अभिषेक कुमार पेशे से फौजी है साथ में गाते भी बहुत खूब हैं. पर जब कभी ज़्यादा भावुक हो जाते हैं तो कविताएं लिख देते हैं. ये कविता उनकी भावनाओं की परिचायक और परिणाम है.

पुलवामा में हुए हमले से पूरा देश आहत है. लोग अपने-अपने हिस्से की प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं. हर कोई दोषियों को सज़ा देना चाहता है. जायज बात भी है. पर इन सब के लिए युद्ध की मांग कितनी जायज है. इस पर एक बार सोचा जाना चाहिए. एक नज़र उन सैनिकों की तरफ भी डालिए और उनके बारे में सोचिए कि ऐसे समय में उनकी मनोस्थिति क्या होगी?

जंग में जानें जाती हैं, परिवार उजड़ते हैं. सैनिक शहीद होते हैं. इस कविता के जरिये अभिषेक आपको एक फौजी का हाल-ए-दिल बताने की कोशिश कर रहे हैं.

ये कविता उन लोगों को ज़रूर पढ़नी चाहिए जो जिन्हें लगता है युद्ध हर समस्या का समाधान हैं.

हाँ,
तुम बनाओ युद्ध
तुम मनाओ युद्ध
विश्वास करो इतना
कि दस के बदले
पचास काट आएंगे हम
हम सबकी “शांति” के लिए…

बस एक इल्तिजा है तुमसे
मेरी रुखसती के बाद
भर आना मेरे पिताजी के लिए
गुसलखाने में पानी
पका देना खाना मेरी माँ के लिए
जब वो काम पे जाए
पोछ देना मेरे पड़ोसियों के आंसू
अपने किसी रेशमी रुमाल से
दिला देना मेरी मृत्यु का खर्च
जल्द अपनी सरकार से…

और भर आना मेरी प्रेमिका को
अपनी बाहों में कसकर, के
आखिरी प्यार तुम्हें, तुम्हारे
प्रेमी ने भेजा है…

और हाँ,
मत बनवाना मेरी कोई मूर्ति या प्रतिमा
मुझे कौवों की टट्टी और
कुत्तों के पेशाब से उतनी ही घिन आती है,
जितनी तुम्हें…

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