मसान को यदि आप सिर्फ देवी पाठक(ऋचा चड्ढा) और दीपक(विकी कौशल) की दो अलग-अलग कहानियों के तौर पर देखते हैं तो फिर आप इसके मर्म को समझने से अछूते रह गए हैं। मसान महज फिल्म नहीं है यह जीवन के सार को बताती 109 मिनट की एक यात्रा है जो देवभूमि बनारस में फिल्माई गई है। इसके पात्र फिल्मी नहीं है, ये काल्पनिक हो सकते हैं पर हमारे-आपकी तरह प्राकृतिक हैं, जो हम जैसे बनकर हमारी कहानी को बता रहे हैं। यूं तो विकी कौशल की उरी की काफी तारीफ होती है, पर मुझे मसान जैसी रॉव और प्योर एक्टिंग अभी तक किसी और फिल्म में नहीं दिखी। शायद ये विकी कौशल की काबिलियत ही है कि मिम बाजार भी इ साला दुःख काहे खत्म नहीं होता है बे के साथ छेड़छाड़ नहीं करता। यानि जहां अति इमोशनल बातों को दर्शाना होता है तो इस डायलॉग का प्रयोग किया जाता है। हिंदी सिनेमा में इस सीन को तो अभी आने वाले कई वर्षों तक याद रखा जाएगा।

SOURCE: GOOGLE

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आज नीरज घेवान निर्देशित फिल्म मसान जिसे उन्होंने वरुण ग्रोवर के साथ मिलकर लिखा, 5 साल पूरा कर रही है। ऐसे में हमने सोचा कि क्यों न इस फिल्म के बारे में बात की जाए! आज हम आपको बताते हैं कि आखिर वो कौन सी 5 वजहें हैं, जिसके लिए यह फिल्म हमें अवश्य देखनी चाहिए, आइये फिर जानते हैं:

I) दलित समाज

इस फिल्म में दीपक एक डोम के किरदार में है। बिहार-यूपी के कई इलाकों में इनका काम फिक्स कर दिया गया है, जो ये सदियों से करते आ रहे हैं। इन्हें मुर्दों को जलाने का काम दिया गया है। इनके पूर्वज सदियों से यहीं करते आ रहे हैं। इस फिल्म में भी दीपक बनारस के हरिश्चंद्र घाट पर रहता है और लकड़ी उठाना, मुर्दों को जलाना उसका काम है।

फिल्म के एक दृश्य विकी कौशल घाट पर लाश जलाते हुए source: google

फिल्म के एक दृश्य विकी कौशल घाट पर लाश जलाते हुए source: google

कहीं न कहीं इसी जातिए भेद-भाव की वजह से वो अपनी प्रेमिका शालु गुप्ता(श्वेता त्रिपाठी) को अपना घर दिखाने से भी कतराता है। साथ ही साथ फिल्म को देखते वक्त आपको कई सारे दृश्य दिख जाएंगें जो इस जातिगत भेद-भाव को बखूबी दर्शाते हैं। जैसे जब पहली दफा दीपक शालू गुप्ता के बारे में जानता है तो उसके दोस्त बोलते हैं, लड़की अपर कास्ट है। कुल मिलाकर दलित समाज और उनके साथ हो रहे भेद-भाव को बड़े मार्मिक तरीके से नीरज ने इस फिल्म में दिखाया है। जबकि इस फिल्म में दीपक सिविल इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर रहा होता है, बावजूद उसके जाति ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।

II) लड़की की आजादी

‘भाग के जाना होगा ना तो भाग भी जाएंगें’ इस डायलॉग को बोलती हैं, शालू गुप्ता जो कि विकी कौशल से बेइंम्तहां मोहब्बत करती हैं। इसके अलावा उधर देवी पाठक यानी ऋचा चड्ढा भी समाज से लड़कर अपने लिए करियर खूद चुनती है।

