तब के बंबई में एक बहुत बड़ा डॉन हुआ करता था। नाम था करीम लाला। किसी को कुछ पता नहीं कि वो बंबई कब आया था। ये तीस के दशक की बात है। उस दशक में भी बंबई की एक अंतर्राष्ट्रीय छवि थी। तब का बंबई बाहें खोले हर किसी को अपने अंदर समेट लेता था। यही वजह थी कि नेपाली, बर्मी, सिलोनी और काबुलीवाले (पठान) शहर में आए और इस शहर को ही अपना घर बना लिया। इसके पीछे एक वजह थी क्योंकि उनको यहाँ रोजगार के अवसर नजर आ रहे थे। रोजगार वो, जो गलत थे और अवसर वो, जो लोगों के मन में खौफ बनाने वाले थे।

ऐसे ही किसी रोजगार के अवसर में सात फुट का लंबा चौड़ा पठान पेशावर से बंबई आता है। नाम था करीम ख़ान। उसके शहर और बंबई में बहुत अंतर था। उसके शहर में पत्थर और जंगल थे और बंबई शहर चमचमाते हीरे जैसा था। उस लड़के को ये शहर पसंद आ गया। उसे इस शहर से इश्क़ हो गया। उसने इस शहर को फिर कभी महज एक शहर नहीं कहा। वो अब इसे ‘अपना शहर’ कहता था।

करीम ख़ान से करीम लाला

करीम अनपढ़, बेरोजगार और बेहुनर था। उसे पता था कि पैसे कमाने के लिए उसे कोई न कोई रोजगार शुरू करना होगा। उसने अपनी ही गली में जिसमें वो रहता भी था, किराये की बिल्डिंग में एक जुए का अड्डा खोल दिया। सपनों के इस शहर में हर कोई किस्मत के भरोसे ही आया था। ऐसे में करीम की किस्मत का ये धंधा चल पड़ा। इस अड्डे पर हर तरह के लोग आते। वो जिनके पास खाने के पैसे तक नहीं थे और वो भी जिनके पास बहुत पैसे थे।

कुछ लोग जीतते और कुछ इतना हार जाते कि करीम से ही उधार पैसे ले लेते। करीम ने देखा कि लोगों ने उधार लेने को आदत बना लिया है। इस वजह से उसने इस पर पाबंदी लगा दी और ये घोषणा कर दी कि जितने लोगों ने उससे उधार लिया है, उन्हें अब हर महीने की दस तारीख को इसका सूद भरना होगा। अड्डे पर आने वाले कुछ लोगों को इससे काफी निराशा हुई लेकिन, ज़्यादातर को कोई फर्क नहीं पड़ा। करीम का आइडिया काम कर गया। उसने गौर किया उसकी तिजौरी में पैसे हर महीने दस गुना बढ़ रहे हैं। इस तरक्की को देख कर ही करीम ख़ान ने साहूकार यानि कि लाला बनने का फैसला किया और इस तरह से करीम ख़ान करीम लाला बन गया।

करीम लाला से मुंबई के डॉन तक का सफर

करीम लाला का जुए और सूद का धंधा खूब फल-फूल रहा था। लेकिन, वो अकेला ऐसा पठान नहीं था जो जुए के धंधे में पैसे कमा रहा हो। पूरी बंबई में तब तक कई जुए के अड्डे खुल चुके थे। पर, करीम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। लाला अच्छे पैसे बना रहा था। हाँ, एक दिक्कत हो गयी थी। करीम का जुए का अड्डा अब अपराध का अड्डा बन गया था। मार-पीट, झगड़े और ठगी अब उस जगह के लिए आम बात हो गयी थी। अब पुलिस का ध्यान करीम लाला की तरफ गया। पुलिस से होते हुए करीम की बात क्राइम ब्रांच तक जा पहुंची थी।

पर, लाला को पैसों की ताकत पता थी। उसने रिश्वत देकर सबको शांत कर दिया था। करीम की ही तरह और पठानों को दिक्कतें आने लगीं। उन्होंने लाला के आस-पास भीड़ लगानी शुरू कर दी। लाला का कद और रुतबा बंबई में तेजी से बढ़ने लगा। कुछ लोग उसे करीम दादा कह कर बुलाने लगे थे और पठानों ने उसे अपनी कबीलाई रिवाज के अनुसार उसे सरदार मान लिया था। लाला भी बदले में उनकी परेशानियों को सुनता था और मसले सुलझाता था।

करीम का नाम अब घर-घर में सबकी जुबान पर चढ़ चुका था। अनजाने में करीम और भी धंधों में कूद पड़ा। ये धंधे थे मैटर पटाना और खोली खाली करवाने के। मैटर पटाना माने कि दो लोगों के बीच के विवाद को सुलझाना और खोली खाली करवाना मतलब कि किराये का मकान खाली करवाना। इन सब की शुरुआत तो आपस के दोस्तों के बीच के विवाद को सुलझाने से हुई लेकिन, बाद में लोगों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर से करीम लाला की पंचायत ज्यादा पसंद आने लगी थी। साथ ही एक बात और थी। अदालत के फैसले को फिर भी कोई न माने लेकिन, लाला की बात को न मानने की हिम्मत किसी में थी नहीं।

