आधी रात का पहर था और गर्मी का एक और दिन लेकिन, रात के इस पहर में भी दिल्ली की सियासत गरमाई हुई थी। तभी एक वरिष्ठ पत्रकार के यहां फोन आता है कि भोपाल की सड़कें पुलिसवालों से भर गई हैं। उसके बाद जालंधर से फोन आता है कि पुलिस ने प्रेस पर कब्जा कर लिया है, दिल्ली के अखबारों की भी बिजली काट दी गई। इसके बाद एक और फोन आया कि जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया। अब तक आप समझ गये होंगे कि ये देश के सबसे काले अध्याय इमजेंसी का वाकया है। जब सरकार ने तानाशाह का रूप ले लिया और कुछ साल अंधेरे में चले गए। हम तब की बात में लेकर आये हैं ‘इनसाइड स्टोरी ऑफ इमरजेंसी’।

Image result for 12 june 1975 allahabad high court decisionsइमरजेंसी का ये अध्याय आया एक फैसले की वजह से। जिसने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सियासत को पल भर में नीचे गिरा दिया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर आरोप था कि उन्होंने साल 1971 के लोकसभा चुनाव में सरकार की मशीनरी का दुरूपयोग किया। इंदिरा गांधी का वो चुनाव अवैध घोषित कर दिया गया और 6 साल तक चुनाव से बैन कर दिया। इमरजेंसी की बात की जाती है, उस काले अध्याय के न जाने कितने किस्से हैं लेकिन उस फैसले के पर शायद ही कोई बात करता है। तब की बात में आज कहानी इलाहाबाद हाइकोर्ट के उस फैसले की।

12 जून 1975

प्रधानमंत्री आवास के एक तंग कमरे में दो टेलीप्रिंटर खड़खड़ा रहे थे और लगातार कुछ प्रिंट होता जा रहा था। सुस्त कर देने वाली सुबह में पीटीआई और यूएनआई अपनी काॅपी तैयार कर रहे थे। वैसे तो इन मशीनों पर कम ही ध्यान दिया जाता है लेकिन वो सुबह कुछ और थी। इंदिरा गांधी के निजी सचिव नैवुलेणे कृष्ण अय्यर शेषन घबराहट में एक मशीन से दूसरे मशीन की ओर भाग रहे थे। उस कमरे में भयंकर वाली चुप्पी थी, जिसे घड़ी की टिकटिक और टेलीफोन की घंटियां भी नहीं तोड़ पा रही थी।

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ये घबराहट और चुप्पी थी क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट एक बड़ा फैसला सुनाने वाला था, जिसका हर कोई बेसब्री से इंतजार कर रहा था। वो फैसला सुनाने वाले थे इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा। ये फैसला राजनारायण की याचिका पर होने वाला था, जो 1971 के लोकसभा चुनाव के धांधली पर थी और उसके कटघरे में खड़ी थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। प्रधानमंत्री के सचिव को लग रहा था कि फैसला प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा इसलिए उन्होंने इसे रोकने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया। शेषन को लगता था कि हर इंसान की कोई न कोई कीमत होती है लेकिन, जस्टिस सिन्हा उनमें से एक नहीं थे। उन्हें न ही प्रलोभन दिया जा सकता था और न ही किसी तरह से झुकाया जा सकता था।

फैासला टालने की कोशिश

जस्टिस सिन्हा के इस फैसले से पहले एक सांसद प्रधानमंत्री के शहर यानी कि इलाहाबाद गए। वहां वे जस्टिस सिन्हा से मिला और पूछा, क्या आप 5 लाख रुपए में मान जाएंगे। सिन्हा ने उस सांसद को गुस्से से देखा और बिना जवाब दिए ही निकल गये। दिल्ली से इस फैसले को रोकने के लिए के लिए कई कोशिशें की गईं। गृह मंत्रालय के सचिव प्रेम प्रकाश नैयर ने उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मुलकात की और प्रधानमंत्री के विदेश दौरे तक फैसला टालने की गुजारिश की। चीफ जस्टिस ने ये अनुरोध जस्टिस सिन्हा तक पहुंचाया। जस्टिस सिन्हा ने ये बात मान जरूर ली लेकिन, वे नाराज बहुत हुए।

