ऐसा लगने लगा है कि अब आम आदमी पार्टी की स्थिति कुछ ठीक नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला कि लोकसभा चुनाव में पार्टी पिछले चुनाव की तुलना में कुल चार सीटों से एक सीट पर आ गई। जबकि देश के नौ राज्यों में आम आदमी पार्टी के कुल 40 प्रत्याशी सांसद बनने के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे थे।

एक और वजह ये भी है कि साल 2013 और साल 2015 में पार्टी के पास कई प्रमुख चेहरे थे। लेकिन, अभी फिलहाल अरविन्द केजरीवाल ही पार्टी के पालनहार हैं। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल बिना किसी लोकप्रिय चेहरे के कितना कमाल कर पाएंगे?

हाल ही में चांदनी चौक से आम आदमी पार्टी की विधायक अल्का लांबा ने पार्टी को टाटा बाय-बाय बोल दिया था। उनके इस्तीफे का कारण बिल्कुल स्पष्ट था क्योंकि पिछले कुछ महीनों से उन्होंने पार्टी से बिल्कुल दूरियां बना रखी थी। ऐसे में ये होना लाज़मी था।

अल्का लांबा, फोटो सोर्स: गूगल
अल्का लांबा, फोटो सोर्स: गूगल

अब सवाल ये था कि आखिर अल्का लांबा जाएंगी कहां? इसके लिए एक ही विकल्प था और वही हुआ भी। अल्का लांबा 6 साल कांग्रेस से अलग रहने के बाद एक बार फिर कांग्रेस में शामिल हो गईं। इसके आसार तो उसी वक्त से नज़र आने लगे थे जब राजीव गांधी मामले में अल्का लांबा ने केजरीवाल के खिलाफ बोला था। कांग्रेस में शामिल होने के बाद अल्का लांबा दिल्ली के चांदनी चौक से विधानसभा चुनाव लड़ सकती हैं। ऐसी संभावना है।

यहां सवाल यह है कि आखिर कब तक एक-एक कर के ‘आप’ के नेता पार्टी छोड़ते रहेंगे? यह बात केवल अल्का लांबा तक रहती तो समझ में आता लेकिन, इसके पहले भी जिन नेताओं ने पार्टी छोड़ी है उनमें से किसी को निकाला गया है तो कइयों ने पार्टी छोड़ते हुए ये कहा कि अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार की राजनीति कर रहे हैं। आशीष खेतान, कुमार विश्वास, आशुतोष, कपिल मिश्रा, योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और शाज़िया इल्मी, ऐसे कई सारे नेता हैं जो कभी ‘आप’ के लिए प्रमुख चेहरा हुआ करते थे लेकिन, आज तस्वीर कुछ अलग है।  

अन्ना हज़ारे के साथ अरविन्द केजरीवाल और अन्य, फोटो सोर्स: गूगल
अन्ना हज़ारे के साथ अरविन्द केजरीवाल और अन्य, फोटो सोर्स: गूगल

अरविन्द केजरीवाल ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी मनीष सिसोदिया के साथ मिल कर 26 नवबंर 2012 में आम आदमी पार्टी को ऑफिशियल तौर पर राजनीति में शामिल किया था। लेकिन अभी एक साल भी नहीं हुआ था कि पार्टी में बिखराव होना शुरु हो गया। 28 दिसम्बर 2013 को अरविन्द केजरीवाल पहली बार जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बनें तो उनके साथ वो सभी लोग थे जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने में उनके साथ थे। लेकिन, जब 49 दिनों के बाद यानि 14 फरवरी को केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो उनके साथियों और उनके बीच अनबन शुरु हो गई थी।

यहीं से शुरु हुआ इस्तीफे का सिलसिला जो अभी तक चल रहा है। पार्टी में सबसे पहले दरार की शुरुआत हुई शाजिया इल्मी से। शाजिया फाउंडर मेंबर्स में से एक थीं। शाजिया का कहना था कि पार्टी के अंदर लोकतंत्र की कमी है। मतलब साफ है, जिस लोकतंत्र का हवाला देकर अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी बनाई थी अब उसी में कमी नज़र आने लगी थी। ऐसे में शाजिया इल्मी पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो गईं।

