लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। कुछ राजनीतिक पार्टेियां लोकसभा के चुनावी रण में शंखनाद कर चुकी है तो वहीं कोई अभी भी सीटों के समिकरण को सुलझाने की कोशिश कर रहें हैं। राजनीति का चेहरा बदलता हुआ ही नजर आ रहा हैं। चाहे वो बदलाव उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को लेकर हो या फिर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ हो। लेकिन सभी जगह लोकसभा 2019 चुनाव को लेकर काफी कुछ सामने आ रहा है।

उतारप्रदेश की भसड़।

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से चुनावी ड्रामा देखने को मिला। जहां सीटों को लेकर सामंजस्य नहीं बैठा पाई पार्टियों के बीच मनमुटाव हुआ और फिर एक पल में ही कांग्रेस को महागठबंधन से अलग होना पड़ा। लेकिन इन सबके बावजुद कांग्रेस ने नई रणनीति अपनाई और राजनीति के रास्ते में प्रियंका गांधी वाड्रा को उत्तरप्रदेश का खेवईय्या बनाया। चुनावी राह पर अधिकारिक रुप से पहली बार निकली प्रियंका को साथ मिला ज्योतिरादित्या का औऱ फिर कांग्रेस कार्यकर्ताओ के बीच एक अलग ही ऊर्जा देखने को मिल रही है।

अखिलेश और मायावती। फोटो सोर्स: गूगल

हालांकि प्रियंका वाड्रा की एंट्री के बाद कई जगहों पर अखिलेश यादव को यह बोलते हुए देखा गया कि कांग्रेस के लिए गठबंधन का दरवाजा कभी भी बन्द ही नहीं था और ना अभी है। लेकिन एक कहावत है कि अब पछताने से क्या फायदा जब चिड़ीया चुग गई खेत। लोगों के बीच कांग्रेस को लेकर उत्साह देखकर अब सपा औऱ बसपा दोनों ही गहरी चिंता में है।

दिल्ली में केजरीवाल की अलग तरह की राजनीति।

खैर, ये तो यूपी का हाल लेकिन जिस तरह से दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल कांग्रेस को लेकर बयानबाजी करते दिखाई दे रहें हैं उससे एक बार के लिए सभी लोगों को यह लगने लगा था कि कहीं दिल्ली में ‘आप’ का साथ कांग्रेस तो नहीं आ रही है। लेकिन यह महज एक अटकलें लगाने तक ही सिमित रह गया। केजरीवाल कई बार राहुल गांधी से मिले और इस बारे में बात भी की लेकिन शायद राहुल गांधी को केजरीवाल का साथ नहीं पसन्द आया।

अरविंद केजरीवाल। फोटो साभार: गूगल

जिसके बाद दिल्ली के चुनावी रण को अरविन्द केजरीवाल अलग तरीके से सजाने में लगे हुए हैं। तभी तो जो बात सामने आ रही है उसमें यह कहा जा रहा है कि अब आम आदमी पार्टी ने किसी भी पुराने प्रत्याशी पर दांव लगाने की बात नहीं कर रहें हैं। जो चेहरा वर्ष 2014 में आप पार्टी में देखने को मिला था शायद अब उनके जगह नए जोश औऱ युवा जुनून के साथ मुख्यमंत्री अरविन्द केजरिवाल चुनावी रण में दस्तक देंगे। इसके पीछे की वजह जाननें की कोशिश करें तो जो बात सामने आती है उसमें ‘आप’ की मजबुरी नजर आ रही है क्योंकि लगभग सारे पुराने साथी केजरीवाल का साथ छोड़ चुके हैं।

चाहे वो वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष हो या फिर पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे आनंद कुमार हो। नई दिल्ली सीट से आशीष खेतान पार्टी प्रत्याशी रहे। वे भी अब राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। जिस तरह से शनिवार को गोपाल राय ने पहले ही अपने लोकसभा प्रत्याशियों की घोषणा कर दिया उससे अब एक बात साफ हो गई है कि कांग्रेस के साथ ‘आप’ चुनावी रण में शामिल नहीं हो सकता।

बंगाल में ममता का तानाशाही रवैये के बीच विपक्ष का प्रमुख चेहरा।

वही बंगाल की कहानी भी कुछ हट कर है। जहां विपक्ष की एकजुटता के बहाने ममता बनर्जी का मोदी सरकार के खिलाफ हल्लाबोल और सीबीआई बनाम कोलकाता पुलिस मामले के जरिये बंगाल को राजनीति के केंद्र में लाने के घटनाक्रम ने एक बार फिर से इस ओर इशारा किया है कि इस बार का लोकसभा चुनाव त्रिशंकु हो सकता है। ममता बीजेपी के खिलाफ जिस तरह से खुलकर सामने आई वह काफी हैरानी भरा था। चाहे वह योगी आदित्यनाथ की रैली हो या फिर अमित शाह के हेलीपैड रोकने की खबर। सभी सुर्खियों में रही।

ममता बनर्जी। फोटो सोर्स: गूगल

अभी तो ममता बनर्जी के ऊपर सारदा स्कैम का नाग भी फन फैलाये बैठा है। इसके अलावे पंचायत चुनाव में खुलेआम खून खराबे वाली खबरों ने इस ओर इशारा किया है कि ममता बनर्जी ने गंदी राजनीति के कीचड़ में छलांग लगा दी है जो एक दिन उनके लिए ही दलदल बन जाएगा। लेकिन फिलहाल पूरा विपक्ष उनके साथ एकजुट खड़ा दिखता है जोकि राजनीतिक पार्टियों के बीच में उनकी एक अलग पहचान बनाता है।

इस तरह से देखा जाए तो लोकसभा चुनाव 2019 पिछले चुनाव से काफी अलग होने वाला है क्योंकि इस बार राजनीतिक पार्टियां अपनी सीटों के समीकरण में ही उलझी पड़ी हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि लोकसभा चुनाव के इस रण में कौन सी पार्टी फतह करती हैं।

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