भारत हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप मनाता है. इस साल कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे हो रहे है. कारगिल युद्ध के बीसवीं सालगिरह के मौके पर भारत सरकार इस साल द्रास, लेह और राजधानी दिल्ली में जीत का जश्न मनाएगी. भारत सरकार की तरफ से आयोजित कार्यक्रमों में भारतीय सेना के संघर्षों को याद करते हुए देश पर मर मिटने वाले वीर योद्धाओं को नमन किया जाएगा. तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए हमारे वीर जवानों ने जब कारगिल पर तिरंगा फहराया था तब पूरा देश खुशी से झूम उठा था. इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने समूचे विश्व के सामने पराक्रम और वीरता की जो मिशाल पेश किया था उसे आने वाली कई सदियों तक याद किया जाएगा.

आज हम आपको कारगिल युद्ध के उस वीर सुरमा की कहानी से रूबरू कराएंगे जिसे सबसे कम उम्र में परम वीर चक्र से सम्मनित किया गया. कहते हैं इस युद्ध में उसने दुश्मन के साथ-साथ अपनी मौत को भी मात दे दी थी. हम बात कर रहे हैं भारतीय सेना के नायाब योद्धा सूबेदार योगेन्द्र सिंह यादव की.

ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव , फोटो सोर्स – गूगल

योगेंद्र यादव 18 ग्रेनेडियर्स के साथ कार्यरत कमांडो प्लाटून ‘घातक’ का हिस्सा थे. 4 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर स्थित तीन सामरिक बंकरों पर कब्ज़ा करने के लिए चिन्हित किया गया था. हजारों मीटर की उंचाई पर बैठे दुश्मन को मार गिराने का जिम्मा योगेंद्र यादव की टुकड़ी को सौंपा गया. बर्फ से ढ़के हुए 1000 फुट ऊंची चट्टान पर योगेंद्र यादव की टुकड़ी ने चढ़ना शुरू किया. अभी टुकड़ी आधे रास्ते पर ही पहुंची थी कि दुश्मन ने मशीनगन से अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरु कर दी. इस हमले में प्लाटून कमांडर और दो अन्य साथी शहीद हो गए. योगेंद्र यादव वहां रुकना चाहते थे लेकिन, उनके पास अपने साथियों के लिए आंसू बहाने तक का समय नहीं था.


चूंकि दुश्मन को उनके आने की भनक लग गयी थी इसलिए उनके अफसर ने एक दूसरे रास्ते से दुश्मन तक पहुंचने का प्लान बनाया लेकिन, ये रास्ता मुश्किलों से भरा हुआ था. टुकड़ी को एक खड़ी चट्टान की मदद से ऊपर पहुंचना था. उससे पहले किसी को चोटी पर पहुंचकर दुश्मन का ध्यान भटकाना था जिससे, प्लाटून को चढ़ने का मौका मिल सके.
ऐसे मौके पर योगेंद्र यादव और उनके दो साथियों ने सामने आकर कहा कि हम जाएगे. रस्सीयों की मदद से योगेंद्र यादव 60 फीट खड़ी चढ़ाई चढ़ कर चोटी पर पहुंच गए. गंभीर रूप से घायल योगेंद्र यादव दुश्मन के बंकर में घुस गए और एक ग्रेनेड से चार पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया. हमला होते देखकर कुछ दूर पर मौजूद दूसरे बंकर में छिपे दुश्मनों ने ग्रेनेड से हमला शुरु कर दिए, इसी बीच पीछे से आ रही प्लाटून को चट्टान पर चढ़ने का मौका मिल गया. इसके बाद योगेंद्र यादव ने अपने दो साथी सैनिकों के साथ दूसरे बंकर पर हमला किया. हाथ से हाथ की लड़ाई में चार पाकिस्तानी सैनिकों को ढ़ेर कर दिया.

इसी बीच एक पाकिस्तानी सैनिक अपनी बचा कर भागने में सफल हो गया. भागे हुए पाकिस्तानी सैनिक ने योगेन्द्र की टुकड़ी की जानकारी अपने साथियों को दे दी. पाकिस्तानी अधिकारी ने तुरंत भारतीय टुकड़ी को रोकने का आदेश दिया. पाकिस्तानी टुकड़ी पूरी तैयारी के साथ चोटी पर आई और छुपकर भारतीय टुकड़ी के पास आने का इंतजार करने लगे. ताकि सही समय पर हमला किया जा सके.

