देश के मान-सम्मान के लिए जिस राफेल विमान को खरीदा जाना था, वह सौदा अब एक के बाद एक नए विवादों में फंसता जा रहा है। हमारे देश का यह दुर्भाग्य रहा है कि सरकारों ने यहां सेना के नाम पर वोट भी मांगे और घोटाले भी किए।

सेना के लिए खरीदे जाने वाली बंदूकों, विमानों और गोला- बारूदों के नाम पर हो रहे घोटाले की बात तो छोड़िए देश के नेताओं ने शहीदों की लाशों के लिए खरीदे जाने वाले कफ़न और ताबूत के पैसों को भी नहीं छोड़ा।

ऐसे में राफेल खरीदने को लेकर जो भी बातें सामने आ रही हैं वह कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार नया यह है कि किसी बिजनेस घराने को फायदा देने के लिए तमाम सरकारी संस्थाओं की मदद से सुप्रीम कोर्ट तक को बरगलाने का प्रयास किया जा रहा है।

दरअसल, राफेल मामले में एक नई बात सामने आई है। मीडिया से मिल रही जानकारी के मुताबिक फ्रांस के अखबार ‘ले मोंड’ ने खुलासा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राफेल सौदे के ऐलान के फौरन बाद फ्रांस सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी पर बकाया 1119 करोड़ रुपए को माफ कर दिया था। हजारों करोड़ के टैक्स को फ्रांस सरकार ने महज 57 करोड़ रुपए लेकर मामला रफा-दफा कर दिया था।

जानकारी के लिए आपको बता दें कि अनिल अंबानी की एक टेलीकॉम कंपनी फ्रांस में रजिस्टर्ड है जिसका नाम रिलायंस एटलांटिक फ्लैग फ्रांस है। किसी दूसरी कंपनी की तरह इस कंपनी पर टैक्स की देनदारियों की फ्रांस के टैक्स अधिकारियों ने जांच की तो पाया कि कंपनी ने 2007 से 2010 के बीच 60 मिलियन यूरो का टैक्स नहीं चुकाया है।

इसके बाद रिलायंस कंपनी ने इस देनदारी के बदले करीब 57 करोड़ रुपए चुकाकर मामला रफा-दफा करने की पेशकश की। लेकिन फ्रांस के टैक्स अधिकारियों ने इसे ठुकरा दिया था।

इसके बाद फ्रांस टैक्स विभाग के अधिकारियों ने मामले की और गहराई से जांच की और पाया कि 2010 से 2012 के बीच रिलायंस पर कुल देनदारी करीब 91 मिलियन यूरो की है।इस मामले में नया मोड़ तब आया जब अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट से 36 राफेल विमान खरीदने के सौदे का ऐलान किया।

मीडिया से आ रही खबरों के मुताबिक जब राफेल सौदा फ्रांस के साथ हुआ उस समय तक रिलायंस पर फ्रांस सरकार के टैक्स की देनदारी करीब 151 मिलियन यूरो हो चुकी थी।

भारत सरकार द्वारा राफेल खरीदने के ऐलान के 6 माह के बाद ही फ्रांस के टैक्स अधिकारियों ने रिलायंस के साथ सिर्फ 7.3 मिलियन यूरो (57 करोड़ रुपए) लेकर मामला रफा-दफा कर दिया। जबकि फ्रांस सरकार को रिलायंस से 151 मिलियन यूरो वसूलने थे।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद यह साफ जाहिर होता है कि राफेल सौदे में अनिल अंबानी के दोनों हाथ घी में थे। अंबानी ने अपने महज 6 महीने पूराने कंपनी के नाम पर करोड़ों रूपए का फायदा लिया।

इस सौदे से देश को नुकसान यह हुआ कि जिस सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमीटेड को यह टेंडर मिलना था उसे टेंडर नहीं मिला। एचएएल जैसी सरकारी कंपनी इन दिनों बेहद नुकसान में चल रही है। इसके बावजूद यह टेंडर सरकारी कंपनी के हाथ से छिनकर प्राइवेट कंपनी को देना एक तरह से बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

इस खुलासे के कुछ देर बाद ही कांग्रेस प्रवक्ता रंदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, “राफेल सौदे में भ्रष्टाचार और पैसे के लेनदेने के तार आखिरकार सामने आ ही गए। क्या पीएम मोदी-अनिल अंबानी की सांठगांठ सामने आ गई?”