Image result for justice jagmohan lal sinhaउन्होंने गुस्से में कोर्ट के रजिस्ट्रार को फोन घुमाया और कहा कि वो 12 जून 1975 को फैसला सुनाएँगे, इससे कांग्रेस को थोड़ी रियायत जरूर मिल गई। क्योंकि 8 जून को गुजरात विधानसभा के चुनाव थे। 12 जून 1975 से पहले किसी को थोड़ी भी भनक नहीं थी कि जस्टिस सिन्हा क्या फैसला सुनाने वाले हैं, सिवाय जस्टिस सिन्हा और उनके स्टेनोग्राफर नेगी राम के। इस फैसले के बारे में जानने के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो से कुछ लोग इलाहाबाद गए। जस्टिस सिन्हा के बारे में पहले ही पता चल गया था कि वे झुकने वाले नहीं है। इसलिए आईबी के लोगों ने स्टेनोग्राफर नेगी राम से ये राज उगलवाने की कोशिश की।

लेकिन शायद जस्टिस सिन्हा के साथ रहते-रहते नेगी राम भी वैसे ही हो गये थे। उन्हें धमकियां दी गईं लेकिन, सारी धमकियां बेअसर हो गईं और 11 जून की रात में नेगी राम अपनी पत्नी के साथ कहीं गायब हो गये। जब अगली सुबह खुफिया विभाग के अधिकारी उनके घर पहुंचे तो पूरा घर सूना पड़ा था। जब दिल्ली की सियासत की कोई भी कोशिश काम नहीं आ रही थी तब उन्होंने एक साधु का सहारा लिया।

जस्टिस सिन्हा पूजा-पाठ वाले व्यक्ति थे इसलिए उस साधु को उनके घर के बाहर तैनात कर दिया गया। साधु को पता करना था कि जस्टिस सिन्हा क्या फैसला टाइप करवा रहे हैं? कई दिनों तक वो साधु और खुफिया एजेंसी के लोग सिन्हा के चारदीवारी के बाहर खड़े रहे। लेकिन उन्हें थोड़ी सी भी भनक नहीं लगी कि जस्टिस सिन्हा ने क्या फैसला लिया है?

फैसले की घड़ी

11 जून को जस्टिस सिन्हा ने फैसला टाइप करवाया और स्टेनोग्राफर को कहा कि वो गायब हो जाए। उसी रात को स्टेनोग्राफर अपने परिवार के साथ कहीं गायब हो गए। जस्टिस सिन्हा ने अपने फैसले को पूरी तरह से अपने तक रखा था। इस फैसले की सुनवाई चार साल चली और 23 मार्च 1975 को सुनवाई पूरी हुई। इस सुनवाई के बाद जस्टिस सिन्हा न अपने घर से बाहर निकले और न ही किसी फोन का जवाब दिया। अब आते हैं 12 जून 1975 के दिन पर जब वो फैसला सुनाया जाने वाला था। प्रधानमंत्री आवास के कमरे में टेलीप्रिंटर खड़खड़ा रहे हैं और फोन की घंटी लगतार बज रही है। इसी बीच शेषन ने एक बार फिर घड़ी पर नजर डाली, दस बजने में सिर्फ पांच मिनट कम थे।

