“पाक में मेरी परछाई थी, सामने अब्बू थे, पीछे सूरज था। मैं रिफ्यूजी था। बस चलते रहना था। जैसे ही वाघा बार्डर पार किया तो, लगा कि बचपन पाक में रह गया हो। रूह और शरीर दोनों अलग-अलग हो गए हों। मैं कई वर्षों बाद जब अपनी जन्मभूमि पाकिस्तान पर लौटा तो देखा गांव का छप्पर वैसा ही था। मेरी पुश्तैनी पर कोई और परिवार रह रहा था। मुझे जिसने देखा वो मेरे से अलग होने का नाम नहीं ले रहा था। मैं चाहता था कि मैं कुछ देर एकांत में बैठकर दिल का गुबार निकालूं और रो सकूं, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका”

ये एहसास मौजूदा पाकिस्तान के दीना में जन्में उस बच्चे की है जो आज एक महान शख्सियत के रूप में तब्दील हो चुका है। लेकिन कहते हैं न एहसास कहाँ जवान या बूढ़े होते हैं। वह तो वैसे के वैसे ही अपनी उम्र में कैद हो जाया करते हैं। हम बात कर रहे हैं उर्दू ज़ुबान से अपनी पहचान बनाने वाले और बंगाली ज़ुबान से मोहब्बत रखने वाले ‘गुलज़ार साहब’ की। ये वही गुलज़ार हैं जिनको बचपन में ही माँ के गुज़र जाने से उनका प्यार नसीब न हो पाया।

18 अगस्त 1936 को अंग्रेजों के ब्रिटिश इंडिया में जन्में इस बच्चे को बचपन में ही विभाजन की वजह से अपना घर-बार, पुश्तैनी ज़मीन और हर वो चीज़ जो किसी बच्चे को उसके बचपन की यादें बनाने के लिए ज़रूरी सी होती है। वह नहीं मिल सका। लेकिन वक़्त का लिखा कौन मिटा सकता है।

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गुलज़ार, फोटो सोर्स; गूगल

हिंदुस्तान आज़ाद तो हुआ लेकिन, लाखों लाशों और परिवारों की बरबादी के साथ। इसी में से एक था समपूरन सिंह कालरा उर्फ गुलज़ार का परिवार। सरहदें बटीं तो पूरा परिवार भारत में पंजाब के अमृतसर आकर बस गया। लेकिन गुलज़ार की क़िस्मत की लकीरें उसे मुंबई शहर ले गईं। जहां वह एक गैराज में बतौर मैकेनिक का काम करने लगे। यहां भी कुछ ऐसा हुआ जिसने ये साबित कर दिया कि इंसान पेट पालने के लिए चाहे जो काम कर ले लेकिन, दिल तो क़िस्मत की लकीरों में ही लगता है।

हम बात कर रहे हैं गुलज़ार के बचपन में जन्में उस शौक की जिसने आज उनकी ज़िंदगी को एक ऐतिहासिक पहचान के रूप में देश और दुनिया के सामने खड़ा कर दिया है। यह शौक था किताबे पढ़ने का। यह शौक इस तरह दिल-दिमाग पर छाया कि गैराज के पास ही एक बुकस्टोर था, जो आठ आने(50 पैसे) के किराए पर दो किताबें पढ़ने को देता था। गुलज़ार उससे किताबे किराए पर लेते और अपने इस चस्के की भूख को मिटाते। लेकिन जनाब शेर को खून और इंसान को किताब का चस्का लग जाए तो फिर वह मिटा कहां करता है। बिलकुल ऐसा ही हुआ, इनकी भूख बढ़ती गई और यह किताब पढ़ते गए। लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे उनके हाथों की वह रेखा चमक उठी जो उनकी असल मंज़िल थी।

ऐसा क्या हुआ?

