हाल ही में आयुष्मान खुराना स्टारर फिल्म ‘आर्टिकल-15’ का ट्रेलर रिलीज़ हुआ है। जिसके बाद से इस फिल्म के ट्रेलर को लेकर तरह-तरह टिप्पणियाँ की जा रही हैं। ये फिल्म अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनाई गयी है। ये वही डायरेक्टर हैं जिन्होंने ‘मुल्क’ और ‘रा-वन’ जैसी फिल्में बनाई हैं।

आर्टिकल-15 जो भारत के संविधान के अनुसार सबके एक समान होने के हक़ की बात करता है (Right to Equality)। इस फिल्म के ट्रेलर में उसी हक़ के बारे में बात की गयी है। ट्रेलर में जाति की वजह से 2 लड़कियों का बलात्कार करके उनको पेड़ से लटका कर मार दिया गया क्योंकि उन्होंने अपनी मजदूरी में 3 रूपये बढ़ाने के लिए कहा।

कहा जा रहा है कि ये फिल्म उत्तरप्रदेश के बदायूं में 2 लड़कियों की बलात्कार कर हत्या वाले मामले पर आधारित है। अब एक बार थोड़ा सा बदायूँ में हुए इस मामले के बारे में भी जान लेते हैं ताकि इस खबर को समझने में आसानी हो।
दरअसल इस फिल्म को 2014 में हुए बदायूँ गैंग रेप पर आधारित बताया जा रहा है। 27 मई 2014 में उत्तरप्रदेश में बदायूँ डिस्ट्रिक्ट के कटरा गाँव में 2 टीन एज लड़कियों के बलात्कार और मर्डर की रिपोर्ट दर्ज हुई थी। बाद में इस हादसे को सीबीआई ने अपनी जांच में आत्महत्या का मामला बता कर बंद कर दिया था।

इस मामले में पप्पू यादव, अवधेश यादव, उर्वेश यादव, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव नाम के व्यक्तियों पर आरोप लगे थे। इनमें से छत्रपाल और सर्वेश पुलिसकर्मी थे। बाद में इन पाँचों को बाइज्जत बरी कर दिया गया क्योंकि सीबीआई ने अपनी जांच में बताया कि लड़कियों का रेप हुआ ही नहीं है और उन्होंने आत्महत्या की है। ये दोनों लड़कियां दलित परिवार की थी।

आर्टिकल 15 टट्रेलर का स्क्रीनशॉट, फोटो सोर्स- यूट्यूब

अब ज़रा आर्टिकल-15 फिल्म की बात पर वापस आ जाते हैं। कई न्यूज़ रिपोर्ट्स में इस फिल्म को लेकर अजीबो-गरीब टिप्पणियाँ की जा रही हैं। फिल्म में काम करने वाले एक कलाकार मनोज पाहवा ने ANI से हुई बात-चीत में साफ तौर पर बताया कि:

“ये फिल्म बदायूँ में हुए उस घिनौने अपराध पर पूरी तरह से आधारित नहीं है, जहां दो लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और उन्हें फांसी दे दी गयी। हम कह सकते हैं कि यह फिल्म इस घटना से प्रेरित है और हमने इस फिल्म में कुछ अंश शामिल किए हैं।”

लेकिन इस फिल्म के ट्रेलर रिलीज़ के बाद बिना मतलब बात को राजनीतिक मोड़ देने की कोशिशें साफ तौर पर सामने आने लगी हैं। अपने मन की बात को सामने रखने पर तो पहले ही हमारे देश में बवाल होते आए हैं लेकिन अब लगता है व्यक्ति की सोच पर भी रोक लगाने की कोशिश की जा रही है।

किसी भी फिल्म के शुरू होने से पहले ही हमे बता दिया जाता है कि:

“इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है और अगर ऐसा हो भी तो उसे मात्र एक संयोग समझा जाएगा।”

लेकिन मीडिया भी शायद आलोचना करने से ज़्यादा तरफदारी करने में खुश है। तभी तो ऑप-इंडिया नाम की न्यूज़ वेबसाइट पर एक आर्टिकल पढ़ा जिसकी हेडलाइन है “आर्टिकल 15 ट्रेलर: यादवों द्वारा किए रेप में ब्राह्मणों को बताया बलात्कारी क्योंकि वही बिकता है”

इस खबर में ट्रेलर देख कर ही तय कर लिया गया है कि इस फिल्म की कहानी क्या है और किस उद्देश्य से ये बनाई गयी है? ऐसी खबरों को पढ़कर साफ तौर पर समझा जा सकता है कि किस तरह से हर मुद्दे, हर बात यहाँ तक की कला और कलाकारों का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है।

इस तरह से बिना फिल्म देखे मनगढ़त कहानियाँ बना कर लोगों में नफरत का माहौल पैदा करना निंदनीय है। पहले तो ज़बरदस्ती इस फिल्म को राजनीति से जोड़ दिया गया और फिर इन बातों को तूल देने के लिए अनुभव सिन्हा कि फिल्म मुल्क और उनके पाकिस्तान को चिट्ठी लिखने वाली बात को भी इसमे शामिल किया गया है।

ब्राह्मण हो, बनिया हो, शूद्र हो या दलित हो कोई यह नहीं बोलता दिख रहा कि “उनके साथ सब सही हो रहा है।” कभी ब्राह्मण तो कभी दलित, सभी लोगों के साथ नाइंसाफी हो रही है तो फिर इंसाफ किसको मिल रहा है।

फिल्म के ट्रेलर की शुरुआत में एक बड़ी ही खूबसूरत लाइन बोली गयी है कि

“हम कभी हरिजन हो जाते हैं, कभी बहुजन हो जाते हैं कि जन गण मन में हमारी भी गिनती भी हो जाये”

जिसमे कुछ गलत नहीं है। ट्रेलर को देखने पर कोई भी समझ सकता है कि फिल्म के ट्रेलर में कुछ भी ऐसा नहीं दिखाया गया है जो हमारे आस-पास न घटित होता हो। दो लड़कियों के साथ हुई ऐसी हिंसात्मक घटना को इतने सालों बाद एक फिल्म से जोड़ कर उसे राजनीतिक मोड़ देना बहुत ही गिरी हुई और बेशर्म पत्रकारिता का परिचय देती है।

ये हमारे देश की एक कड़वी सच्चाई है कि यहाँ जात-पात, धर्म, लड़का-लड़की, ऊंच-नीच जैसे कई ऐसे मसले हैं जो अब भी बहुत भारी मात्रा में हमारे समाज पर प्रभाव रखते हैं। लेकिन अफसोस की बात ये है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद हम अपनी कमियों को सही करने का सोचने की बजाए उसे नकार देते हैं। कम से कम नफरत फैलाने के लिए फिल्मों का राजनीतिकरण तो न ही करें।

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