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समय के पाबंद जस्टिस सिन्हा हमेशा से सही समय पर कोर्ट पहुंच जाते थे। ठीक 10 बजे 55 साल के दुबले-पतले जस्टिस सिन्हा कोर्ट पहुंचे। कमरा नंबर 24 जिसमें इस केस का फैसला होन वाला था। जस्टिस सिन्हा कमरे में घुसे और अपनी कुर्सी पर बैठे। पेशकार ने ऊंची आवाज में कहा, ध्यान से सुनिए! जज साहब जब ये फैसला सुनाएंगे, तब कोई ताली नहीं बजनी चाहिए। जस्टिस सिन्हा ने इस केस पर बहुत मेहनत की थी और उसी का नतीजा था कि ये फैसला 258 पेज का था। जस्टिस सिन्हा बोले, मैं केवल इस केस से जुड़े विभिन्न पहलुओं के निष्कर्षों को पढ़ूंगा।

इसके बाद जस्टिस सिन्हा बोले, ‘याचिका स्वीकार की जाती है’। उसके बाद उस कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। अखबार वाले टेलीफोन की तरफ भागे और खुफिया एजेंसी अपने दफ्तर की तरफ। प्रधानमंत्री आवास पर निजी सचिव शेषन उस फैसले का इंतजार कर रहे थे। घड़ी में 10 बजकर 2 मिनट हो रहे थे, तभी यूएनआई की मशीन पर घंटी की आवाज आई, एक मैसेज आया था। मैसेज में लिखा था- श्रीमती गांधी अपदस्थ। शेषन ने मशीन से फैसले वाला कागज फाड़ा और उस कमरे की ओर भागे, जहां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बैठी थीं।

इंदिरा गांधी पर आरोप

कमरे के बाहर शेषन को प्रधानमंत्री राजीव गांधी मिले, जो उस समय इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे। राजीव गांधी ने अपनी मां से बताया, उन्होंने आपको अपदस्थ कर दिया है। इसको सुनने के बाद इंदिरा गांधी के चेहरे के भाव ज्यादा नहीं बदले, क्योंकि इस समय वे किसी और ही सोच में डूबी थीं। एक दिन पहले ही इंदिरा गांधी के करीबी डीपी धर यानी दुर्गा प्रसाद धर का निधन हो गया था। तभी टेलीप्रिंटर पर एक और फ्लैश आया, 6 साल तक इंदिरा गांधी किसी भी निर्वाचित पद पर नही रह सकती। इसे सुनने के बाद इंदिरा गांधी थोड़ा परेशान दिखीं, वे उठकर सुस्त कदमों से अपने बैठक वाले कमरे में चली गईं।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव में दो दोष पाए थे। पहला दोष था कि उन्होंने प्रधानमंत्री सचिवालय में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी यशपाल कपूर का इस्तेमाल चुनाव में जीतने के लिए इस्तेमाल किया। एक सरकारी अधिकारी का अपने चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था। जस्टिस सिन्हा ने कहा कि श्रीमती गांधी ने चुनाव प्रचार भले ही 7 जनवरी को शुरू किया हो लेकिन, प्रचार 29 दिसंबर 1970 को ही शुरू हो गया था। जब उन्होंने प्रेस काॅन्फ्रेंस कर चुनाव में उतरने की घोषणा की थी। दूसरा दोष था कि इंदिरा गांधी ने जिन मंचों से रैलियां की थीं। उन्हें बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के अधिकारियों की मदद ली थी।

वो चुनाव इंदिरा गांधी रायबरेली से लड़ीं और राजनारायण को 1 लाख वोट से हराया। जस्टिस सिन्हा ने कहा कि मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है, संविधान में प्रधानमंत्री के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है। ये वो फैसला था जिसके बाद देश की सियासत में भूचाल आने वाला था। पूरी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कुछ ही दिनों में तानाशाह बनने वाला था। इसी फैसले को बदलने के लिए आपाताकाल लगाया गया। लेकिन उस आपातकाल के बीच की कहानी बहुत लंबी है, जिसमें कई किस्से हैं, कई षड्यंत्र हैं।

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ये वाकया वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब ‘इनसाइड स्टोरी ऑफ इमरजेंसी’ में दिया गया है।

 

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