असल में जैसा कि आप जानते हैं कि जिस गैराज में गुलज़ार काम करते थे, वह मुंबई में थी और मुंबई किस दुनिया के लिए जानी जाती है उसे बताने की ज़रूरत नहीं। हुआ यूं कि एक दिन उस वक़्त के मशहूर डायरेक्टर विमल रॉय की कार ख़राब हो गयी। विमल क़िस्मत से उसी गैराज पहुंचे जहां गुलज़ार काम किया करते थे। विमल रॉय ने गैराज पर पहले गुलज़ार और फिर उनकी किताबों को देखा।

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डाइरेक्टर बिमल रॉय, फोटो सोर्स; यूट्यूब

फिर विमल रॉय ने एक सवाल पूछा- कौन पढ़ता है ये सब? गुलज़ार ने कहा- मैं! पता नहीं विमल रॉय को गुलज़ार का यह जवाब सुनकर क्या दिमाग में आया। विमल रॉय ने गुलज़ार को अपने दफ़्तर का पता देते हुए अगले दिन मिलने को बुलाया। कामयाबी की इस पहली सुबह को आज भी गुलज़ार साहब अपने सीने से यूं लगाए हुए हैं कि वह विमल रॉय के बारे में बात करते हुए आज भी भावुक हो जाते हैं। उस दफ़्तर की मुलाकात को ज़ाहिर करते हुए गुलज़ार कहते हैं कि,

“जब मैं पहली बार विमल रॉय के दफ़्तर गया तो उन्होंने कहा कि अब कभी गैराज में मत जाना!”

और उसके बाद से गुलज़ार ने कभी उस गैराज वाली ज़िंदगी की तरफ मुड़ के नहीं देखा।

गुलज़ार की ‘गुलज़ार नामा’ ज़िदगी का आगाज़

गुलज़ार ने उस गैराज की ज़िंदगी को तो अलविदा कह दिया था लेकिन, अपने किताबे पढ़ने के साथ-साथ वह गैराज में एक और काम किया करते थे। वह था खाली वक़्त में कविताएं लिखना। उनके इसी शौक ने उन्हें अगली कामयाबी की सीढ़ियों पर चढ़ाया। लेकिन कैसे? वो कहते हैं न कि हुनर को बस मौके की ज़रूरत होती है। वक़्त के पहिये ने यहां भी उनका साथ दिया और उनकी किस्मत ने उन्हें यहां भी मायूस नहीं किया।

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बंदिनी फिल्म का एक सीन, फोटो सोर्स; फिल्म सिटि वर्ल्ड

साल था 1963, फ़िल्म आई थी ‘बंदिनी’। यह बिमल रॉय की फिल्म थी। जिसमें उस वक़्त धर्मेंद्र, अशोक कुमार और नूतन जैसे बड़े स्टार थे। इस फ़िल्म के सभी गाने मशहूर गीतकार शैलेंद्र ने लिखे थे और म्यूजिक डाइरेक्टर कोई और नहीं बल्कि, म्यूजिक की दुनिया में एक बड़ा मक़ाम रखने वाले एस.डी. बर्मन थे। बिमल रॉय की वजह से यह दोनों ही तब तक गुलज़ार के अच्छे दोस्त बन चुके थे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स; शेमारू

लेकिन एसडी बर्मन के साथ कुछ अनबन होने की वजह से शैलेंद्र ने बीच में ही इस फिल्म में काम करने से मना कर दिया और गुलज़ार को बिमल से मिलने का भी प्रस्ताव दे दिया। फिर क्या, गुलज़ार बनना तो सिर्फ रायटर ही चाहते थे लेकिन, फिल्मी दुनिया ने उन्हें एक बेहतरीन गीतकार भी बना दिया। इस फिल्म में गुलज़ार ने एक गाना लिखा जिसकी काफी तारीफ़ हुई और उन्हें फिल्मी दुनिया में एक छोटा सा मक़ाम भी मिल गया। फिल्म बंदिनी का वह गाना था ‘मोरा गोरा अंग लेइ ले, मोहे श्याम रंग देइ दे’

