कबीर अपने आप में हिंदी साहित्य की एक परंपरा हैं. हिंदुस्तान की रूढ़ियों के चिथड़े उड़ाने का काम कबीर करते हैं. हिंदू-मुस्लिम दोनों ही धर्मों के आडंबरों की आलोचना कबीर अपनी रचनाओं में करते दिखाई देते हैं.

कबीर की भक्ति पर अनेकों किताबे लिखी गई हैं अब भी लिखी जा रही हैं और न जाने कितने ही लोग उनकी कविताओं को अपना रिसर्च का विषय चुनते हैं. कबीर फकीर थे. आज की कविता में पढ़िए उनकी वही रचना जिससे उनकी फकीरी झलकती है.

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या?

खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या?

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