एक लड़के ने बचपन में नेपोलियन की एक तस्वीर देखी। उस तस्वीर में नेपोलियन के बड़े बालों से इतना प्रभावित हुआ कि उस समय ही निश्चय कर लिया कि वह जीवन भर अपने बालों को बड़ा ही रखेगा। यही लड़का छायावादी युग के चार स्तम्भों में से एक था। नाम सुमित्रानंदन पंत। उतराखंड के अल्मोड़ा के पास एक छोटा सा गांव है जिसे कौसानी के नाम से जाना जाता है। इसी गांव में पंतजी का जन्म 20 मई 1900 को हुआ था। लेकिन जन्म के 6 घंटे के बाद ही इनकी माता का देहांत हो गया। माता के मरने के बाद इनका पालन पोषण इनके पिता गंगा दत्त पंत और दादी ने किया।

प्रारंभिक शिक्षा

चार साल की उम्र में जब इनका एडमिशन गांव के स्कूल में हुआ तो उस वक्त इनका नाम गुसाई दत्त था लेकिन जब सात साल के उम्र में अल्मोड़ा के स्कूल में इनका दाखिला हुआ तो इन्होंने खुद ही अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। सात साल की उम्र से ही सुमित्रानंदन पंत ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। 1918 में अपने भाई के साथ क्वीन्स कॉलेज में पढ़ने के बाद इलाहाबाद चले गए। जहां उन्होंने प्रसिद्ध म्योर कॉलेज में आगे की पढ़ाई शुरु की।

फोटो सोर्स: गूगल
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इलाहाबाद में ही इन्होंने आकाशवाणी के साथ जुड़कर सलाहकार के रुप में काम किया फिर इनकी मुलाक़ात हुई महात्मा गांधी से। 1921 में सविनय अवज्ञा आंदोलन हो रहा था तो पंत ने गांधी जी का साथ देने के लिए बीए की परीक्षा में भाग नहीं लिया और कॉलेज भी छोड़ दिया।

जब जीवन में आया वो काला दिन

1931 के आस-पास जब पंत गांधीजी के साथ दे रहे थे तो इसी बीच उनके जीवन का सबसे काला समय आया। पंत की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। स्थिति इतनी खराब हुई की पहले पंत को अपनी जमीन बेचनी पड़ी और फिर घर। इसी बीच उनकी बहन और भाई की मौत के बाद पिता की मौत ने पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। 28 वर्ष के होने के बाद परिवार के बचे लोगों को उनकी शादी की चिंता सताने लगी।

फोटो सोर्स: गूगल

पूरी उम्र रहें कुंवारे

पंत जब 28 साल के हुए तो उनके घरवालों को उनकी शादी की चिंता होने लगी। लेकिन पंतजी ने साफ मना कर दिया। पंत ने अपनी एक कविता में भी इस बात का ज़िक्र किया है। उन्होंने लिखा –

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, 

तोड़ प्रकृति से भी माया, 

बाले ! तेरे बाल-जाल में

कैसे उलझा दूं लोचन?

सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति से लगाव था। उन्होंने शादी करने से साफ मना करने पर एक तर्क ये भी दिया था उनका कहना था कि इंसान का सबसे प्यारा और अच्छा साथी प्रकृति है।

सुमित्रानंदन पंत, फोटो सोर्स- गूगल

पंत जब आकाशवाणी में काम कर रहे थे तो ठीक उसी समय टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत हुई। पंत ने ही सबसे पहले ‘दूरदर्शन’ का नामकरण किया। पंत के साथ हरिवंशराय बच्चन के बहुत अच्छे संबंध थे। जब हरिवंश राय के घर लड़का पैदा हुआ तो सुमित्रानंदन पंत ने ही उनका नाम अमिताभ बच्चन रखा। पंत इतने उदारवादी विचारधारा के थे कि कोई भी नया कवि उनसे अपने किताब की भूमिका लिखवाने के लिए आ जाता तो वो मना नहीं करते थे।

हरिवंशराय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत और रामधारी सिंह दिनकर, फोटो सोर्स- गूगल

पंत जब अपने जीवन के अंतिम समय में थे तो उसी वक्त उनकी ममेरी बहन शांता अपने साथ एक दो साल की छोटी बच्ची लेकर आई। पंत को उस बच्ची से लगाव हो गया, उन्हें लगा जैसे उनके जीने का सहारा मिल गया हो। पंत ने अपने ही नाम पर उस बच्ची का नाम सुमिता रख दिया।

पंत ने अपने जीवन में कई सारी रचनाएं की। उनकी प्रमुख रचनाओं में से चिदम्बरा, लोकायतन, वीणा, उच्छवास, पल्लव ग्रंथी, सत्यकाम और पथ हैं। सुमितानंदन पंत को उनकी रचनाओं के लिए कई सारे सम्मान मिले। चिदम्बरा के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, लोकायतन के लिए सोवियत नेहरु शांति पुरस्कार मिला। उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार से भी नवाजा गया। सुमित्रानंदन पंत 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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