सोहनलाल द्विवेदी हिंदी कविता की दुनिया का एक बड़ा नाम हैं. उनकी रचनाओं मे आज़ादी और देश भक्ति का स्वर सुनाई पड़ता है. 1969 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पाने वाले कविराज को भारत में राष्ट्रकवि की उपाधि प्राप्त है.इनकी कविताएं जनता के मन में राष्ट्र चेतना को पैदा करने का काम करती थी.

लेकिन आज हम जो कविता हम आपको पढ़वा रहे हैं, ये कोशिशों में लगे लोगों के प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए कई बार सुनाई जाती है. इस कविता को कई बार हरिवंशराय बच्चन के नाम से सुनाते देखे गए हैं. लेकिन असल में इस कविता के रचयेता पंडित सोहनलाल द्विवेदी ही हैं.

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती