इतिहास में कई बड़े युद्ध हुये हैं। कई में हम हारे हैं और कई में हम जीते हैं। लेकिन आजाद भारत में जंग की कहानी पाकिस्तान से शुरू होती है। जो आज तक चली आ रही है। जिसमें एक तरह से भारत की जीत हुई थी लेकिन उस जंग ने हमें एक ऐसा नासूर दिया जो आज तक बार-बार हमारे जख्मों को हरा कर देता है- कश्मीर

कश्मीर हमारे देश का वो हिस्सा जो हमारी अखंडता का प्रतीक बन गया है। जो कभी सुरक्षित नहीं रह पाया, कभी आतंकवाद की चपेट में रहा तो कभी जंग का मैदान बना।

Related imageलाल बहादुर शास्त्री ने कश्मीर के बारे में कहा था कि कश्मीर पर हमला, भारत पर हमला होगा। 1947 का भारत-पाकिस्तान ऐसा ही युद्ध था। जिसने दोनों को हमेशा के लिए दुश्मन बना दिया। यहीं से पहली बार भारत-पाकिस्तान की दूरियां बढ़ने लगीं। अब उस दूरी का फासला इतना बढ़ गया है कि उसे पाटना बहुत मुश्किल है। भारत-पाकिस्तान की जंग की किश्त में आज बात है पहली आलमी जंग की। जिसने बस नुकसान ही किया।

बंटवारा बनी जंग की वजह

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अस्तित्व में आया और 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान आजाद हो गया, बहुत कुछ खोकर। बहुत से लोग इस विभाजन के विरोध में थे, जिसमें एक गांधीजी भी थे। लेकिन जब मोहम्मद अली जिन्ना नहीं माने तो एक अलग देश बनाना पड़ा, जिसका बंटवारा रैडक्लिफ ने किया। इस बंटवारे में कुछ ऐसा गलत हुआ जो खून-खराबे की वजह बना। मसलन लाहौर जहां सिख ज्यादा थे वो पाकिस्तान में चला गया। बंगाल और हैदराबाद जहां मुसलमान ज्यादा थे वो हिन्दुस्तान का हिस्सा बन गया।

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जिन्ना ने कई रियासतों को पाकिस्तान में मिलाने की कोशिश की लेकिन वल्लभ भाई पटेल ने ऐसा नहीं होने दिया। आजादी के बाद भी कश्मीर को राजा हरी सिंह ने किसी भी देश का हिस्सा नहीं बनाया था। राजा हरि सिंह का मानना था कि वो आजाद कश्मीर को बरकरार रखें। उनके इसी फैसले ने कश्मीर को दो हिस्सों में बांट दिया। लार्ड माउंटबैटन ने उनको समझाया था कि आपको 15 अगस्त से पहले किसी भी एक देश का हिस्सा बन जाना चाहिये। आजाद कश्मीर, कश्मीर के लिये बेहतर नहीं होगा।

ऑपरेशन गुलमर्ग

22 अक्टूबर को पाकिस्तान ने अपने नापाक इरादे साफ कर दिये। हजारों की संख्या में कबालियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया। कबालियों के ही वेश में पाकिस्तानी के सैनिक भी शामिल थे। उनके पास बंदूक, मशीन गनें थीं। मकसद साफ था कश्मीर पर कब्जा। इस ऑपरेशन को पाकिस्तान ने गुलमर्ग नाम दिया यानि कि श्रीनगर पर कब्जा करना। कबाली धीरे-धीरे मुज्जफराबाद पहुंच गये, जहां से श्रीनगर कुछ ही घंटों का रास्ता था।

श्रीनगर से पहले उड़ी पड़ता है। उड़ी तक पहुंचने के लिये एक पुल को पार करना था। जम्मू-कश्मीर की सेना का नेतृत्व कर रहे थे ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह। कबालियों को हौंसला बढ़ा हुआ था क्योंकि कश्मीर के मुस्लिम सैनिक कबालियों से जा मिले। इसके बावजूद राजेन्द्र सिंह ने हार नहीं मानी। राजेन्द्र सिंह ने उस पुल को उड़ा दिया। जिसके कारण कबाली दो दिन तक आगे नहीं बढ़ पाये। इस मुठभेड़ में राजेन्द्र सिंह मारे गये। राजेन्द्र सिंह अगर वो पुल न उड़ाते तो आज कश्मीर पाकिस्तान का होता।