लाला के घर की छत पर अब हर हफ्ते एक पंचायत लगने लगी थी। लाला विवाद सुलझाने के पैसे मांगता, लोग पैसे देकर विवाद निपटवाते। करीम का ये भी धंधा चल पड़ा था, सूद से भी ज्यादा। इतना कि लाला को ये धंधा ज्यादा रास आने लगा था। अब वो इसे और फैलाना चाहता था। धीरे-धीरे पूरी दक्षिण बंबई के सभी विवाद लाला के छत पर ही सुलझने लगे। छत अदालत थी और करीम लाला वहाँ का जज।

लाला के नाम भर से मकान खाली होने लगे थे।

लाला और उसकी छड़ी

ये पचास का दशक था। देश आज़ाद हो गया था। लाला की उम्र का किसी को कोई अंदाज़ा नहीं था लेकिन, उसके चमचों ने पचास के आस-पास उसका पचासवां जन्मदिन मनाया था। अब लाला अपने पहनावे पर काफी ध्यान देने लगा था। वो अब कलफ़ किए हुए पठानी सूट से ऊपर उठकर सफ़ेद सफारी सूट पहनने लगा था। उसका रहन-सहन तड़क-भड़क से भरा हुआ था। वह काला चश्मा पहनता था और लगभग पूरे वक़्त महँगी सिगार और पाइप पीता रहता था।

लाला को उसके एक चमचे ने एक छड़ी गिफ्ट की। पहले लाला भड़क गया और उसे डांटने लगा कि क्या वो उसे इतना बूढ़ा लगता है कि उसे चलने के लिए छड़ी का सहारा लेना पड़ेगा। पर, किसी ने उसको बताया कि ये छड़ी उसकी पर्सनालिटी में और चार चाँद लगा देगा तो, लाला पिघल गया। अब वो हर जगह उसी छड़ी को लेकर जाता। छड़ी लाला की पहचान हो गयी थी।

अगर वह मस्जिद जाता और छड़ी को छोड़कर ग़ुसल के लिए चला जाता, तो मस्जिद में कितनी ही भीड़ क्यों न हो, किसी की मजाल नहीं थी कि वह छड़ी को यहाँ से वहाँ खिसका दे या करीम की इबादत की जगह ले ले। इसी तरह, किसी सामाजिक बैठक में, अगर वह गुसलख़ाने में जाता और अपनी छड़ी को सोफ़े पर छोड़ जाता, तो उस सोफ़े पर आकर बैठने की कोई हिम्मत नहीं करता था। इस छड़ी और साधारण संसारी जीवों के बीच उसके ख़ौफ़ के काफ़ी चर्चे थे। दिलचस्प बात यह थी कि करीम लाला बिना किसी ख़ून-ख़राबे के या बिना किसी कोशिश के ताक़त की इस बुलन्दी का मज़ा ले रहा था।

चमन सिंह मेवावाला और अब्दुल क़ुरैशी जैसे मकान मालिकों ने, जो लाला की बैठकों में नियमित रूप से आया करते थे, उन्होंने महसूस किया कि हर बार जब भी उन्हें किसी बेदख़ली के लिए लाला से मिलना पड़ता है, तो उन्हें लाला और उसके गुण्डों के लिए अच्छी-ख़ासी रक़म देनी पड़ती है। इसलिए, इस ख़र्च को कम करने के लिए उन्होंने उसकी ताक़त की इस निशानी भर का इस्तेमाल करने और जितना पैसा वे उसे देते थे उसका एक छोटा–सा हिस्सा देने की जुगत भिड़ाई।

इन दोनों ने लाला से दरख्वास्त की कि वो किसी भी मकान को खाली करवाने के लिए बस इस छड़ी को भेज दिया करें। अब जब भी कभी उन्हें कोई मकान ख़ाली कराना होता, तो लाला के आदमी उस जगह पर, एक अपशकुन की निशानी की तरह, सिर्फ़ उसकी छड़ी छोड़कर चले जाते। उन्होंने पाया कि यह तरकीब लगभग हमेशा कामयाब होती थी। बहुत से किराएदार लगभग तुरन्त मकान ख़ाली कर देते और उस ख़ौफ़ जगाने वाली छड़ी को पीछे छोड़ भाग जाते।

इसके पहले तक पूरी बंबई में ऐसा दबदबा किसी का नहीं रहा था। इसने लाला की ख़ौफ़नाक ख्याती में ही इज़ाफ़ा नहीं किया बल्कि, हाजी मस्तान का ध्यान भी खींचा।

हाजी मस्तान और करीम लाला

हाजी मस्तान स्मगलिंग का धंधा करता था। ऐसे में उस पर पुलिस का खतरा भी मंडराता रहता था। उसे हमेशा से ऐसे इंसान की तलाश थी जो बिना खून-खराबे के बड़े से बड़े मामले को निपटा सके और उसके इस पैमाने में करीम लाला बिलकुल फिट बैठता था। मस्तान और लाला की तस्करी में साझेदारी हो गयी। मस्तान तस्करी का माल लाता और लाला के पास उस माल को उसकी नियत स्थान तक सुरक्षित पहुंचाने की ज़िम्मेदारी होती।

इस धंधे ने करीम लाला को पूरी बंबई में ख्याति दिला दी। नेता से लेकर पुलिस और सीआईडी, सब के जेबों में लाला के पैसे पड़े थे। ये पैसे जुबानों को सील कर देते। लाला के खिलाफ बोलने की किसी की हिम्मत नहीं थी और जिनको बोलना था उनके मुंह में नोट ठूंस दिये गए थे।

करीम लाला की ये कहानी डोंगरी टू दुबई किताब से ली गयी है।