बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक बेहद खुश हैं जैसा कि मोदी सरकार कह रही है. भारत में CAB (नागरिकता संशोधन विधेयक) जैसा ऐतिहासिक बिल पास हो गया है. वो अब आसानी से अपने देश के अत्याचारों से बच कर भारत में बस सकते हैं. उन्हें आराम से भारत की नागरिकता मिल जाएगी. मोदी सरकार अपनी खूब पीठ थप-थपा रही है.

लेकिन, मोदी सरकार ये भूल गई है कि अपना घर जला कर दूसरों के घर में उजाला नहीं किया जाता है. CAB को लाकर मोदी सरकार ने भारत के मुसलमानों में डर का माहौल पैदा कर रखा है. जिसका असर ये हुआ है कि देश भर में आंदोलन अपने चरम पर है. पुलिस युनिवर्सिटीज के कैंपस में घुस कर छात्रों पर लाठी-डंडे बरसा रही है. वहीं अब मोदी सरकार ने एंग्लो-इंडियन कम्युनिटी से जुड़ा हुआ एक बिल भी लोकसभा से पास करा लिया है. यही वजह है कि अब इस समुदाय को भी अपनी अस्मिता खोने का डर सता रहा है.

एंगलो-इंडियन प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

एंग्लो-इंडियन परिवार की प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

इस बिल और एंग्लो-इंडियन के बारे में जान लें

एंग्लो-इंडियन वो समुदाय है. जिनके परिवार वालों का संबंध किसी न किसी तरह से ब्रिटेन से रहा है या जिन लोगों के पूर्वजों ने आज़ादी के बाद ब्रिटेन को नहीं भारत को अपना मुल्क चुना था.

लोकसभा में कुल सीटें 545 हैं. जिनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति(SC) और अनुसूचित जनजाति(ST) के लिए आरक्षित होती हैं. इसके अलावा 2 सीटें एंग्लो इंडियन के लिए आरक्षित होती हैं. एंग्लो इंडियंस के जो प्रतिनिधि होते हैं, उन्हें चुनाव नहीं लड़ना पड़ता है. राष्ट्रपति द्वारा उन्हें नामजद किया जाता है.

लोकसभा में मंगलवार को SC&ST से जुड़ा 126वां संशोधन बिल पास हो गया है. जिसके बाद SC&ST समुदाय को मिलने वाला आरक्षण फिर से 10 साल के लिए बढ़ा दिया गया. यह सब को मालूम है कि संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण महज़ 10 साल के लिए दिया था. जिसे स्थिति सामन्य होने के बाद वापस लेने का प्रावधान किया गया था.

हालांकि, तमाम सरकारों ने संविधान में संशोधन कर इस आरक्षण को हर बार 10 साल के लिए बढ़ा लिया. इस बार भी यही किया गया. अनुसूचित जाति और जनजाति को जो आरक्षण मिलता था, वो तो उन्हें मिल गया. मगर एंग्लो इंडियंस को मिलने वाला आरक्षण उनसे संशोधन के जरिए छीन लिया गया.

संविधान के तहत एंग्लो-इंडियंस के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं

  • संविधान के अनुच्छेद 331 और अनुच्छेद 333 के तहत एंग्लो इंडियंस के लिए लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में सीटें आरक्षित की गई हैं. जहां लोकसभा में 2 सीटे हैं. वहीं राज्यों की विधनसभाओं में 1-1 सीट आरक्षित की गई हैं.
  • जॉर्ज बेकर और रिचर्ड हे एंग्लो इंडियंस समुदाय के आखिरी सांसद हैं. जो 2014 में सांसद बने थे. इनका कार्यकाल 2019 को समाप्त हो गया है. इस वक्त एंग्लो-इंडियंस का एक भी प्रतिनिधि लोकसभा में नहीं है. वहीं 14 राज्यों के विधानसभाओं में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि मौजूद हैं.
  • जिनमें आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.
  • अब जैसे ही ये संशोधन बिल राज्यसभा से पास हो जाता है. संसद और राज्यों की विधानसभा से एंग्लो इंडियंस का प्रतिनिधित्व पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. विपक्ष इस बिल का जम कर विरोध कर रहा हैं.वहीं सरकार अपना पक्ष साबित करने के लिए विपक्ष को ही गलत ठहरा रही है.
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, फोटो सोर्स: गूगल

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, फोटो सोर्स: गूगल

सरकार के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विपक्ष पर आरोप लगाया है कि

विपक्ष एंग्लो-इंडियन मुद्दे पर बहस करके 20 करोड़ अनुसूचित जाति(SC) और अनुसूचित जनजाति(ST) को नज़र अंदाज़ कर रहा है. भारत में अब 296 एंग्लो-इंडियंस ही बचे हुए हैं.