Image result for kashmir in 1947उड़ी के बाद कबाली बारामूला पहुंच गये। अब यहां से श्रीनगर कुछ ही दूरी पर था। श्रीनगर पर कब्जा करने का मतलब था जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान का हुआ। लेकिन कहानी बारामूला मे बदलने वाली थी। कबालियों ने बाराला में लूटपाट शुरू कर दी। यहां वे दो दिन यही काम करते रहे जिसका नतीजा ये हुआ कि राजा हरीसिंह और भारत सरकार को दो दिन का मौका मिल गया।

भारत सरकार और हरीसिंह

24 अक्टूबर 1947 को राजा हरि सिंह ने भारत सरकार से कहा कि वे जल्दी सेना को कश्मीर भेजें। 25 अक्टूबर को राजा हरि सिंह श्रीनगर छोड़कर जम्मू चले गये। जल्दी ही कबालियों ने श्रीनगर पर कब्जा कर लिया। पटेल और नेहरू ने माउंटबैटन से सेना को श्रीनगर भेजने को कहा। माउंटबैटन ने साफ इंकार कर दिया। माउंटबैटन ने कहा कि कश्मीर फिलहाल आजाद देश है। उसे पहले भारत में शामिल होना पड़ेगा। जैसे ही महाराज ने ऐलान किया, मैं भारतीय संघ में शामिल होने का ऐलान करता हूं, तब से कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया। लेकिन अभी कबालियों को कश्मीर से खदेड़ना बाकी था।

Image result for kashmir in 194727 अक्टूबर 1947 को भारत ने कश्मीर में अपनी सेना भेज दी। माउंटबैटन ने ये शर्त रखी कि कश्मीर में शांति हो जाने के बाद वहां जनमत संग्रह करवाया जायेगा, जो कभी नहीं हो पाया। 27 अक्टूबर की तड़के भारतीय सेना हवाई जहाज से श्रीनगर पहुंच गई। उसके बाद तो कबाली खदेड़े जाने लगे। कबालियों ने जाते वक्त भी काफी नुकसान किया। कबालियों ने उड़ी के अलावा कारगिल में भी धावा बोल दिया। कारगिल और जोजिला दर्रे को जीतने में टैंकों ने कमाल किया और दुश्मनों को भागने पर मजबूर कर दिया। जम्मू-कश्मीर सुरक्षित हो गया था लेकिन अभी भी युद्ध विराम नहीं हुआ था।
30 दिसम्बर 1947 को भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को ले गये। 13 अगस्त 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव पारित किया। 1 जनवरी 1949 को युद्धविराम की घोषणा कर दी गई।

हमने खो दिया अपना कश्मीर

कबालियों ने श्रीनगर तक कब्जा कर लिया था और हमने उसको वापिस भी पा लिया। अगर हम वैसी ही कार्रवाई करते तो बाकी का कश्मीर भी पा सकते थे। हमने युद्ध खत्म करने में कुछ जल्दी दिखाई और आज उसी कश्मीर के लिये हमको न जाने कितनी जानें गंवानी पड़ रही हैं। राजनैतिक जल्दीबाजी के चलते भारत को केवल जम्मू-कश्मीर का 60 प्रतिशत भाग ही वापस मिल पाया था। बाकी भाग आज पाकिस्तान का हिस्सा है और हम उसे पीओके यानि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहते हैं।

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क्या खोया?

आलमी जंग कभी भी खुशी नहीं देती। कुछ नुकसान हमारा होता है और कुछ सामने वाले का। इस पहली आलमी जंग में हमने बहुत कुछ खोया। 14 महीने चले इस युद्ध में करीब 1500 भारतीय मारे गए और 3500 घायल हुये। 6000 पाकिस्तानी मारे गये और 14 हजार घायल हो गये। भारत ने कश्मीर का एक-तिहाई हिस्सा खो दिया।

देश अलग होते ही लड़ गया। हम अच्छे पड़ोसी रहते अगर जंग न होती। हम उसके बाद बार-बार लड़ते रहे और आज भी लड़ रहे हैं। 1947-49 की जंग भारत के लिये अच्छी नहीं रही लेकिन, कश्मीर को बचा लिया था। अगर तब हम कश्मीर हार जाते तो शायद हालात और भी खराब हो जाते। हमने तब पाकिस्तान को पहली बार खदेड़ा था और आज भी खदेड़ रहे हैं लेकिन पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है।

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