ऋचा चड्ढा फिल्म के दृश्य में जहां उनकी नौकरी का कॉल लेटर आता है source: youtube

ऋचा चड्ढा फिल्म के दृश्य में जहां उनकी नौकरी का कॉल लेटर आता है source: youtube

जबकि फिल्म के शुरूआत में ही होटल वाला दृश्य एक साथ कई बात को दर्शाता जिसमें से एक था, सेक्सूअल फ्रीडम जिसको लेकर ऋचा कभी शर्माती नहीं है बल्कि अपने पिता, विद्याधर पाठक(संजय मिश्रा) के सामने भी कहती है कि वो उस लड़के से प्यार करती है। जबकि पुलिसिया सिस्टम इसे कुछ और दर्शाने के भरसक प्रयास में जुटी होती है।

III) प्रशासनिक भ्रष्टाचार

इस फिल्म में ऋचा चड्ढा के केस को जिस तरह से पुलिस वाले दिखाते हैं और रुपये ऐठ लेते हैं वो पूरा प्रोसेस छोटे शहर की पुलिसिया सिस्टम कैसे काम करती है इसको बताने के लिए काफी था। इंस्पेक्टर मिश्रा(भगवान तिवारी) बहुत ही बद्तमीज और निहायती निर्दयी पुलिस वाले के किरदार में होते हैं जो बिना एक थप्पड़ मारे भी सिस्टम के साथ जिस कदर खिलवाड़ कर रहे होते हैं उसे देखकर किसी को भी गुस्सा आ जाए।

फिल्म के एक दृश्य में इंस्पेक्टर मिश्रा source: youtube

फिल्म के एक दृश्य में इंस्पेक्टर मिश्रा source: youtube

IV) जीवन का लक्ष्य

इस फिल्म में जो दो अलग-अलग कहानियां चल रही होती है। उन दोनों कहानियों के मुख्य पात्र यंग जेनरेशन के लड़के-लड़कियां हैं, जिनका लक्ष्य अपने जीवन में कुछ कर गुजरने का होता है। ऋचा को अपना घर छोड़कर अच्छी नौकरी करनी होती है जबकि विकी को अपने सामाजिक कलंक को धोते हुुए अपने लिए कुछ करना है।

फिल्म का वह दृश्य जहां ऋचा अपने दोस्त के द्वारा दिए तोहफे को नदी में प्रवाह करते हुए source: youtube

फिल्म का वह दृश्य जहां ऋचा अपने दोस्त के द्वारा दिए तोहफे को नदी में प्रवाह करते हुए source: youtube

फिल्म के क्लाइमेक्स में भी यही दिखाया गया है कि जब हम किसी खास इंसान से जुड़ी किसी खास चीज के पीछे पूरी तरह पागल हो जाते हैं।  उस खास इंसान के चले जाने या बिछड़ जाने के बाद उसके पीछे रह गयी वो खास चीज हमेशा उसे उस चले गए व्यक्ति की याद दिलाती है। जिसके बारे में सोचने पर हमें सुकून के बजाय उल्टा कष्ट हीं होता है, तो उसे पीछे छोड़कर अपने जिंदगी में आगे बढ़ना चाहिए।

V) मसान, यानि जिंदगी का अंतिम सत्य

फिल्म के शुरूआत चकबस्त ब्रिज नारायण के एक शेर से होती है। ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब, मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना। यह शेर फिल्म के सार को बताता है।

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हमारा शरीर पांच तत्वों के मिलने से बना है और पांचों तत्वों के विलीन हो जाने से जिंदगी खत्म। लेकिन मोह-माया, प्रेम-वासना, लालच, रिश्ते-नाते, करियर और लक्ष्य में फंस कर लोग इस अंतिम सच को स्वीकार करने से कतराने लगते हैं। लेकिन चाहे जो भी हो व्यक्ति का अंतिम सच मृत्यु है यानि मसान। 

आपने अभी तक यह फिल्म नहीं देखी है तो जिंदगी की मर्म को समझने के लिए 109 मिनट तो दे ही सकते हैं। अभी देख लीजिए।