गुलज़ार की लव मैरेज और फिर अलग हो जाना

इस गाने के बाद गुलज़ार ने एक के बाद एक अच्छे गाने लिखे। न सिर्फ गाने बल्कि, एक शायर, लेखक, गीतकार, निर्माता, निर्देशक जैसी कई पहचान उनके नाम के साथ जुड़ती चली गई। गुलज़ार ने बतौर निर्देशक अपना करियर 1971 में ‘मेरे अपने’ से शुरू किया था। फिर गुलज़ार ने संजीव कुमार के साथ मिलकर आंधी, मौसम, अंगूर और नमकीन जैसी फिल्में भी निर्देशित की। इससे पहले तक बतौर लेखक उन्होंने आशीर्वाद, आनन्द, खामोशी जैसी फिल्मों के लिए डायलॉग और स्क्रिप्ट लिखी थी। जिसकी वजह से उन्हें शोहरत की एक अलग ही बुलंदी मिल चुकी थी।

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गुलज़ार और राखी, फोटो सोर्स; गूगल

बॉलीवुड में इश्क़ का ज़िक्र हो और गुलज़ार का ज़िक्र न हो तो, यह अधूरा रह जाएगा। खैर, जब बात गुलज़ार और इश्क़ की हुई है तो इस क़िस्से के बगैर गुलज़ार की ज़िंदगी की यह कहानी मुकम्मल नहीं होगी। बात तब की है जब गुलज़ार को गुज़रे जमाने की मशहूर अदाकारा राखी से मोहब्बत हो गई थी। गुलज़ार और राखी की मुलाक़ात पहली बार एक पार्टी में हुई थी। लेकिन यहां एक परेशानी थी, वह यह की राखी पहले से ही शादीशुदा थीं। क्योंकि 15 साल की उम्र में ही राखी की शादी एक बांग्ला फिल्मकार से हो चुकी थी।

लेकिन यह शादी लंबे समय तक नहीं चली और ये रिश्ता टूट गया। फिर आखिरकार दोनों ने 15 मई 1973 को शादी कर ली। लेकिन यह शादी यूं ही नहीं हो गई बल्कि, शादी के लिए गुलज़ार ने राखी के सामने एक शर्त रखी थी कि वह कभी फिल्मों में काम नहीं करेंगी। राखी ने उस वक़्त हाँ कह दिया क्योंकि उसे उम्मीद थी कि वक़्त की धार गुलज़ार की इस शर्त की रस्सी को काट देगी और एक दिन वह आएगा जब गुलज़ार फिल्मों में काम करने की इजाज़त दे देंगे। फिर महीनों पर महीने बीतते गए लेकिन, गुलज़ार का दिल नहीं पसीजा।

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गुलज़ार और राखी, फोटो सोर्स; गूगल

उन दिनों भी आज की तरह ही गुलज़ार के पास काम की कमी नहीं थी। वह बहुत बिज़ी रहते थे और राखी खाली। जो राखी को बिलकुल पसंद नहीं था। फिर इसी बात को लेकर दोनों में झगड़े होने शुरू हो गए। राखी जब फिल्मों में काम करने की बात छेड़तीं तो गुलज़ार भड़क उठते। अब अक्सर ऐसा होने शुरू हो गया था। जो कि एक खूबसूरत रिश्ते के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं था।

फिर वह दिन भी आ गया जब गुलज़ार जैसी बड़ी शख्सियत ने अपनी बीवी को कमरे में बहुत मारा। लेकिन एक मिनट, यह पिटाई फिल्म की बात पर नहीं की गई थी। बल्कि, इसकी वजह कुछ और ही थी। असल में बात उस वक़्त की है जब कश्मीर में ‘आंधी’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। इस फिल्म की हीरोइन सुचित्रा सेन, अभिनेता संजीव कुमार से कुछ नाराज़ चल रही थीं। जिसकी वजह से गुलजार को खुद इन दोनों के बीच आकर सुचित्रा को मनाना पड़ा। बंद कमरे में घंटों गुलज़ार और सुचित्रा के बीच बात होती रही। बहुत देर समझाने के बाद आखिर सुचित्रा मान गईं और गुलजार बंद कमरे से बाहर निकले। लेकिन, जैसे ही वह उस कमरे से बाहर निकले, उनके सामने जो महिला खड़ी थी वह राखी थी।

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गुलज़ार और राखी की प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स; गूगल

