उदय प्रकाश चर्चित कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार हैं। इनकी कुछ कृतियों के अंग्रेज़ी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद भी उपलब्ध हैं। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित (भाषांतरित/ Translated) हैं। इनकी कई कहानियों के नाट्यरूपांतर (Dramatization) और सफल मंचन (Staging) हुए हैं।

‘उपरांत’ और ‘मोहन दास’ के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उदय प्रकाश ख़ुद भी कई टीवी धारावाहिकों के निर्देशक और पटकथाकार (Screenwriter) रहे हैं। सुप्रसिद्ध राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बहु चर्चित लघु फिल्में (Short Films) प्रसार भारती के लिए निर्देशित-निर्मित की हैं। भारतीय कृषि के इतिहास पर महत्वपूर्ण पंद्रह कड़ियों (Episodes) का सीरियल ‘कृषि-कथा’ राष्ट्रीय चैनल के लिए निर्देशित कर चुके हैं।

उदय प्रकाश, फोटो सोर्स- गूगल
उदय प्रकाश, फोटो सोर्स- गूगल

चलिये आज आपको पढ़ाते हैं कवि उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कविता

‘कुछ बन जाते हैं’

तुम मिसरी की डली बन जाओ

मैं दूध बन जाता हूँ

तुम मुझमें

घुल जाओ।

तुम ढाई साल की बच्ची बन जाओ

मैं मिसरी घुला दूध हूँ मीठा

मुझे एक सांस में पी जाओ।

अब मैं मैदान हूँ

तुम्हारे सामने दूर तक फैला हुआ।

मुझमें दौड़ो।

मैं पहाड़ हूँ

मेरे कंधों पर चढ़ो और फिसलो।

मैं सेमल का पेड़ हूँ

मुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और

मेरी रुई को हवा की तमाम परतों में

बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह

उड़ जाने दो।

ऐसा करता हूँ कि मैं

अखरोट बन जाता हूँ

तुम उसे चुरा लो

और किसी कोने में छुप कर

उसे तोड़ो।

गेहूं का दाना बन जाता हूँ मैं,

तुम धूप बन जाओ

मिट्टी-हवा-पानी बन कर

मुझे उगाओ

मेरे भीतर के रिक्त कोषों में

लुका-छिपी खेलो या कोंपल होकर

मेरी किसी भी गांठ से

कहीं से भी

तुरंत फूट जाओ।

तुम अंधेरा बन जाओ

मैं बिल्ली बन कर दबे पांव

चलूँगा चोरी-चोरी।

क्यों न ऐसा करें

कि मैं चीनी मिट्टी का प्याला बन जाता हूँ

और तुम तश्तरी

और हम कहीं से

गिर कर एक साथ

टूट जाते हैं सुबह-सुबह।

या मैं गुब्बारा बनता हूँ

नीले रंग का

तुम उसके भीतर की हवा बन कर

फैलो और

बीच आकाश में

मेरे साथ फूट जाओ।

या फिर…

ऐसा करते हैं

कि हम कुछ और बन जाते हैं…

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