देश में इस वक्त कुछ भी चल रहा है। चाहे वो रेलवे हो या फिर हवाई यात्रा। किसी को कुछ पता ही नहीं है कि कब कैसे और क्या करना है। हवाई यात्रा करने के लिए लोग एयरपोर्ट पहुंच जाते हैं। रात-रात भर जगते हैं क्योंकि सुबह उनकी फ्लाइट है और जब फ्लाइट का टाइम आता है तो पता चलता है, उनकी फ्लाइट तो कैंसिल हो गई। इसकी सूचना देना चाहे वो मैसेज के द्वारा या कॉल के द्वारा किसी को ज्यादा जरुरी नहीं समझ आता। यही नहीं अब तो ट्रेन भी अपनी राहे भटक जा रही है। जाना कही और पहुंच कही और जा रही है। मतलब ऐसा लग रहा है कि लॉक डाउन की वजह से कुछ दिन ट्रेन क्या बंद हुई अब अधिकारियों को रुट की जानकारी तक नहीं रही।

इतना तो समझ आता है कि अधिकारियों की गलती है। लेकिन, एक ट्वीटर मंत्री भी तो हैं जो शायद सबसे ज्यादा ट्वीट करने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर चुके होंगे। माननीय रेलमंत्री महोदय पियूष गोयल साहब। साहब अचानक रात को जगते हैं और जब पूरी दुनिया सो रही होती है, तो एक नहीं, दो नहीं, पूरे 12 ट्वीट महाराष्ट्र के सीएम को कर देते हैं। अरे साहब! ऐसे थोड़ी होता है। रेलवे की उपलब्धी अब गिनने लायक है।

पहले प्रवासी मजदूर ट्रेन की पटरियों पर अपना दम तोड़ रहे हैं और अब तो ट्रेन के अंदर भी दम तोड़ने लगे हैं। इसके पीछे चाहे जो भी कारण बताया जाए लेकिन, सच तो ये है कि इसमें सिर्फ और सिर्फ रेलवे की कमी और उसकी कमजोर सिस्टम का देन है।

प्रवासियों को उनके जिलों तक छोड़ने के लिए रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का कोई माई-बाप नहीं है। ट्रेनें रास्ता भटक जा रही हैं। कहीं की कहीं पहुंच जा रही हैं।

गुजरात के सूरत से 17 मई को चली जिस ट्रेन को 2 दिन में बिहार के सीवान पहुंचना था, लेकिन वह 8 दिनों बाद 25 मई को सीवान पहुंची। ट्रेन को गोरखपुर के रास्ते सीवान आना था, लेकिन छपरा होकर आई। सूरत से ही सीवान के लिए निकली दो ट्रेनें ओडिशा के राउरकेला और बेंगलुरु पहुंच गईं। ट्रेनों के भटकने का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि जयपुर-पटना-भागलपुर 04875 श्रमिक स्पेशल ट्रेन रविवार की रात पटना की बजाय गया जंक्शन पहुंच गई।

भाई अगर यही करना है तो श्रमिकों से साफ क्यों नहीं कह दिया जा रहा है कि आपको अगर किसी शहर में रहने के लिए दिक्कत हो रही है तब ट्रेन के बोगी में रहे और ट्रेन आपको अलग-अलग शहरों का नजारा दिखाते हुए घुमाते हुए कुछ दिन बाद आपको आपके शहर छोड़ आएगी। अब इस मामले में रेलवे तो सच बोल नहीं पा रहा है और ना ही सही जानकारी दे पा रहा है क्योंकि ऐसा करने से उसकी खुद की बेइज्जती जो होगी।

लेकिन यह एक या 2 दिन के सफर को 9 दिन में बदलने का दुष्परिणाम जो सामने आया है क्या रेलवे उसकी जिम्मेदारी लेगा? ऐसा इसलिए क्योंकि यह 1 दिन का सफर तो नहीं कहेंगे बल्कि एक ही सफर में 7 लोगों की मौत हो जाती है और इसकी सूचना तक किसी को नहीं है। माननीय टि्वटर मंत्री पीयूष गोयल साहब अगर उन 12 ट्वीट के साथ एक ट्वीट और करके इसकी जानकारी दे देते तो शायद अच्छी बात होती लेकिन साहब को ऐसा लगता है कि अच्छी बात अच्छी लगती ही नहीं है। कोई बात नहीं हम बता देते हैं कि आखिर 1 दिन में 7 लोगों की जो मौत हुई है वह कहां से हैं और उनकी मौत कैसे हुई।

