बाल मनोविज्ञान यानी ‘चाइल्ड साइकोलॉजी’ ये विकास का वो पहलू है जहां किसी भी बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास होता है। आज सबसे ज़्यादा बच्चों में डिप्रेशन जैसी समस्या देखने को मिल रही है। अक्सर डिप्रेशन की समस्या बड़े लोगों में पायी जाती है। अमूमन इसका पता लगा पाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि उनके ऐसी स्थिति में सामने वाले के मन में कई उथल-पुथल चल रही होती है जो वो बता नहीं पाते हैं और अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। कभी-कभी उनकी यही परेशानी आने वाले समय में मुश्किलें पैदा कर देती हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

इसकी शुरुआत कैसे होती है?

जब बच्चे बढ़ती उम्र के होते हैं उस समय उनका मानसिक और शारीरिक दोनों ही विकास हो रहा होता हैं। इस उम्र में उनके अंदर हो रहे चेंजेस उन्हें समझ नहीं आते हैं इसलिए वो कुछ चिढ़चिढ़े होने लग जाते हैं। बच्चों की इस हालत के कई कारण हो सकते हैं। जिनमें से माँ-बाप का हद से ज़्यादा उन पर दबाव बनाना, सोशल मीडिया पर ज़्यादतर एक्टिव रहना और ऐसी और भी बातें हैं जिन पर ध्यान न देने के कारण इस तरह की समस्या शुरू हो जाती है।

इस समय बच्चे उम्र से पहले बड़े हो रहे हैं। उनमें बचपना अब उतना बचा नहीं है। हालत ये हो गयी हैं कि, अब बच्चे उम्र से ज्यादा समझदार बन गए हैं। हम सब ने ये सारी बातें हर किसी के मुंह से सुनी ही होगी और बच्चों के बर्ताव में ये सभी चीजें देखी भी होगी।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

लेकिन यहाँ सवाल ये आता है कि, क्या कभी किसी ने इसके पीछे के कारणों को जानने की कोशिश की है? बीते कुछ सालों में बच्चों की पूरी साइकोलॉजी बदली है। जिस पर बातें तो खूब हो रही हैं लेकिन कारण किसी ने जानने की कोशिश नहीं की और न कर रहे हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण बच्चों के हाथ में आए ‘स्मार्टफोन’ भी हैं।

ब्रिटेन के एक आंकड़े निकाले जहां ये देखा गया कि,

11 से 12 साल के 70 % बच्चे  स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। ये प्रतिशत 90 तक पहुंच सकता है अगर 14 साल के बच्चों को इस स्टडी में शामिल किया जाए। वहीं दूसरी तरफ, 10-13 साल के बच्चों के पास खुद का स्मार्टफोन होता है। इनमें से बहुत बच्चे दिनभर में 150  बार तो अपना फोने देखते ही हैं। इन्हीं कारणों की वजह से बच्चों का गार्डन में खेलना, बास्केटबॉल और बाकी खिलौनों से रिश्ता टूट-सा गया है। अब बच्चों की सुबह बैग को संभलाने की जगह, स्मार्टफोन्स को चेक करने ने ले लिया है।

इन सभी बातों को बताने का मकसद ये था कि, इससे जुड़ी तेलंगाना से एक खबर आई। जहां 8th क्लास में पढ़ने वाला 13 साल के बच्चे ने इसलिए खुद की जान ले ली क्योंकि वह क्लास के मॉनिटर के चुनाव में सफल नहीं रहा और एक दिन लापता होने के बाद अगले दिन उसका शव मिला।

पूरी खबर शुरू से जानते हैं –

 8th क्लास में पढ़ने वाला चरण अपनी क्लास का मॉनिटर नहीं बन पाया तो खुद की ही जान ले ली। पुलिस की रिपोर्ट के हिसाब से, तेलंगाना के भोंगिर के स्कूल में क्लास मॉनिटर के इलेक्शन हुये थे, जिसे ये बच्चा हार गया। अपनी हार को बर्दाश्त न कर पाने की कारण उसने इतना बड़ा कदम उठा लिया, भले ही वो इस कदम का परिणाम जानता न हो लेकिन उसके बाद भी ऐसा फैसला उसने ले लिया। शुक्रवार की दोपहर को उस बच्चे का शव रमन्नापेट के रेलवे ट्रैक के पास मिला।

इस पूरे मामले पर वहाँ के डीसीपी नारायण रेड्डी ने बताया कि, गुरुवार देर रात हमें एक शिकायत मिली थी। इसमें 13 साल के छात्र चरण के लापता होने की बात कही गई। तत्काल गुमशुदगी का केस दर्ज कर लिया गया था। जांच में यह पता चला कि स्कूल मैनेजमेंट ने क्लास मॉनिटर के इलेक्शन करवाए थे। इसमें चरण एक छात्रा से हार गया। इसके बाद से ही वह निराश था। 

आगे रेड्डी ने कहा कि, हार से परेशान होकर उस बच्चे ने खुदखुशी कर ली थी। अभी उस बच्चे के शव को पोस्टमार्टम के लिए वहाँ के अस्पताल भेजा गया है। अगर उस बच्चे के माँ-बाप स्कूल के खिलाफ शिकायत करते हैं तो मामला दर्ज करके उसकी जांच की जाएगी।

ये पूरा वाकया ऐसा है कि, हर कोई इस बात की गहराई को समझ ही सकता है। क्योंकि ये समस्या इतनी बढ़ती जा रही है कि इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए कढ़े कदम उठाने की ज़रूरत है। इन बातों को हम कई तरीकों से समझ सकते हैं जिसे हम रोज़ इग्नोर करते होंगे।

भारत के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे।
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

बच्चों के मासूम मन को कैसे समझें?

बच्चों को समझने के लिए सबसे आसान तरीका होता है, उनसे हर दिन की अच्छी-बुरी बातों को। माँ-बाप का नियम बनाना चाहिए कि, रोज़ उनके साथ बैठकर हर बात को पूछें, जैसे- स्कूल में उनका दिन कैसा रहा? कौन-सी बात उनको सबसे ज्यादा अच्छी लगी और कौन-सी नहीं? खेल में उन्हें कौन-सा खेल पसंद है? वगैरह-वगैरह। अगर माँ-बाप अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज़्यादा समय बितातें हैं तो, उनके लिए बच्चों को समझना काफी आसान हो जाता है।

माँ-बाप को अपने बच्चों पर पढ़ाई को लेकर कभी भी प्रेशर नहीं बनाना चाहिए। इससे उनके मन पर गलत प्रभाव पड़ता है और जैसा वो करना चाहते हैं वो कर नहीं पाते हैं। आज हर तरफ कॉम्पीटीशन होड़ लगी पड़ी है अगर बच्चा 80% मार्क्स ला रहा है तो भी माँ-बाप उनसे नाखुश नज़र आते हैं बल्कि इसका होना उल्टा चाहिए।

इन मामलों पर माँ-बाप, स्कूल के टीचर्स के साथ-साथ सरकार को भी ठोस कदम उठाने कि जरूरत है, जिससे बच्चों के मन पर उसका पॉज़िटिव असर पड़े।

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