 शाजिया इल्मी, फोटो सोर्स: गूगल
शाजिया इल्मी, फोटो सोर्स: गूगल

इसके बाद पार्टी को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब पार्टी के फाउंडर मेंबर्स में से योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण ने एक साथ पार्टी छोड़ दी। तब उन पर आरोप लगे कि वो दोनों आम आदमी पार्टी के भीतर केजरीवाल की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। बाद में पार्टी से निकलते ही दोनों ने ‘स्वराज अभियान’ नाम से अपनी एक अलग पार्टी बना ली। इन दोनों के पार्टी छोड़ने के बाद मयंक गांधी ने भी पार्टी छोड़ दी। वजह बताई कि केजरीवाल ‘गटर वाली राजनीति’ कर रहे हैं।

इन सब के निकलने के बाद ऐसा लगने लगा कि शायद पार्टी में अब कुछ बचा ही नहीं लेकिन, फिर केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के साथ मिल कर पार्टी को संभाला। साल 2017 में एक और कांड हुआ जब केजरीवाल के सबसे करीबी माने जाने वाले कपिल मिश्रा ने भी पार्टी छोड़ दी। इसके बाद आम आदमी पार्टी महज ‘आम पार्टी’ बन कर रह गई। पार्टी से निकलने के बाद ही कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर आरोप लगाया कि केजरीवाल को कैबिनेट मंत्री सत्येन्द्र जैन से 2 करोड़ रुपये मिले हैं।

कपिल मिश्रा, फोटो सोर्स: गूगल
कपिल मिश्रा, फोटो सोर्स: गूगल

जब साल 2012 में मनीष सिसोदिया ने आम आदमी पार्टी की फाउंडर लिस्ट जारी की थी तो, उसमें एक नाम बड़ी जोरों-शोरों से लिया जा रहा था क्योंकि इस नाम का अपना एक अलग ही अंदाज था। युवाओं के बीच इसकी शायरी काफी पॉपुलर हो रही थी। कुमार विश्वास। लेकिन अचानक से केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच दरार की खबरें आनी शुरु हो गईं। यह खबर इसलिए भी अहम थी क्योंकि केजरीवाल कभी कुमार विश्वास को अपना ‘भाई’ कहते थे। ऐसे में जो कुमार अभी तक शायरी के साथ विरोधियों का जवाब देते थे अब विश्वास के साथ केजरीवाल के सामने डट गए थे।

कुमार विश्वास, फोटो सोर्स: गूगल
कुमार विश्वास, फोटो सोर्स: गूगल

वजह भी काफी गंभीर थी। राज्यसभा में कुमार विश्वास की जगह संजय सिंह को भेजा गया। फिर क्या, यहीं से शुरु हो गया आम आदमी पार्टी vs कुमार विश्वास। पार्टी ने उन्हें निकाला तो नहीं है। वो अभी भी कागजों में पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वो हमेशा कुछ न कुछ पार्टी के खिलाफ करते या बोलते रहते हैं। जब पार्टी ने उनकी जगह संजय सिंह को राज्यसभा भेजा था तो उस वक्त उनका पहला बयान आया था-

अरविन्द ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा था कि हम आपको मारेंगे लेकिन, शहीद नहीं होने देंगे। इसलिए मैं उनकी शहादत स्वीकार करता हूँ। सिर्फ एक निवेदन करता हूँ कि मैं तो आपका छोटा भाई हूँ। युद्ध का भी एक नियम होता है कि शव के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।

बयान के बाद 31 अक्टूबर 2017 को पार्टी ने कुमार विश्वास को प्रवक्ताओं की लिस्ट से बाहर कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कुमार को राजस्थान के प्रभारी पद से हटा कर दीपक वाजपेयी को ये जिम्मेदारी दे दी गई। साथ ही साथ कुमार को पंजाब में चुनाव से दूर रखा गया। ऐसे में ये माना जाए कि अब पार्टी पूरी तरह से कुमार को भूल चुकी है तो, ऐसा कहना गलत नहीं होगा।

इस तरह से आने वाले समय में अगर गोपाल राय भी ‘आप’ को छोड़ देते हैं तो 2020 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया ही बचेंगे जो लोकप्रिय चेहरे होंगे। ऐसे में अगले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल कितना कमाल कर पाते हैं वो भी बिना लोकप्रिय चेहरों के ये तो चुनाव के नतीजें ही बताएंगे।