आज़ादी की अहमियत पर ज़ोर दिया. अदालत ने कहा,

“न तो भारतीय संसद का बनाया कोई क़ानून और न अंग्रेज़ों का बनाया ‘ऑफ़िशियल सीक्रेट ऐक्ट’ मीडिया को कोई दस्तावेज़ या जानकारी प्रकाशित करने से रोक सकता है और न ही कोर्ट इन दस्तावेज़ों को ‘गोपनीय’ मान सकता है.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर आरटीआई या सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी देने से इनकार नहीं कर सकती है.

क्या है दस्तावेजों में?

जिन दस्तावेजों के लीक होने से केंद्र सरकार को ऐतराज है, उस में 24 नवंबर 2015 को लिखे गए नोट का जिक्र है. इस नोट में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने राफेल सौदे पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा की गई चर्चाओं को मंजूरी दे दी थी.

इस नोट में रक्षा सचिव जी मोहन कुमार ने लिखा, ‘रक्षा मंत्री इस पर कृपया ध्यान दें. इस तरह की बातचीत से पीएमओ को बचना चाहिए क्योंकि यह हमारी वार्ता की गंभीरता को कम करता है.’

इस नोट में कहा गया कि रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस के साथ हो रहे राफेल डील को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय यानि के पीएमओ की दखलंदाज़ी पर ऐतराज़ जताया था। इस नोट के मुताबिक राफेल डील को लेकर फ्रांस के साथ बातचीत रक्षा मंत्रालय तो कर ही रहा था लेकिन उसी समय पर पीएमओ भी अपनी ओर से लगातार फ्रांस के साथ इस समझौते पर बातचीत कर रहा था।

नोट में कहा गया है कि पीएमओ की राफेल डील में दखलअंदाज़ी की वज़ह से भारत के रक्षा मंत्रालय और भारतीय टीम की पोजीशन इस मसौदे में कमज़ोर हो गयी। इस नोट में रक्षा मंत्रालय नें रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का ध्यान भी खींचा था। मनोहर पर्रिकर से कहा गया था कि उन्हें पीएमओ को यहाँ सलाह देनी चाहिए कि जो भी अधिकारी इस डील को लेकर भारतीय टीम का हिस्सा नहीं है उसे फ्रांस से इस डील के ऊपर कोई बातचीत न करने को कहा जाये। इस नोट में यह भी कहा गया था कि अगर पीएमओ को रक्षा मंत्रालय की बातचीत पर भरोसा नहीं है तो उन्हें नए सिरे से एक नयी टीम बना कर इस समझौते के ऊपर बातचीत शुरू करनी चाहिए।

इस नोट को उप सचिव (एयर-2) एसके शर्मा ने तैयार किया था जिसे खरीद प्रबंधक व संयुक्त सचिव (एयर) और खरीद प्रक्रिया के महानिदेशक दोनों ने ही समर्थन दिया था.

 

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इस नोट में कहा गया, ‘इस तरह की समानांतर बातचीत हमारे हितों के लिए हानिकारक हो सकती है क्योंकि फ्रांसीसी सरकार अपने फायदे के लिए इसका लाभ उठा सकती है और भारतीय वार्ताकार टीम की स्थिति को कमजोर कर सकती है और इस मामले में बिल्कुल ऐसा ही हुआ है.’ रक्षा मंत्रालय ने उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि जनरल रेब ने अपने पत्र में कहा था कि फ्रांस के कूटनीतिक सलाहकार और प्रधानमंत्री के संयुक्त सचिव के बीच जो बातचीत हुई है उसमें तय हुआ कि कोई बैंक गारंटी नहीं दी जाएगी. इसके लिए ‘लेटर आफ कंफर्ट’ ही काफी है. उसे कंपनी की तरफ से गारंटी के तौर पर माना जाए.

नोट में कहा गया कि यह रक्षा मंत्रालय के रुख से अलग था और भारत की वार्ताकार टीम की ओर से इससे वाकिफ कराया गया था कि किसी भी व्यावसायिक समझौते के लिए सरकारी या बैंक गारंटी होनी ही चाहिए.

आपको बता दें कि राफेल खरीद पर समझौते का ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2015 में पेरिस में किया था. इस समझौते पर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने 26 जनवरी 2016 को हस्ताक्षर किया था जब वे गणतंत्र दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि भारत आए थे.

इसी समझौते को लेकर द हिंदू अखबार ने खुलासा किया कि राफेल सौदे में पीएमओ ने फ्रांस सरकार से समानांतर बातचीत की थी. अखबार का कहना है कि यह साफ था कि पीएमओ की ओर से इस तरह की समानांतर बातचीत ने इस सौदे पर रक्षा मंत्रालय और भारतीय वार्ताकार टीम की बातचीत को कमजोर किया.

अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने जो डील की है वो पहले से चली आ रही प्रक्रिया और उसकी शर्तों के मुताबिक थी या फिर उसमें बदलाव किया गया? क्यों बदलाव हुआ? क्या भारतीय वायुसेना ने कोई नया प्रस्ताव दिया था? क्या डास्सो कंपनी ने नए दरों यानी कम दरों पर सप्लाई का कोई नया प्रस्ताव दिया था? इस तरह के तमाम सवाल हैं जोकि इन नोट्स की वजह से अब सबके सामने हैं जिसपर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना होगा.

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