इरफान खान, क्या है, कितना है और कहाँ तक है, यह बताने की शायद अब जरुरत नहीं है. सारी बातें वर्त्तमान काल में हो रही हैं.

मैं जनता हूँ कि शरीर नष्ट हो चुका है. लेकिन सिर्फ शरीर. रोज कई लोग मरते हैं, पर दिल हर मौत पर यूं भारी नहीं हो जाता. कल का दिन बहुत भारी था. मैं खबर सुनने के बाद से बेचैन रहा. बेहद बेचैन. कमरे से हॉल में जाता, हाल से बालकनी फिर वापिस कमरे में आकर लेट जाता. कुछ करने का मन नही होता, कुछ पढने का मन नहीं होता. मन उचाट सा हो गया था. ये सारी बातें भूत काल में हो रही हैं.

बहुत दिनों बाद कल ट्विटर देख रहा था. मुझे प्रसन्ना का एक ट्वीट दिखा. ट्वीट में कुछ तस्वीरें थी और थोडा टेक्स्ट. मैनें तस्वीरों को सेव कर लिया. सब कुछ करने के बाद देर शाम 6 बजे मैं उस तस्वीर और ट्वीट को लेकर कुछ-कुछ पढने लगा. मुझे प्रसन्ना के कुछ और ट्वीट दिखें. मैं उन्हें देखता जा रहा था और मेरे चेहरे पर मुस्कान आते जा रही थी. मैं एक अलग इरफान देख रहा था. जिसे मैंने नहीं देखा था. थोडा बहुत जानता था पर इतने विस्तार से उस इरफ़ान को जानना कितना सुखद था यह बताया नहीं जा सकता.

इरफान एक शानदार एक्टर होने के साथ हीं एक बेहद शानदार इंसान भी थे. कल कई लोगों ने उनके खुद के धर्म पर किए उनके कमेंट्स भी दिखा रहे थे और बता रहे थे कि वाह क्या बेहद शानदार इंसान थे. लेकिन मेरे हिसाब से धर्म बहुत संकरी चीज है इरफान को समझने के लिए. उन्हें समझना है तो आपको प्रसन्ना की नज़र से समझना होगा.

कौन हैं प्रसन्ना?

इरफ़ान के टीचर और एक शानदार थियेटर डायरेक्टर, एक्टिविस्ट और बहुत कुछ. इरफान के एन एस डी के दिनों में प्रसन्ना ने उन्हें पढ़ाया है. उन्हें डायरेक्ट किया है.

‘ब्लू हॉर्सेज ओन रेड ग्रॉस’ नाटक के दृश्य जिसे प्रसन्ना ने डायरेक्ट किया था.

इफरान के चले जाने के बाद प्रसन्ना लिखते हैं कि:

इरफान पहले एक छात्र के तौर पर आएं, फिर एक अच्छे दोस्त बनें और उसके बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता.

क्या नाटक किया उसने, पर्दा गिरते हीं लोगों ने खूब तालियाँ बजाई.

इरफान एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर प्रसन्ना के खाड़ी ग्राम उद्योग के काम से जुड़े. बदनवाल सत्याग्रह आश्रम, मैसूर, 1925 में स्थापित यह आश्रम शुरू से हीं खादी और गाँव के लोगों के लिए कार्य करता रहा. इसकी स्थापना गांधीवादी रामचंद्र राव ने की थी. खुद गाँधी जी दो बार इस आश्रम में आ चुके हैं और उन्होंने इसके कामों की खूब सराहना भी की.

प्रसन्ना 2015 से इस आश्रम से जुड़े हैं. उसी वक़्त इरफान भी अपनी फ़िल्मी लाइफ से ब्रेक लेने की सोच रहे थे. प्रसन्ना ने कहा और इरफ़ान अपनी पत्नी के साथ मैसूर के बदनवाल सत्याग्रह आश्रम पहुच गये. लोगों ने यह भी कहा कि उनके आने से आन्दोलन को खूब बल मिला. इरफान ने वहां के हर काम को बहुत तरीके से देखा और समझा.

उसके करीब बारह महीने बाद जब हैण्डमेड आइटम्स का सिम्पोजियम हुआ तो वहां भी अपनी उपस्थिति दर कराई.  यह सारी चीजें बताती हैं कि इरफान जिन्दगी से कितने करीब थे.

जिन्दगी के करीब होने से मतलब है जिन्दगी को समझने का. उन्होंने बहुत करीब से सफलता और असफलता, एक्सेप्टेंस और रिजेक्शन हर चीज देखा है. हम उदास हैं, लेकिन शायद जो गया है उसने अपने हिस्से का सबसे महत्वपूर्ण काम कर लिया है. मुझे यहाँ ओशो की किताब ‘द आर्ट और डाइंग’ की याद आती है:

Death is an organic, integral part of life, and it is very friendly to life. Without it life
cannot exist. Life exists because of death; death gives the background. Death is, in fact, a
process of renewal. And death happens each moment. The moment you breathe in and the
moment you breathe out, both happen. Breathing in, life happens; breathing out, death
happens. That’s why when a child is born the first thing he does is breathe in, then life
starts. And when an old man is dying, the last thing he does is breathe out, then life
departs. Breathing out is death, breathing in is life — they are like two wheels of a bullock
cart. You live by breathing in as much as you live by breathing out. The breathing out is
part of breathing in. You cannot breathe in if you stop breathing out. You cannot live if
you stop dying. The man who has understood what his life is allows death to happen; he
welcomes it.