मैं हिंदू धर्म नहीं बल्कि उसमें व्याप्त कुरीतियों का विरोधी हूँ। 18वीं सदी में जब पूरे भारत में धर्म के नाम पर अत्याचारों के बोलबाला था। हर तरफ धर्म और परंपरा को अपने तरीके से परिभाषित किया जा रहा था उस समय राजा राममोहन राय ने धर्म के बदले स्वरूप को लेकर अपना वैचारिक मत दिया।

राजा राममोहन राय, फोटो सोर्स- गूगल

22 मई 1772 यानि आज के ही दिन राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल के राधानगर में हुआ था। 16 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने अंधविश्वासों का विरोध करना शुरू कर दिया। वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के राजस्व विभाग में नौकरी करते-करते 1809 में कलेक्टर के दीवान बन गये। वैचारिक मतभेदों के चलते 1814 में उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। राजा राममोहन राय हिन्दू धर्म में मौजूद मूर्तिपूजा, बहुविवाह, बाल विवाह, सती प्रथा, अनमेल विवाह के बोलबाले से काफी दुःखी थे।

विचलित करने वाली घटना

सन 1816 में उनका सामना एक बुरी घटना से हुआ। उस समय भारत में सती प्रथा अपने चरम पर थी। उनके बड़े भाई की मृत्यु होने पर भाई की चिता के साथ उनकी पत्नी को बैठा दिया गया। इस घटना ने उन्हें विचलित कर दिया। 1823 में उन्होंने ‘हिन्दू नारी के अधिकारों का हनन’ नामक पुस्तक लिखी। जिसमें यह मांग की गई कि हिन्दू नारी को पति की सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। अंधविश्वास का कुंड बन चुके भारतीय समाज में आचार−विचार की स्वतंत्रता का श्रीगणेश यहीं से हुआ। सती प्रथा के विरोध में यह उनका पहला प्रयास था।

फोटो सोर्स- गूगल

राजा राममोहन राय ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होंने समाचार पत्रों की स्थापना, संपादन तथा प्रकाशन का कार्य किया। उन्होंने लोगों में सामाजिक चेतना पैदा करने के उद्देश्य से अंग्रेजी, बांग्ला तथा उर्दू में अखबार निकाले।

एक समाज सुधारक के रूप में उन्होंने उन सब कुरीतियों का विरोध किया, जो मानवता के विरुद्ध थीं। उन्होंने राजनैतिक सुधार कार्यों में पत्रकारिता व विचार सम्बन्धी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, प्रशासन सम्बन्धी सुधार किये। जिनमें जमींदारों से लगान की दरें कम कराना, कृषि सुधार, भारत सरकार का प्रशासनिक व्यय कम करना मुख्य रूप से शामिल रहा। एक शिक्षाविद की तरह राजा राममोहनराय ने ग्रीक, हिब्रू, अंग्रेजी, बांग्ला, संस्कृत, अरबी, फारसी व गुरुमुखी भी सीखी 1816-17 में उन्होंने अंग्रेजी स्कूल की भी स्थापना की। उन्होंने कहा कि समाज सुधार तथा धर्मसुधार एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते। एक में सुधार करने करने के लिए दूसरे में सुधार अपेक्षित है। ईश्वर ही एकमात्र सत्य है और यह ईश्वर रूपी सत्य सभी धर्मों का मत है। धार्मिक व सामाजिक विचारों के प्रसार के लिए 20 अगस्त 1828 में उन्होंने कलकत्ता में ब्रह्म समाज की स्थापना की।

ब्रह्म समाज

ब्रह्म समाज के सिद्धान्तों में उन्होंने बताया कि परमात्मा कभी जन्म नहीं लेता। वह संपूर्ण गुणों का भंडार है। परमात्मा प्रार्थना सुनता तथा स्वीकारता है। सभी जाति के मनुष्यों को ईश्वर पूजा का अधिकार प्राप्त है। पूजा मन से होती है। पाप कर्म का त्याग करना तथा उसके लिए प्रायश्चित करना मोक्ष का साधन है। संसार में सभी धर्म ग्रंथ अधूरे हैं।

फोटो सोर्स- गूगल

समाज सुधार के लिए किए गए प्रयासों का परिणाम था कि 1828 में सती प्रथा को समाप्त करने का कानून बनाया गया। उन्होंने विधवा विवाह का भी समर्थन किया था। वे सभी संस्कृतियों के समन्वय में विश्वास रखते थे। 1833 में इंग्लैंड के ब्रिस्टल नगर में इस महान समाज सुधारक की मृत्यु हो गई।

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