अक्सर ये सुनने को मिलता है कि बड़ी तादाद में हिंदू शरणार्थी पाकिस्तान से भाग कर आए हैं. उन्हें उनके घर, गांव और देश से बेघर कर दिया गया है. उनसे उनका सब कुछ छीन लिया गया है. वो दरबदर भटकने को मजबूर हैं. तब भारत में बैठे लोगों का खून खौल जाता है. उन्हें इस तरह की हरकतों पर गुस्सा आता है. सरकार भी इन शरणार्थियों की मदद के लिए सामने आती है. खासकर मोदी सरकार.

मगर तब क्या हो जब अपने ही देश के लोगों को शरणार्थी बना दिया जाए. उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी मोहताज़ कर दिया जाए. उनके साथ ऐसा सलूक किया जाए मानों वो इस देश के हैं ही नहीं. अपने ही देश में इस तरह का अपमान कौन सहेगा?

ब्रू जनजाति, मिजोरम, फोटो सोर्स: गूगल
ब्रू जनजाति, मिजोरम, फोटो सोर्स: गूगल

मामला जान लीजिए

मिजोरम के ब्रू जनजाति के लोग पिछले 22 सालों से अपने घर और राज्य से बेघर हैं. इन्हें वैष्णव हिंदू के रूप में जाना जाता है. इस जनजाति के कुल 40 हजार लोग शरणार्थी बना दिए गए हैं.

इनके हालात इतने खराब हैं कि इन्हें हर रोज 600 ग्राम चावल और 5 रुपये रोज पर गुजारा करना पड़ता है. सफाई से रहने के लिए साल में 3 साबुन मिलते हैं. वो भी तीन साल बाद मिलना शुरू हुआ है. उससे पहले तो एक ही मिलता था.

आज भी पूरे साल में एक ही जोड़ी चप्पल मिलती है. बच्चों को अपना पेट भरने के लिए 300 ग्राम चावल और 2.5 रुपये रोज दिए जाते हैं. मगर अब इन सब चीजों पर एक अक्टूबर से रोक लगा दी जाएगी. जो बेहद ही शर्मनाक है.

40 हजार हिंदू शरणार्थियों के हक के लिए लड़ने वाली संस्था ‘भारत हितरक्षा अभियान’ के सुमित मोहरिया का कहना है

22 साल पहले मिजोरम से आतंक के चलते ये लोग जान बचाकर अपने घर और खेती बाड़ी को छोड़कर भागने को मजबूर हो गए थे. उन्होंने त्रिपुरा की मुख्य आबादी से करीब 50 किमी. दूर शरण ली थी. ये 40 हज़ार लोग 7 कैंपों में त्रिपुरा की पहाड़ियों पर रह रहे हैं. इन लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है. राशन कार्ड भी अस्थाई है. सिर्फ वोटर कार्ड है जो स्थाई है.

मिजोरम, फोटो सोर्स: गूगल
मिजोरम, फोटो सोर्स: गूगल

22 साल पहले मिजोरम में क्या हुआ था?

मिजोरम से निकाले गए 40 हज़ार लोगों का कहना है कि

हमारे परिवार कई पीढ़ियों से मिजोरम में रहते आए हैं. हम भी मिजोरम में रहते थे. खेती-बाड़ी करते थे लोकिन, 22 साल पहले रातों-रात हमें मिजोरम से भगा दिया गया. वजह भी नहीं बताई गई. बस इतना कहा गया कि तुम लोग यहां नहीं रह सकते. आखिर ये लोग कौन हैं जो हमें हमारे ही मिजोरम में नहीं रहने देना चाहते? अगर वो इस राज्य और देश के हैं तो फिर उन्हें हम से क्या परेशानी है? क्यों आज हमें वहां पांव भी नहीं रखने दिया जाता है? आज हम अपने ही देश में मुख्यधारा से अलग होकर एक पहाड़ी पर शरणार्थी की जिंदगी जी रहे हैं. अधिकार है तो बस एक वोट डालने का.

न्यूज18 हिंदी के साथ शरणार्थियों की मदद के अभियान से जुड़े अभय जैन ने इन तमाम शरणार्थियों का दर्द बयान किया है.

उनका कहना है कि

आज मिजोरम की 11 लाख की आबादी है. जिसमे 87% ईसाई, 10% चकमा शरणार्थी हैं और बाकी दूसरे लोग हैं. यहाँ के बहुसंख्यकों ने ही इन हिंदूओं को यहां से भागने के लिए मजबूर किया है.

वापस जाने की कोशिश की थी

2010 में ब्रू जनजाति के लोगों ने वापस मिजोरम जाने की कोशिश की थी. इस अभियान से जुड़े अभय जैन बताते हैं.

मनमोहन सिंह सरकार के समय में 7 से 8 हजार लोगों को वापस उनके घर भेजने की कोशिश की गई थी. ये लोग जब मिजोरम पहुंचे तो एक बार फिर से इन्हें परेशान किया गया और उन्हें वहां रहने नहीं दिया गया. जिसके चलते ये लोग वापस त्रिपुरा की पहाड़ियों में रहने आ गए.

शरणार्थियों ने प्रदर्शन करने का फैसला लिया है

भारत सरकार ने एक बार त्रिपुरा और मिजोरम सरकार के साथ बातचीत कर इस समस्या का हल निकालने की कोशिश की थी. केंद्र सरकार ने तब यह वादा किया था कि अगर शरणार्थी वापस मिजोरम जाएंगे तो उन्हें वहां घर बनाने के लिए रुपये दिए जाएंगे.

हालांकि, 40 हजार शरणार्थियों की मांग है कि प्रति परिवार 5 एकड़ ज़मीन खेती के लिए, सुरक्षा के लिहाज से 500-500 परिवारों के गांव बसाए जाएं. साथ ही जिला परिषद बनाई जाए लेकिन, अभी तक ऐसे कोई हालात नहीं बने है.

यही वजह है कि तमाम शरणार्थियों ने 1 सितंबर से रैली निकालने का फैसला किया है. जिसके माध्यम से राष्ट्रपति, पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और त्रिपुरा-मिजोरम के राज्यपाल से मुलाकात की जाएगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फोटो सोर्स: गूगल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फोटो सोर्स: गूगल

सरकार बंद करेगी राशन-पानी

सरकार सभी शरणार्थियों को फिर से मिजोरम में बसाना चाहती है. यही वजह है कि सरकार ने शरणार्थी कैम्पों मे रह रहे सभी 40 हजार शरणार्थियों को अल्टीमेटम दिया है कि वो 1 अक्टूबर तक वापस मिजोरम चले जाएं. अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उनको हर रोज दिया जाने वाला राशन बंद कर दिया जाएगा.

अब सवाल ये उठता है कि सरकार इन शरणार्थियों की मदद कर रही है या उन्हें सजा सुना रही है? क्योंकि बिना किसी सुरक्षा और जीवन यापन के साधनों के, इन लोगों का क्या होगा? क्या इन्हें दोबारा बेघर नहीं कर दिया जाएगा? जैसा कि 2010 में कर दिया गया था. सरकार तय कर ले कि वो मदद करना चाहती भी है या नहीं.