7 अप्रैल 2019, रविवार के दिन शौकत अली नाम के एक शख्स पर बीफ बेचने के लिए असम के बिस्वानाथ चारियाली इलाके में भीड़ नें चढ़ाई कर दी। इतना ही नहीं भीड़ ने शौकत अली को सिर्फ बेहरहमी से पीटा ही नहीं लेकिन इंसाफ के इन ठेकेदारों ने अली को सुअर का गोश्त खाने पर भी मजबूर किया।

हादसे का एक विडियो जो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है उसमे यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह भीड़ ने शौकत अली के साथ मारपीट की और उनकी राष्ट्रियता पर भी सवाल उठाए। स्थानीय पुलिस की मीडिया से बातचीत में पुलिस ने बताया कि अली करीब 35 साल से उस इलाके में अपनी दुकान लगते हैं। रविवार को भीड़ ने अली पर मार्केट में बीफ बेचने के लिए हमला कर दिया।

मारपीट के साथ-साथ विडियो में भीड़ अली से सवाल करते दिखाई दे रही है कि क्या वो बंगलादेशी हैं? क्या उनके लाइसेन्स और एनआरसी सर्टिफिकेट है? इतना ही नहीं संविधान की ठेकेदार बनी यह भीड़ सिर्फ मारपीट और सवाल पर नहीं रुकी बल्कि अली कोजबरन सुअर का मीट खाने पर भी मजबूर किया।

शौकत अली का इस हादसे के बाद असम के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है वहीं राकेश रौशन, सुपरिन्टेंडेंट ऑफ पुलिस ने The Quint से हुई बातचीत में बताया कि शौकत के एक रिश्तेदार ने इस घटना की एफ़आईआर दर्ज करा दी है और कार्यवाही की जा रही है। राकेश ने यह भी बताया कि इसी इलाके के मार्केट में काम करने वाले कारण थापा नाम के शख्स पहले भी इस भीड़ का शिकार हो चुके हैं।

असम कैटल पृवेंशन ऐक्ट, 1950 के अनुसार, “कोई भी व्यक्ति किसी भी मवेशी(दूध देने वाले पशु) की हत्या नहीं करेगा, जब तक कि वह उसके संबंध में लिखित रूप में एक हस्ताक्षर किया हुआ प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं करता है। साथ ही जिस क्षेत्र में मवेशियों की हत्या की जानी है उस क्षेत्र के पशु चिकित्सा अधिकारी की इजाज़त भी चाहिये जो यह बताती हो की पशु स्वस्थ है। वैसे तो असम में बीफ बैन नहीं है हालांकि स्लॉटर किये जाने वाले पशु की उम्र 15 साल से ऊपर होनी चाहिये। लेकिन बीफ बेचने का व्यापार करने वाले व्यापारियों के पास यह सभी चीज़े हैं इस बात का फैसला कौन करेगा कोर्ट या फिर जबरन सुअर का मीट खिलाने वाली भीड़? लेकिन बीफ बेचने का व्यापार करने वाले व्यापारियों के पास यह सभी चीज़े हैं इस बात का फैसला कौन करेगा कोर्ट या फिर जबरन सुअर का मीट खिलाने वाली भीड़?

इस तरीके की घटना हम पहली बार नहीं देख रहे हैं इससे पहले भी हम ऐसे कई घटनाओं को देख चुके हैं जहा भीड़ ही सारे मुकदमों की कार्यवाही करती नज़र आई। मीडिया में आई एक रिपोर्ट की माने तो 10 मई 2018 से जुलाई 2018 तक देश भर में करीब 16 मोब लिंचिंग के केस दर्ज हुए। 2018 में आई रिपोर्ट की मानें तो मोब लिंचिंग से तकरीबन 22 लोगों की जान गयी थी। महाराष्ट्र और त्रिपुरा ऐसे मामलों में सबसे आगे नज़र आए और अब 2019 में यह असम का मामला सामने आया है।

इन राष्ट्रभक्तों पर हसी हीं आती है क्योंकि ये एक जानवर को बचाने के लिए दूसरे जानवर को मारकर उसका मांस खिला रहे हैं। इतना ही नहीं देश में इस तरीके के माहौल का एक कारण हमारी सरकारें भी हैं जहाँ हर मसले को देशभक्ति और देशद्रोह के प्रमाणपत्र देने पर ला कर खड़ा कर दिया जाता है। दुख की बात यह है कि इससे पहले की इस तरह के केस की सुनवाई पुलिस या कोर्ट तक पहुँचे भीड़ उसका फैसला करने पहुँच जाती है। वैसे असम पुलिस ने तो ट्वीट करके कहा है कि वह अपनी कार्यवाही कर रहे हैं लेकिन चिंता का विषय यह है कि ऐसी शर्मनाक घटना को अंजाम देने के लिए भीड़ के लिए क्या सज़ा तय की जानी चाहिए। जब अपने आपको कानून का रक्षक बताने वाले ही कानून तोड़ते नज़र आएंगे तो कानून के होने न होने का क्या वजूद रह जाएगा। वीडियो नीचे दिया गया है, आप अपने विवेक का उपयोग करते हुए इसे देखें-

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