पहली मौत मुज़्ज़फरपुर रेलवे स्टेशन पर हुई जब मुजफ्फरपुर में बेतिया की ट्रेन में चढ़ने के दौरान इरशाद नाम के एक बच्चे की मौत हो गई। उमस भरी गर्मी और पेट में अन्न का दाना नहीं होने के कारण परिवार वालों ने अपने लाडले को खो दिया।

दूसरी मौत का जगह तो पता नहीं लेकिन, पता आरा में चला कि महाराष्ट्र से आ रहे मजदूर को आरा में लोगों ने जब उठाना चाहा तो पाया कि उसकी मौत हो चुकी है। उसकी पहचान नबी हसन के बेटे निसार खान के रूप में हुई। वह गया का रहने वाला था। तीसरी मौत महाराष्ट्र के बांद्रा टर्मिनल से 21 मई को श्रमिक स्पेशल ट्रेन से घर लौट रहे कटिहार के 55 साल के मोहम्मद अनवर की सोमवार शाम बरौनी जंक्शन पर मौत हो गई। 10 रुपये की पानी की बोतल खरीदने उतरा और वही प्लेटफार्म पर गिर गया और जब तक लोग उठाते तबतक दम तोड़ चुका था।

अब यही रह गया है कि प्रवासी मज़दूरों की मौत सिर्फ संख्या में बताई जाए। लेकिन एक और मौत का कारण भी जान लीजिए। सूरत से श्रमिक स्पेशल से दोपहर 1 बजे सासाराम पहुंची महिला ने पति से कहा भूख लगी है। स्टेशन पर ही पति के सामने नाश्ता किया और उसके बाद कांपने लगी। पति की गोद में ही उसने दम तोड़ दिया। पांचवी मौत महाराष्ट्र से आ रहे एक श्रमिक की ट्रेन में हालत खराब होने के बाद उसकी मौत हो गई। वह मोतिहारी जिले के कुंडवा-चैनपुर का निवासी बताया जा रहा है। राजकोट-भागलपुर श्रमिक स्पेशल ट्रेन से गया में सोमवार को 8 माह के बच्चे के शव को उतारा गया। परिवार मुंबई से सीतामढ़ी जा रहा था। आगरा में बच्चे का इलाज हुआ। कानपुर के पास मौत हो गई। और 7वीं मौत अहमदाबाद से मुजफ्फरपुर जंक्शन पहुंची स्पेशल ट्रेन में कटिहार की रहने वाली 23 साल की अलविना खातून मौत हो गई।

ये तो हो गई वो संख्या जो खबरों में आई और आपको बताया गया। मतलब इसका साफ है कि लॉक डाउन के शुरुआती दौर से लेकर अभी तक सिर्फ इतना ही बदला है कि प्रवासी मजदूरों की मौत होने की जगह पटरियों से उठकर सिर्फ़ ट्रेन और स्टेशन हो गया है।

एक और बात पहले मौत जो सड़कों और पटरियों पर होती थी उसकी कोई पहचान नहीं थी लेकिन अब जो ट्रेनों के अंदर हो रही है उसकी डिटेल जरूर मिल जा रही है। मीडिया में ये बातें इसलिए भी नहीं बताई जाती क्योंकि ऐसा बताने से न तो आप सरकार के लिए ‘जय श्री राम’ का नारा लगाएंगे और न ही आप सरकार का गुणगान करेंगे। तो ऐसी चीजों को दिखाने या बताने का मीडिया बिल्कुल अपनी ड्यूटी नहीं समझती जिसमें सरकार को फायदा होने की बात न हो।

लेकिन इस बात का आपको अगर जरा भी इल्म होगा तो सोचिएगा जरूर और जरूरत समझते होंगे तो इन घटनाओं के होने का कारण भी जानने की कोशिश कीजिएगा। फिलहाल के लिए तो देश के बड़े चैनलों पर आपके फुल एंटरटेनमेंट की व्यवस्था कर दी गई होगी। शाम होते ही लग जाइएगा हिन्दू-मुस्लिम डिबेट में और करते रहिए भारत-पाकिस्तान। साथ ही एक और डिबेट देखना न भूलिएगा। आज कल मध्यप्रदेश के अपार सफलता के बाद अब बीजेपी के साथ मीडिया भी महाराष्ट्र की सरकार गिराने में लगी हुई है। लेकिन, जब तक सरकार इन मज़दूरों के लिए कुछ नहीं कर पाती तब तक देखते दिखाते रहिए द कच्चा चिट्ठा।