गुलज़ार और राखी का यूं अचानक सामना होना उनकी ज़िंदगी में बहुत बड़ा मोड़ लेकर आया। गुलजार को रात में सुचित्रा के कमरे से बाहर आता देख राखी काफी भड़क गईं थी और उन्होंने गुलज़ार से पूछा कि इतनी रात को वह सुचित्रा के कमरे में क्या कर रहे हैं? गुलजार ने मामले को संभालने की कोशिश की लेकिन, राखी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उनकी आवाज़ इतनी तेज थी कि होटल का स्टाफ तक इकट्ठा हो गया जो गुलज़ार को बहुत नागवार गुज़रा।

फिर आखिरकार गुलजार के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने बिना सोचे-समझे राखी पर हाथ छोड़ दिया। बाद में होटल के स्टाफ के ज़रिए ये ख़बर बाहर निकल कर आई। जिसमें इस बात का खुलासा किया गया कि उस रात गुलजार ने राखी की खूब पिटाई की थी।

राखी ने उसके बाद क्या किया?

पति की पिटाई से तकलीफ़ज़दा राखी ने फिर से फिल्मों में जाने का मन बना लिया और यश चोपड़ा की फिल्म ‘कभी कभी’ से अपनी नई पारी की शुरुआत की। तभी से दोनों के बीच सब कुछ ठीक सा नहीं रहा। फिर आखिरकार वह पल भी आ ही गया जब वह दोनों एक दूसरे से दूर हो गए।

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गुलज़ार और राखी की वायरल हुई तस्वीर, फोटो सोर्स; इंटरनेट

साल 1974, राखी और गुलजार को एक बेटी हुई। जिसके पैदा होने के साथ ही वे एक-दूसरे से अलग हो गए और तब से लेकर अब तक उनके बीच में तल्खी बनी हुई है। फिर कभी भी ये दोनों एक साथ एक घर में नहीं रहे। लेकिन इस जोड़े की कमाल की बता ये रही कि दोनों कई पब्लिक मंचों पर एक साथ दिखाई दे जाते हैं। लेकिन अपनी बेटी मेघना के खातिर इन दोनों ने एक-दूसरे से अब तक तलाक़ भी नहीं लिया।

आख़िर में…

हुनर की एक पूरी दुनिया खुद में समाए गुलज़ार साहब ने कई फ़िल्मफेयर अवार्ड्स, नेशनल अवार्ड्स, साहित्य अकादमी, पद्म भूषण जैसे बड़े अवार्ड्स जीते। लेकिन इनकी यह उपलब्धि शायद थोड़ी कम थी। इसलिए इनकी ज़िंदगी को चार चांद तब लगे जब इन्हें 2008 में आई ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फिल्म के मशहूर गाने ‘जय हो’ के लिए ऑस्कर अवार्ड मिला और इतना ही नहीं बल्कि साल 2012 में इन्हें वह अवार्ड भी मिल गया, जिसका सपना भारत का कोई भी फिल्मी जगत का बड़े से बड़ा आदमी देखता है। वह है ‘दादा साहब फाल्के अवार्ड’ जिसके मिलते ही मानों इनकी ज़िंदगी सफल हो गई हो।

गुलज़ार
गुलज़ार की कलम से, फोटो सोर्स; दैनिक भास्कर

फ़िलहाल यह 25 अप्रैल 2013 से असम यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं। इनके लिखे गीत, शायरी और तमाम चीजों की तो क्या ही बात की जाए। बच्चों के गीत ‘लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा…घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा’ से लेकर बूढ़े तक हर उम्र और हर वर्ग के लिए इन्होंने बहुत कुछ लिखा और लिखा ऐसा कि जिसके लिए लिखा उसके दिल और ज़ेहन पर नक्श हो गया। इनके लिखे महशूर फिल्मी डायलॉग्स में से एक डायलॉग ये है ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी लंबी नहीं…बड़ी होनी चाहिए’

इनके लिखी कुछ मशहूर लाइंस ये हैं…

‘कभी जिंदगी एक पल में गुज़र जाती है, कभी जिंदगी का एक पल भी नहीं गुज़रता’

‘शायर बनना बहुत आसान है, बस एक अधूरी मोहब्बत की मुकम्मल डिग्री चाहिए’

‘द कच्चा चिट्ठा’ और उसकी पूरी टीम की तरफ से शब्दों के इस महान जादूगर को अपना 84 वें जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो।

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