राजनीतिक गलियारों में लालू प्रसाद यादव का नाम सुनते ही नेताओं में हलचल मच जाती है. लालू के राजनीति करने का अंदाज और मजाकिये तरीके से अपनी बात को जनता तक पहुंचाना ही उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाता है. पर, 1990 के चारा घोटालें में मिली सजा ने उन्हें सामान्य जीवन से ही अलग कर दिया. ये मामला 1990 के दशक की शुरुआत में पशुपालन विभाग के कोषागार से पैसे की धोखाधड़ी करने से संबंधित था. जिस समय घोटाला हुआ था उस समय लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे. जब से लालू यादव जेल में बंद हैं, उसके बाद से उनका नाम राजनीति के किसी गुमनाम गली में सिमट सा गया है.

फोटो सोर्स गूगल

दरअसल में मामला लालू यादव के जमानत से जुड़ा है. लालू प्रसाद यादव ने उम्र और बीमारी का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दायर की है. उन्होंने एसएलपी दायर कर कहा कि वह 71 साल के बुजुर्ग हैं और लंबे समय से बीमार चल रहे हैं.

फोटो सोर्स गूगल

लालू यादव के इस याचिका का सीबीआई ने विरोध किया है. सीबीआई ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है. हलफनामे में सीबीआई ने कहा,

‘लालू अस्पताल से राजनीतिक गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं. वह जेल में न रहकर अस्पताल के विशेष वार्ड में रहते हैं. लालू यादव 2019 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जमानत मांग रहे हैं. मेडिकल आधार पर जमानत मांगकर वह कोर्ट को गुमराह कर रहे है.’

सीबीआई ने कहा कि लालू यादव को अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए जमानत नहीं मिलनी चाहिए. सीबीआई ने कहा कि यदि सारे सजा की गणना की जाए तो लालू को 3.5 साल की सजा नहीं हुई है बल्कि साढे 27 साल की जेल हुई है. राज्य के सीएम रहते लालू की नापाक हरकत ने पूरे देश की अंतरात्मा को हिला कर रख दिया.

फोटो सोर्स गूगल

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट 10 अप्रैल को सुनवाई करेगा. लालू यादव ने मेडिकल आधार पर जमानत मांगी थी. सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च को सीबीआई को नोटिस जारी कर इस मामले पर जवाब मांगा था. लालू ने याचिका में कहा था कि एक मामले में 22 महीने, दूसरे मामले में 13 महीने और तीसरे मामले में 21 महीने की सजा काट चुके हैं.

खैर अब जो भी हो लेकिन लालू यादव की इस हालत को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इंसान अपने कर्मों की सजा यहीं इसी धरती पर भोगता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here