इस मामले को लेकर बीबीसी ने ऑल-इंडिया एंग्लो-इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष बैरी ओ ब्रायन से बात की है. ब्रायन ने केंद्र सरकार के दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. ब्रायन ने बकायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर इस बिल का विरोध किया है.

ब्रायन का कहना है कि

  • पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या काफ़ी कम है और उन्हें हम अपने देश में लाकर सुरक्षा देने की बात कह रहे हैं, वहीं अपने देश के ही एक छोटे समुदाय को हम पीछे धकेल रहे हैं.
  • एंग्लो इंडियन कोई पिछड़ा समुदाय नहीं है. हमारी संख्या सही-सही किसी को नहीं पता है लेकिन हम तीन-चार लाख लोग हैं. और अलग-अलग राज्यों में हमारी जनसंख्या 20-30 हज़ार हैं. इस वजह से हम किसी पार्टी को जिता नहीं सकते हैं. हमारी भाषा अंग्रेज़ी है और अधिकतर एंग्लो-इंडियन धर्म से ईसाई हैं.
  • हमें संविधान ने अपना जीवन जीने का अधिकार दिया है. संसद और विधानसभा में नामित सदस्य हमारी मांग उठा सकते हैं. अगर एंग्लो-इंडियन समुदाय का कोई व्यक्ति अगर परेशान होगा तो वो उनके पास जा सकता है. हमारे समुदाय की चिंताएं यही लोग उठा सकते हैं. इसी की सुरक्षा के लिए हम यह प्रावधान चाहते हैं.

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद द्वारा एंग्लो इंडियन की जनसंख्या को लेकर किए दावे पर ब्रायन का कहना है कि

2011 की जनगणना में जिन लोगों ने धर्म के कॉलम में खुद को एंग्लो-इंडियन लिखा उनको ही सरकार ने एंग्लो इंडियन मान लिया. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और झारखंड में बीजेपी सरकार और पिछली सरकार ने विधानसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के व्यक्तियों को जगह दी है लेकिन, मोदी सरकार ने अब जो आंकड़ा दिया है. उसमें बताया है कि इन-इन राज्यों में कोई एंग्लो इंडियन नहीं है. फिर आखिर इन्होंने किसको विधानसभा का सदस्य बनाया था. इनका कहना है कि पश्चिम बंगाल में सिर्फ 9 एंग्लो इंडियन बचे हैं जबकि मेरे घर में ही 11 सदस्य हैं. हमारी मांग है कि सरकार डेटा निकाले और हमारी जनगणना करे फिर उसके बाद कोई फैसला ले. सरकार सिर्फ 296 लोग कह कर हमें खारिज नहीं कर सकती है.

ब्रायन की एक बात बेहद गौर करने वाली है. उन्होंने सरकार के लिए कहा है कि

ब्रिटिश शासन के भारत छोड़ कर जाने के बाद हमारे शीर्ष नेता फ्रैंक एंतनों ने किताब लिखी थी ‘ब्रिटेन्स बिटरेल इंडिया’ और मैं आज बोल रहा हूं कि यह सेकेंड बिटरेल हो रहा है. उस समय बाहर के लोगों ने धोखा दिया था लेकिन, आज हमारी सरकार, हमारे भाई-बहन विश्वासघात कर रहे हैं.

यह कितना शर्मनाक और विवादस्पद है कि हमारे देश में दूसरे देश के अल्पसंख्यकों के लिए जगह है. सरकार को उनके दुख-दर्द की पूरी खबर है. उनके साथ किस प्रकार का दुर्व्यवहार हो रहा है. उसकी पूरी जानकारी है. लेकिन, अपने देश के अल्पसंख्यकों का साथ क्या हो  रहा है इसकी रत्ती भर परवाह नहीं है. एक तरफ मुसलमान सड़कों पर पुलिस के डंडे खा रहे है. वहीं दूसरी तरफ एंग्लो-इंडियंस को अपनी अस्मिता बचाने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखना पड़ रहा है. सवाल ये उठता है कि जब सरकार अपने ही देश के अल्पसंख्यकों का अधिकार छीन रही है तो वो दूसरे देश के अल्पसंख्यकों को क्या अधिकार देगी. हां! उनसे वोट ज़रूर ले लेगी.

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