सड़क के पास एक टोयोटा एसयूवी खड़ी है. पूरी गाड़ी लहू और बारूद की गंध से भर उठी है. गाड़ी पर गोलियां चलाने वाले दोनों लोगों को लग रहा था कि गाड़ी के अन्दर बैठे सातों पुलिस वाले मर चुके हैं. तीनों हथियारबंद शख्स गाड़ी की तरफ बढ़े और उसका दरवाज़ा खोल लाशों को जमीन पर पटकने लगे.

आगे के तीन मृत पुलिस वालों को वहीं सड़क पर पटकने के बाद, आतंकी गाड़ी के पीछे वाले गेट को खोलने की कोशिश करने लगे. दरवाज़ा नहीं खुलता है. दोनों शख्स गाड़ी में बैठ जाते हैं. उन्हें लगता है कि पीछे चार लाशें पड़ी हैं लेकिन, वहां पड़े दो पुलिस वालों की साँसें चल रही थी. गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगती है.

पीछे पड़े दोनों पुलिस वाले मरने का नाटक कर रहे थे. तभी, अचानक उनमें से एक का फोन बज उठता है. ये फोन उसके घर से था. शायद उसके घरवाले उसका हाल-चाल पूछना चाह रहे होंगे. आगे बैठे दोनों शख्सों में से एक शख्स वहीं से बैठे-बैठे पीछे गोली चला देता है. उसकी चलाई हुई गोली उस पुलिसवाले का सीना चीर देती है. गोली चलाने वाले शख्स का नाम आमिर कसाब था. उसके साथ उसके दोस्त का नाम इस्माइल था. ये रात 26 नवम्बर की थी और साल था 2008.

भारत के इतिहास में आतंकी घटनाओं का सबसे काला दिन. आज इस घटना को पूरे हुए 11 साल हो चुके हैं लेकिन, ये एक ऐसा जख्म है जिसको याद करके हर भारतीय सहम जाता है और सबसे ज्यादा सहमती है, इस वारदात को झेलने वाली मुंबई.

उस गाड़ी में जिंदा बचे एकमात्र पुलिस वाले का नाम है अरुण जाधव.

अरुण जाधव, फोटो सोर्स: गूगल

अरुण जाधव, फोटो सोर्स: गूगल

अरुण जाधव उस किस्से को याद करते हुए बताते हैं कि वो और उनके साथियों को अस्पताल में आतंकवादियों के दाखिल होने की खबर मिली थी. अस्पताल के कर्मचारियों ने सूझ-बूझ दिखाते हुए गेट में ताला लगा दिया था ताकि मरीजों की जान बचाई जा सके. जाधव और उनकी टीम के वहां पहुँचने से पहले ही पुलिस अस्पताल में दाखिल हो चुकी थी. आतंकवादियों को अस्पताल से भागना पड़ा. अस्पताल के पीछे के रास्ते से वो भाग निकले. जाधव कहते हैं:

“वो पीछे ​ताड़ के पेड़ों वाले रास्ते पर छुप गए. तभी वहां पर हमारी एसयूवी पहुंची. हम पहुंचे ही थे कि कुछ ही सेकेंड में चरमपंथियों ने हम पर हमला बोल दिया और गाड़ी के अंदर दो राउंड फ़ायरिंग की.”

जाधव बताते हैं कि ये हमला इतना अचानक हुआ कि किसी को मौका ही नहीं मिल पाया जवाबी कार्यवाही करने का. बस एक वही थे जो जवाबी फायरिंग कर पाए. बाकी के सभी पुलिस वाले गोलियों से छलनी हो चुके थे.

अरुण जाधव उस पल को याद करते हुए बताते हैं कि उन्हें ऐसा लग रहा था कि अब मौत उनके नजदीक है. वो उस पल अपने माँ-बाबा को याद कर रहे थे, अपनी पत्नी को याद कर रहे थे, अपने बच्चे को याद कर रहे थे.

गाड़ी में आतंकवादियों के साथ

आतंकवादी गाड़ी में बैठ चुके थे. गाड़ी मुंबई की सड़कों पर दौड़ रही थी. रास्ते में आतंकवादी एक चेकपोस्ट पर फायरिंग कर देते हैं. पुलिस वाले भी जवाबी फायरिंग करते हैं. पुलिस वालों की एक गोली गाड़ी के पहिये में लगती है और पहिया पंचर हो जाता है. आतंकवादी वहां से गाड़ी को लेकर भाग निकलते हैं.

जाधव बताते हैं कि आतंकवादियों ने उस गाड़ी को तब तक चलाया जब तक उसके पंचर पहिये का टायर बाहर नहीं आ गया. ये लगभग 20 मिनट तक चला. इन बीस मिनट तक जाधव गाड़ी के अन्दर मरे हुए होने का नाटक करते हुए लेटे थे.

जाधव ने कोशिश भी की ताकि वो गाड़ी में गिरी हुई बन्दुक उठायें लेकिन, उनकी घायल बाजू में बिल्कुल भी ताक़त नहीं थी. जाधव को अब अपनी 9mm की पिस्तौल के न होने का अफ़सोस हो रहा था. उन्होंने गाड़ी पर चढ़ते वक़्त वो पिस्तौल अपने सहकर्मी को दे दी थी.

वह कहते हैं, “मैं किसी हल्के हथियार से आसानी से बंदूक़धारियों को मार सकता था.”

जब गाड़ी का टायर अलग हो गया तब आतंकवादियों ने गाड़ी को वहीं छोड़ दिया और एक स्कोडा सेडान को रोका. उस दूसरी गाड़ी में बैठे हुए तीन लोगों को निकाल कर वे उस गाड़ी को लेकर समुद्र की तरफ बढ़ गए. आतंकवादियों ने वहां से निकलने के बाद फिर एक और चेकपोस्ट पर हमला कर दिया. वहां हुई मुठभेड़ में इस्माइल मारा गया और कसाब को पकड़ लिया गया.

जाधव बताते हैं कि आतंकवादियों के जाने के बाद उन्होंने किसी तरह वायरलेस उठाया और मदद मांगी. जब एम्बुलेंस वहां पहुंची तो जाधव बिना किसी मदद के उसमें बैठे थे. जाधव के हाथ और कंधे से पांच गोलियां निकलीं. डॉक्टर ने उन्हें सात महीनों के लिए आराम करने को कहा. सभी को इस बात का आश्चर्य हो रहा था कि इतना कुछ हो जाने के बावजूद जाधव को किसी तरह का कोई सदमा नहीं लगा था.

मुख्य गवाह बने अरुण जाधव

26/11 हमले वाले केस में अरुण जाधव मुख्य गवाह बने. उन्होंने न सिर्फ कोर्ट में कसाब को पहचाना बल्कि, हरेक बारीकियों को भी जज के सामने रखा. मार्च 2010 में कसाब को इस मामले में फांसी दे दी गयी.

अरुण जाधव को उनकी बहादुरी के लिए सम्मानित भी किया गया और मुआवज़ा भी दिया गया. उनकी बड़ी बेटी को सरकारी नौकरी दी गई. उनका एक बेटा और बेटी इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं.

आज 26/11 की बरसी पर पूरी ‘द कच्चा चिट्ठा’ की टीम अरुण जाधव जैसे उन तमाम पुलिसवालों के हौसले और देश की रक्षा करते हुए शहादत को पाने वाले वीरों को सलाम करती है.

इस आर्टिकल के कुछ अंश बीबीसी हिंदी से लिए गए हैं.

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