एक नेता जिसे उसे तीखे बोल के लिये याद किया जाता है। एक नेता जिसे इसलिये भी याद किया जाता है क्योंकि वो अपनी हसरत सबको बताता। वो हसरत थी, देश का प्रधानमंत्री बनना। जो नेहरु के बाद अपने आपको उस पद के लिये सबसे लायक समझता था। लेकिन जब भी प्रधानमंत्री बनने का मौका आता, किसी और को उस कुर्सी पर बैठा दिया जाता। जो जवाहर लाल नेहरु की कैबिनेट से लेकर, इंदिरा गांधी की कैबिनेट में रहा। लेकिन जब तक कांग्रेस में रहा प्रधानमंत्री की कुर्सी दूर ही रही। बाद में जब देश में पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बनती है तो एक उस साल के नेता को प्रधानमंत्री बना दिया जाता है। जो कितने ही सालों से इस दिन का इंतजार कर रहा था।

नामः मोरारजी देसाई।

स्थानीय क्षत्रपों को छेड़ने के कारण 1979 में गिरी थी मोरारजी देसाई की सरकारमोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 में हुआ और 10 अप्रैल 1995 करे निधन हो गया। मोरारजी देसाई को 1952 में बंबई का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1956 में नेहरु ने मोरारजी देसाई को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया। मोरारजी देसाई को दिया गया, वाणिज्य मंत्रालय। 1958 में मोरारजी देसाई को वित्त मंत्रालय दे दिया गया। 1963 में कामराज प्लान के कारण उनको मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। यहीं से उनके प्रधानमंत्री बनने की लालसा जागी।

1. एक पत्रकार की वजह से नहीं बन पाये प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के देहांत के बाद सबसे बड़ा सवाल था, नेहरु के बाद कौन? उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष के.कामराज थे। उस समय कुछ नाम थे, जिनके नाम पर सोचा जा रहा था। लेकिन सबसे ज्यादा मजबूत पक्ष लाल बहादुर शास्त्री और मोरारजी देसाई का माना जा रहा था। तब न्यूज एजेंसी यू.एन.आई. के पत्रकार कुलदीप नैयर मोरारजी देसाई से मिलने उनके बंगले पर पहुंचे। वे मोरारजी देसाई से तो नहीं मिल पाये लेकिन ये बात पक्की हो गई कि मोरारजी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी रखने जा रहे हैं।

Image result for kuldeep nayar and morarji desaiकुलदीप नैयर लाल बहादुर शास्त्री से भी मिलने पहुंचे। लाल बहादुर शास्त्री ने कहा, प्रधानमंत्री का चुनाव एकमत से होना चाहिये। मुझे लगता है कि जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के नाम पर विचार किया जा सकता है। अगर इन दोनों के नाम पर सहमति होती है तो मैं चुनाव नहीं लड़ूँगा। जब कुलदीप नैयर शास्त्री का संदेश लेकर मोरारजी से मिले। मोरारजी देसाई ने संदेश सुनकर कहा, ‘जयप्रकाश नारायण, वो तो कन्फयूज आदमी है और इंदिरा गांधी दैट चिट ऑफ ए गर्ल’।

कुलदीप जब उनके बंगले से बाहर निकल रहे थे तब बीच में मोरारजी देसाई के बेटे कांति देसाई मिल गए। कांति देसाई ने कुलदीप नैयर से कहा, ‘अपने शास्त्री जी से कहिए कि बैठ जाए। मोरारजी देसाई को हरा नहीं पायेंगे’। कुलदीप नैयर वहां से सीधे आॅफिस गये और कहानी लिखी जिसका शीर्षक था, ‘मोरारजी ने सबसे पहले अपनी टोपी रिंग में फेंकी’। अगले दिन वो खबर हर अखबार की हेडिंग बनी हुई थी। प्रधानमंत्री उम्मीदवार की खबर सार्वजकि हो गई और के.कामराज ने मोरारजी देसाई पर सोचना छोड़ दिया। इस खबर के असर के बाद अगले दिन संसद भवन में कामराज ने कुलदीप नैयर के कान में कहा, थैंक यू। इसी एक खबर और पत्रकार की वजह से मोरारजर देसाई पहली बार प्रधानमंत्री बनने से चूके।

2. कामराज की वजह से नहीं बन पाये प्रधानमंत्री

ताशकंद समझौते के दौरान प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का देहांत हो गया। फिर से प्रधानमंत्री बनने की कूटनीति शुरू हो गई। प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार थे, इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई। मोरारजी देसाई पिछली बार लाल बहादुर शास्त्री के कारण प्रधानमंत्री नहीं बन पाये थे। लेकिन इस बार मोरारजी देसाई किसी भी हालत में झुकना नहीं चाहते थे।

Image result for kamraj morarji and indira gandhiके.कामराज मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहते थे। उन्होंने मोरारजी को समझाया कि इंदिरा के पास बहुमत है लेकिन वे नहीं माने। संसदीय दल की वोटिंग हुई और इंदिरा जीत गईं। के.कामराज का समर्थन इंदिरा को मिला था। मोरारजी देसाई के एक बार फिर प्रधानमंत्री नहीं बन पाये।

3. इंदिरा गांधी के वजह से नहीं बन पाये

1967 के आम चुनाव में कांग्रेस बहुमत से तो आ गई लेकिन सीटें बहुत कम आईं थीं। सिंडीकेट पूरी तरह से हार गया था खुद कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज चुनाव हार गये थे। मोरारजी देसाई को इस बार प्रधानमंत्री की दावेदारी मजबूत दिख रही थी। लेकिन जब उन्होंने देखा कि इंदिरा गांधी का पक्ष मजबूत है तो सरकार में 2 नंबर की पोजीशन मांगी।

Related imageइंदिरा गांधी 2 नंबर की पोजीशन देने को तैयार थीं लेकिन साथ में वे गृह मंत्रालय भी चाहते थे। जिसके लिये इंदिरा गांधी तैयार नहीं थीं। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के लिये संसदीय चुनाव करवाने की मांग करने लगे। इंदिरा गांधी नहीं चाहतीं थीं कि चुनाव हो। इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्रालय दे दिया। इस तरह मोरारजी देसाई तीसरी बार प्रधानमंत्री नहीं बन पाये।

4. आखिरकार बन ही गये प्रधानमंत्री

आपातकाल के बाद देश में इंदिरा विरोधी लहर चली और 1977 के आम चुनाव में जनता दल पूरे बहुमत के साथ चुनाव जीती। प्रधानमंत्री पद के तीन दावेदार थे, बाबू जगजीवन राम, चैधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई।

Related imageसबसे ज्यादा समर्थन बाबू जगजीवन राम की ओर था लेकिन प्रधानमंत्री तो जयप्रकश नारायण को चुनना था और उन्होंने चुना 80 साल के मोरारजी देसाई को। देश में मोरारजी के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। हालांकि मोरारजी देसाई ज्यादा देर तक प्रधानमंत्री नहीं रह पाये और 1979 में सरकार गिर गई।