1963 में मध्यप्रदेश के इंदौर में जन्मे आशुतोष दुबे वैसे तो कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते हैं. पर कविताएं हिंदी में लिखते हैं. हमारी जानकारी में अब तक इनकी कविताओं की दो किताबें छप चुकी हैं. यकीन की आयतें (राजकमल प्रकाशन) और असंभव सारांश (वाणी प्रकाशन).

आशुतोष दुबे अपनी कविताओं के लिए ‘केदारनाथ अग्रवाल सम्मान’ पा चुके हैं. इनकी कविताओं में भतेरी उपमाएं देखने मिलती हैं. आशुतोष दुबे अपनी कविताओं में कल्पना का बिंब कुछ इस तरह रचते हैं कि इनकी कविताएं सरलता और सहजता के बीच ठिठकते हुए नज़र आती हैं. आज हम आपको उनकी ऐसी ही एक कविता पढ़वा रहे हैं –

पढ़िए आशुतोष दुबे कविता – ‘किसी दिन’

बहुत पुरानी चाबियों का एक गुच्छा है
जो इस जंग लगे ताले पर आज़माया जाएगा
जो मैं हूँ
मुझे बहुत वक़्त से बंद पड़ी दराज़ की तरह खोला जाएगा
वह ढूँढ़ने के लिए जो मुझमें कभी था ही नहीं

जो मिलेगा
वह ढूँढ़ने वालों के लिए बेकार होगा

जो चाबी मुझे खोलेगी
वह मेरे बारे में नहीं, अपने बारे में ज़्यादा बताएगी

मैं एक बड़ी निराशा पर जड़ा एक जंग लगा ताला हूँ
मुझे एक बाँझ उम्मीद से खोला जाएगा
झुँझलाहट में इस दराज़ को तितर-बितर कर दिया जाएगा
शायद उलट भी दिया जाए फ़र्श पर
कुछ भी करना
झाँकना, टटोलना, झुँझलाना,
फिर बन्द कर देना
मैं वहाँ धड़कता रहूँगा इंतज़ार के अंधेरे में

मुझे एक धीमी-सी आवाज़ खोलेगी किसी दिन

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