दूसरी तरफ योगेन्द्र के कई साथी शहीद हो चुके थे. खुद योगेंद्र यादव को कई गोलियां लग चुकी थी. लेकिन उनकी सांसे अभी चल रही थी. इसी बीच एक दुश्मन उनकी ओर आया तो उन्होंने मरने का नाटक कर लिया. दुश्मन आया और उन्हें मरा समझकर आगे बढ़ गया. दुश्मन की यही सबसे बड़ी गलती थी. योगेन्द्र यादव ने मौका पाकर पास में पड़ा ग्रेनेड उठाया और दुश्मन पर फेक दिया. इस हमले में कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. योगेंद्र यादव ने चतुराई दिखाते हुए जगह बदल-बदल कर दुश्मन पर फायरिंग करने लगे. जिससे दुश्मन को भ्रम हुआ कि भारतीय सेना की दूसरी टुकड़ी वहां तक पहुंच गई है. इस डर से पाकिस्तानी सेना बंकर छोड़ कर वहां से भाग निकले.

कारगिल युद्ध के दौरान हाथ पर लगे ज़ख्मों के निशान, फोटो सोर्स: गूगल

इस मुठभेड़ में योगेन्द्र बुरी तरह घायल हो चुके थे. योगेन्द्र यादव के सिर से खून बह रहा था. जिस वजह से वह ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे और उनका बायाँ हाथ भी काम नहीं कर रह था . खून से लथपथ होने के बावजूद भी उनका हौंसला नहीं टूटा. दूसरी टुकड़ी का इंतजार न करते हुए योगेंद्र यादव ने पहाड़ी में खिसकना शुरु कर दिया और जल्द ही नीचे अपने साथियों के पास पहुंचने में सफल रहे. घायल योगेंद्र यादव की हालत देखकर साथियों की आंखे नम हो गई लेकिन योगेन्द्र यादव की बहादुरी देखकर सीना गर्व से भर गये. इससे पहले कि उन्हें उपचार के लिए बेस कैंप में भेजा जाता उन्होंने पाकिस्तानी दुश्मन की सही जानकारी सेना को सौंप दी थी. बेहोशी की हालत में योगेंद्र यादव से जब उनके सीओ खुशहाल सिंह चौहान ने पूछा, क्या तुम मुझे पहचान रहे हो? तब टूटती हुई आवाज़ में योगेंद्र यादव बोले, ‘साहब मैं आपकी आवाज़ पहचानता हूँ. जय हिंद साहब.’ अपने सीओ को योगेंद्र यादव ने बताया कि दुश्मनों ने टाइगर हिल खाली कर दिया दिया है और वो अब हमारे एमएमजी बेस पर हमला करने आ रहे हैं. इतना कहते हुये योगेंद्र यादव बेहोश हो गए. इसके बाद भारतीय जवान टाइगर हिल की चोटी पर जाकर पाकिस्तानियों के आठ बंकरों में से एक बंकर पर कब्ज़ा कर लिया.”

योगेन्द्र यादव को उनकी असाधारण वीरता के लिए भारत का सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र दिया गया.

परमवीर चक्र से सम्मनिक योगेंद्र यादव, फोटो सोर्स – गूगल

योगेंद्र यादव का जन्म 10 मई 1980 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहिर गांव में हुआ था. उनके पिता करण सिंह यादव कुमाऊं रेजिमेंट के जवान थे. योगेंद्र के पिता 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान बीच हुई जंगों में शामिल थे. पिता अक्सर योगेंद्र यादव को सेना की वीरता के किस्से सुनाया करते थे. पिता की कहानियों से प्रेरित होकर योगेंद्र यादव बचपन से ही सेना में भर्ती होने का सपना देखने लगे थे. बड़े होते ही योगेंद्र यादव ने अपना सपना पूरा किया. महज 16 साल की उम्र में योगेंद्र यादव भारतीय सेना में शामिल हो गए थे.

शादी के 15 दिन बाद ही कारगिल युद्ध के लिए आया बुलावा

अपनी ट्रेनिंग खत्म करने के कुछ साल बाद ही योगेन्द्र की शादी हो गई. साल 1999 में वह शादी के बंधन में बंध गये. शादी हुये अभी सिर्फ 15 दिन ही गुजरे थे कि सेना मुख्यालय से एक उनके नाम एक आदेश आया कि योगेंद्र यादव को जल्द से जल्द कारगिल पहुंचकर रिपोर्टिंग करना है. परिवार और अपनी नई शादी के बारे में सोचकर योगेंद्र यादव थोड़ा दुखी हुये लेकिन,इस दुख से ज्यादा वो इस बात से खुश थे कि इतनी जल्दी देश के लिए लड़ने का मौका मिला है. बिना समय गवाएं योगेंद्र यादव जम्मू कश्मीर के लिए निकल पड़े और वहाँ पहुंचकर अपनी बटालियन ज्वॉइन की.

योगेंद्र यादव की तरह ही कारगिल युद्ध में शामिल होने वाले भारत के हरेक जवानों को कच्चा चिट्ठा का सलाम!