भारत एक लोकतांत्रिक देश है. इसलिए यहां होते हैं चुनाव. चुनाव के लिए पार्टियों को चाहिए होता है चंदा. ये चंदा कौन देता है, कहां से आता है. इसको लेकर जानकारी न के बराबर होती है. इसी के चलते लगातार ये सवाल उठते रहते हैं कि कहीं ये पैसे हवाला के तो नहीं हैं. कहीं पार्टियां या फिर कॉर्पोरेट, काले धन के जरिए चुनाव लड़ या लड़वा तो नहीं रहे हैं. इसको लेकर संसद से सड़क तक बहस भी देखने को मिलती रहती हैं. हालांकि, 2017-2018 के वित्त वर्ष के दौरान, चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए मोदी सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आई थी. इसके तहत चुनावी चंदे को बॉन्ड में बदलना था. इसे ऐसे समझिए कि जो भी (कॉर्पोरेट हाउसेज, बिजनेस मैन या आम आदमी) पॉलिटिकल पार्टियों को चंदा देना चाहता है. उसे सबसे पहले रकम को बैंक में जमा कर उससे इलेक्टोरल बॉन्ड लेना होगा. जिसे वो किसी भी पार्टी को फंड के तौर पर दे सकता है. फिर वो पार्टी इस बॉन्ड को बैंक में जमा करके पैसे हासिल कर सकती है. यह एक तरह का लिखित दस्तावेज होता है.

इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर भ्रष्टाचार की बात सामने आ रही है, फोटो सोर्स: गूगल

इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर भ्रष्टाचार की बात सामने आ रही है, फोटो सोर्स: गूगल

लेकिन, इसको लेकर भी अब बवाल शुरू हो गया है. कहा जा रहा कि भाजपा ने इसके जरिए भ्रष्टाचार किया है. नियमों को ताक पर रखा गया है. RTI के हवाले से यह बात सामने आई है कि RBI और चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड पर आपत्तियां जताई थी. उनका कहना था कि,

यह योजना पारदर्शी नहीं है, मनी लॉन्ड्रिंग बिल को कमजोर करती है और वैश्विक प्रथाओं के खिलाफ है. इससे केंद्रीय बैंकिंग कानून के मूलभूत सिद्धांतों पर ही खतरा उत्पन्न हो जाएगा. चुनाव आयोग ने देन-दाताओं के नामों को उजागर न करने और घाटे में चल रही कंपनियों को बॉन्ड खरीदने की अनुमति देने को लेकर चिंता जताई थी.

एक अन्य RTI द्वारा यह भी खुलासा हुआ है कि, कानून मंत्रालय ने सुझाव दिया था कि

इलोक्टोरल बॉन्ड जारी करते समय न्यूनतम शेयर की आवश्यकता या तो 6 फीसदी होनी चाहिए या बिल्कुल नहीं. इस समय वोट शेयर 1 फीसदी है. जबकि, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि 2,487 गैर-मान्यता प्राप्त दलों में से 1 फीसदी शेयर किसके पास है.

सरकार पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि

स्टेट बैंक के पास बॉन्ड खरीदने वालों की जानकारी है तो, सत्ता में रहने वाली सरकार यह आसानी से पता कर सकती है कि बॉन्ड किसने और किसके लिए खरीदा है.

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी, फोटो सोर्स: गूगल

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी, फोटो सोर्स: गूगल

संसद के शीतकालीन स्तर में भी इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर खूब हंगामा हुआ है. कांग्रेस नेता मनीष तीवारी ने लोकसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार पर आरोप लगाया है कि

2017 से पहले इस देश में एक मूलभूत ढांचा था. उसके तहत जो धनी लोग हैं उनका भारत की सियासत में जो पैसे का हस्तक्षेप था, उस पर नियंत्रण था. लेकिन, 1 फ़रवरी 2017 को सरकार ने जब यह प्रावधान किया कि अज्ञात इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए जाएं जिसके न तो दानकर्ता का पता है और न जितना पैसा दिया गया उसकी कोई जानकारी है और न ही उसकी जानकारी है कि यह किसे दिया गया. उससे सरकारी भ्रष्टाचार पर लीपा-पोती की जा सकती है.

वो आगे कहते हैं

इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम सिर्फ चुनावों तक सीमित थी. लेकिन, 2018 में एक RTI में सामने आया कि सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर RBI के विरोध को भी दरकिनार कर दिया. इस पर सरकार जवाब दे.

राहुल गांधी से लेकर तमाम कांग्रेसी नेता इसी तरह के सवाल सरकार से पूछ रहे हैं. इतना ही नहीं राहुल गांधी ने तो बाकायदा ट्वीट किया है कि

नए भारत में रिश्वत और अवैध कमीशन को चुनावी बॉन्ड कहते हैं.

रेल मंत्री पीयूष गोयल, फोटो सोर्स: गूगल

रेल मंत्री पीयूष गोयल, फोटो सोर्स: गूगल

सरकार का इसको लेकर क्या कहना है?

वहीं इस बॉन्ड को गले की फांस बनता देख केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा है कि

इलेक्टोरल बॉन्ड के जारी होने के बाद से चुनाव तंत्र में काले धन का इस्तेमाल कम हुआ है और पारदर्शिता बढ़ी है. इसको लेकर उन्होंने कुछ तर्क भी पेश किए हैं.

  • इसके तहत चंदा देने वाले को केवाईसी का पालन करना पड़ता है. जिससे काले धन की संभावना खत्म हो जाती है.
  • चंदा देने वाला सिर्फ ऑनलाइन या चेक के माध्यम से ही चंदा दे सकता है. जिससे चंदा देने में पारदर्शिता बनी रहती है.
  • चंदा लेने और देने वालों का नाम सामने नहीं आता है. इसलिए किसी को परेशानी नहीं होती.
  • यह चुनाव फंडिंग प्रक्रिया को साफ-सुथरी बनाने की पहली प्रक्रिया है, विभिन्न राजनीतिक दलों ने 12 चरणों में 6,129 करोड़ रुपये हासिल किए हैं.
  • यह सिर्फ रजिस्टर्ड राजनीतिक दल के निर्धारित अकाउंट में ही भुनाए जा सकते हैं. इसे किसी को ट्रांसफर नहीं किया जा ससकता है. इसे 15 दिन के भीतर ही भुनाना होता है. इसलिए नकदी की तरह इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता.
  • बॉन्ड हासिल करने वाले राजनीतिक दल के बैंक के पास इसकी जानकारी होती है, इसलिए जरूरत पड़ने पर इसकी जांच की जा सकती है.

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