राफेल मामले में घटनाक्रम

  • 30 दिसंबर 2002 : खरीद को सुचारू बनाने के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) को अपनाया गया।
  • 28 अगस्त 2007 : रक्षा मंत्रालय ने 126 एमएमआरसीए (मध्यम बहु-भूमिका वाले लड़ाकू विमान) को खरीदने के लिए अनुरोध प्रस्ताव जारी किए।
  • 4 सितंबर 2008: मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह ने रिलायंस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजीज लिमिटिड बनाई।
  • 1 मई 2011 : वायु सेना ने राफेल और यूरोफाइटर विमान चुने।
  • 30 जनवरी 2012 : दसॉल्ट एविएशन के राफेल विमान ने सबसे कम बोली लगाई।
  • 13 मार्च 2014 : हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटिड (एचएएल) और दसॉल्ट एविएशन के बीच कार्य साझा करने का समझौता हुआ जिसके तहत वे 108 विमानों के लिए क्रमश: 70 फीसदी और 30 फीसदी कार्य के लिए जिम्मेदार थे।
  • 8 अगस्त 2014 : तत्कालीन रक्षा मंत्री अरूण जेटली ने संसद को बताया था कि अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बाद तीन-चार साल में 18 विमानों के तैयार हालत में आने की उम्मीद है और शेष 108 विमान की आपूर्ति अगले सात वर्षों में की जाएगी।
  • 8 अगस्त 2015 : तत्कालीन विदेश सचिव ने कहा कि दसॉल्ट, रक्षा मंत्रालय और एचएएल के बीच विस्तृत चर्चा चल रही है।
  • 10 अप्रैल : फ्रांस से 36 विमान तैयार हालत में खरीदने के एक सौदे का ऐलान किया गया।
  • 26 जनवरी 2016 : भारत और फ्रांस ने 36 राफेल विमानों के लिए एक समझौता किया।
  • 23 सितंबर 2016 : अंतर सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
  • 18 नवंबर 2016 : सरकार ने संसद में कहा कि प्रत्येक राफेल की कीमत करीब 670 करोड़ रुपये पड़ेगी और सभी विमान अप्रैल 2022 तक आ जाएंगे।
  • 31 दिसंबर 2016 : दसॉल्ट एविएशन की वार्षिक रिपोर्ट में खुलासा होता है कि 36 राफेल विमानों के लिए असल में 60,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है जो सरकार द्वारा संसद में बताई गई कीमत का दोगुने से भी ज्यादा है।
  • 13 मार्च 2018 : उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा करने के केंद्र के फैसले की स्वतंत्र जांच कराने और सौदे की कीमत का संसद में खुलासा करने की मांग की गई।
  • 24 अक्टूबर 2018 : पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी तथा कार्यकर्ता एवं वकील प्रशांत भूषण ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और राफेल सौदे पर प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग की।
  • 31 अक्टूबर  2018 : उच्चतम न्यायालय ने केंद्र से 10 दिन के अंदर सील बंद लिफाफे में 36 राफेल विमानों की कीमत बताने को कहा।
  • 12 नवंबर 2018 : केंद्र ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष सीलबंद लिफाफे में 36 विमानों की कीमत रखी। केंद्र ने राफेल सौदे को अंतिम रूप देने के लिए उठाए गए कदमों की भी जानकारी दी।
  • 14 नवंबर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने राफेल सौदे की अदालत की निगरानी में जांच कराने के लिए दायर याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा।
  • 14 दिसंबर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मोदी नीत सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संदेह नहीं बनता है और विमान सौदे में अनियमितताओं से संबंधित सीबीआई को प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज किया।
  • 21 फरवरी 2019 : भूषण ने राफेल मामले में अदालत को गुमराह करने वाले कुछ अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन चलाने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई का अनुरोध किया।
  • 26 फरवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने राफेल पर दिए फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई का फैसला किया।
  • 6 मार्च 2019 : केंद्र ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि रक्षा मंत्रालय से राफेल सौदे से संबंधित दस्तावेज चुराए गए हैं और ‘द हिन्दू’ अखबार को उनके आधार पर लेख प्रकाशित करने के लिए सरकारी गोपनीयता अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने की धमकी दी।

 

 

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