जा सिमरन जा जी ले अपनी ज़िंदगी…

ये डायलाॅग हम अक्सर चाहते हैं कि एक बाप अपनी बेटी के लिये बोले। लेकिन ये डायलाॅग आइकाॅन बना क्योंकि इसे बोलने वाला आइकाॅन था। उस भारी आवाज वाले बड़े कद-काठी वाला किरदार जब भी टीवी पर आता तो वो सीन एपिक ही होता। न जाने कितने किरदार और डायलाॅग और उन डायलाॅग में फिट बैठता एक व्यक्ति अमरीश पुरी

फिल्म वारिस का एक सीन, फोटो सोर्स- गूगल

अमरीश पुरी हिंदी सिनेमा के वो एक्टर और कैरेक्टर रहे। जिन्हें हटा दिया जाये तो भारतीय सिनेमा की आधी सदी को हटाना पड़ेगा।

आज अमरीश पुरी का जन्मदिन है। आज के ही दिन 22 जून 1932 को उनका जन्म हुआ था। हम उनके जीवन के बारे में बिल्कुल बात नहीं करेंगे, मैं तो अपने बारे में बात करूंगा कि मैंने अमरीश पुरी को कैसे-कैसे और कब देखा।

फोटो सोर्स- गूगल

मैंने अमरीश पुरी को तब से देखा है जब अमिताभ बच्चन की आज के अर्जुन में उन्होंने अपना आतंक दिखाया था। तब मैं अपने गांव में एक टी.वी. में जो ब्लैक एंड व्हाइट थी। उसको एक चबूतरे पर रखा जाता था और पूरा मुहल्ला उसको देखा करता था। तब अमरीश पुरी आते हैं और अपनी भारी आवाज से गांव वालों को डरा देते हैं। अमरीश पुरी का आतंक उस समय हमारे दिमाग में ऐसे घर जाता कि हम उसे गाली भी बक देते। उस समय मैं तो बच्चा था तो सोचता कि जो हो रहा है सच में हो रहा है।

मुझे फिल्में शुरू से ही देखना पसंद रहा है। इसलिये नहीं कि वो समाज का आइना होती हैं। ऐसा तो मुझे बाद में पता चला। मुझे तो बस देखना पसंद था और सही भी हुआ। आज मुझे फायदा भी मिल रहा है। अमरीश पुरी को मैंने बहुत सारे रोल में देखा लेकिन सबसे धमाकेदार वह विलेन में ही दिखते। जब वह मिस्टर इंडिया में गुस्से से देखते तो कुछ लोग उनके डर से तेजाब से भरे टैंक में कूद जाते और फिर वो आइकाॅनिक डायलाॅग बोलते।

“मोगैंबो खुश हुआ।”

अमरीश पुरी को हमने भुजंग के रोल में देखा तो कभी उस हवस के ठाकुर के रूप में जो 70 साल का होने के बावजूद जबरन माधुरी दीक्षित से शादी करता है। उनको देखने में गुस्सा तो बहुत आता है कि इतना ज़ालिम है इसे अंत में मर जाना चाहिए। लेकिन हम भूल जाते थे कि उनके कारण ही फिल्मों में असली जान रहती थी। आज के दौर में देखे तो कोई विलेन ही नहीं है कोई भी कर ले रहा है। विलेन की असली परिभाषा देखनी है तो अमरीश पुरी को देखा लो। जो खतरनाक रोल के लिये न जाने कितने फिल्मों में बिना बाल के ही रहें।

ठाकुर दुर्जन सिंह, फोटो सोर्स- गूगल

अमरीश पुरी की आवाज़ में वो रौब था कि जब वह पर्दे पर होते तो सबसे बड़ा रोल उनका ही होता। मैंने सौदागर में दिलीप कुमार के आगे अमरीश पुरी को देखा, वहां उनकी एक्टिंग मुझे ज्यादा जंच रही थी। उस समय मुझे एक्टिंग का तो ज्ञान नहीं था। लेकिन मुझे अमरीश पुरी को मारने का मन हो रहा था तो पक्का है न कि वे अपने रोल को अच्छे से निभा रहे थे।

करन-अर्जुन में ठाकुर के रोल के लिये उनको हमेशा याद रखा जायेगा जहां उन्होंने अपनी एक्टिंग और चालबाजी को अपने में उतार लिया था। उनका एक दौर था जो विलेनगिरी से भरा रहा। सनी देओल की जाने कितने ही फिल्मों में वे विलेन रहे। मेरी जंग में एक वकील के किरदार में होते हुये भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी थी।

ये दौलत भी क्या चीज है जिसके पास आती है कम ही लगती है।

विलेन से बाहर निकलने में अमरीश पुरी को बरसों लग गये। उनको ऐसी फिल्में कम ही मिलीं। क्योंकि लोगों ने उनको कम ही सराहा लेकिन जब वह घातक में एक अच्छे-सच्चे भारतीय के रोल में दिखे तो देखकर अच्छा लग रहा था लेकिन वो गले में पट्टे वाला सीन वाकई दुःखी कर देता है और अपने बेटे की जान की भीख मांगता है। तब दुख होता है कि जो हर फिल्म में राज करता था वो इस फिल्म में बेबस दिख रहा है।

मेरी जंग मूवी के एक सीन में अमरीश पुरी, फोटो सोर्स- गूगल

नायक में उनके राजनेता वाले किरदार को आज तक सराहा जाता है। उन्होंने वैसे ही भ्रष्ट राजनेता की तस्वीर दिखाई जैसे राजनेता अक्सर होते हैं या हम सोचते हैं। उसके बाद वो हलचल में काॅमेडी वाली मूवी में भी आए जिसमें वे एक खड़ूस बाप बने थे। उसके बाद वे सलमान खान वाली मूवी में दिखे। उस मूवी को मैंने रंगीन टी.वी. में देखा था। जिसके बाद समझ में आया था कि अमरीश पुरी हर रोल में फिट बैठे हैं।

आज भी जब टी.वी. देखते हैं तो अमरीश पुरी की फिल्में सबसे ज्यादा रहती हैं और विलेनगिरी में उनसे कोई मुकाबला नहीं रहा। आज अगर वो शायद होते तो वो अपनी आवाज से सबको डरा रहे होते।

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