बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को मान लिया और कहा है कि रेप करना या रेप का अटैम्प्ट करना दोनों ही बराबरी के गुनाह हैं। रेप अटेम्प्ट पीड़ित को दोनों ही, न सिर्फ शारीरिक तौर पर बल्कि मानसिक तौर पर भी बहुत गहरा नुकसान पहुंचाता है।

दरअसल, कोर्ट 2011 में पुणे के विशाल भालेराव नाम के 24 साल के शख्स द्वारा एक 12 साल की बच्ची के रेप केस की सुनवाई कर रहा था। जिसमें जस्टिस साधना एस जाधव ने आरोपी भालेराव द्वारा रियायत की मांग के लिए दर्ज याचिका को खारिज कर दिया। इसके अलावा आरोपी भालेराव को आईपीसी की धारा 366(अपहरण, शादी के लिए मजबूर करने के लिए किसी महिला का अपहरण या उत्पीड़न) और 376(बलात्कार) के तहत 4 साल और 7 साल की सज़ा सुनाई गयी।

प्रतिकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स; गूगल

अब इस बात पर आरोपी का केस लड़ रहे वकील स्वप्निल ओवरलेकर ने आरोपी की सज़ा कम करवाने के लिए तमाम तरह की कानूनी दलीलें पेश करते हुए रेप की धारा हटाने की मांग करी थी। उनका कहना था कि डॉक्टरों की जांच से ये पता चलता है कि बच्ची के साथ रेप करने का अटैम्प्ट किया गया है तो, आरोपी के ऊपर से धारा 366 और 376 हटा कर आईपीसी की धारा 511 के तहत मामले की सुनवाई की जाये।

आईपीसी की धारा 511 एक सामान्य प्रावधान है जो किसी एक विशेष खंड के तहत दंडनीय नहीं है और न ही किसी विशेष अपराध से निपटता है।

अब एक बार ज़रा 2011 में चलते हैं और जानते हैं कि आखिर मामला था क्या और क्यों रेप हो या न हो लेकिन रेप की कोशिश करना भी उतना ही दंडनीय होना चाहिए।

तो बात 9 नवम्बर, 2011 की है जब पीड़ित बच्ची, जो अपनी छोटी बहन के साथ अपनी दादी के पास रहती है। उस बच्ची के पिता इस दुनिया में नहीं हैं और माँ ने बच्चो से कोई रिश्ता नहीं रखा है। अब 9 नवम्बर के दिन उसकी दादी जंगल में बकरियाँ चराने गयी थी और बच्ची घर पर अकेले थी। ये मौका देख कर करीब शाम 4 बजे आरोपी भालेराव वहाँ पहुँच गया। भालेराव को मालूम था कि बच्ची उसको पहचानती है और उसकी बात मान लेगी।

भालेराव ने बच्ची को उसकी दादी के पास ले जाने की बात की और उसे अपने साथ चलने को कहा। आरोपी जान-पहचान का ही था तो बच्ची भी साथ चल पड़ी। भालेराव ने उसे ऑटो में बैठाया और जंगल के पास एक सूनसान जगह पर ले जाकर उसके साथ गंदी हरकतें करने लगा।

इसपर बच्ची चिल्लाई और रोने लगी लेकिन सूनसान इलाका होने की वजह से उसकी आवाज़ कहीं नहीं पहुँच पायी। अपनी बदतमीजियों से मन भरजाने के बाद आरोपी ने बच्ची को पैसे दिये और ऑटो करके घर जाने को कहा।
जब वो घर लौट कर आई तो उसने ये बात अपनी दादी को बताई। जिसके बाद वो लोग तुरन्त पुलिस के पास पहुंचे और कम्प्लेन दर्ज करवाई। चिंचवाड़ पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 366 और 376 के तहत एफ़आईआर को रजिस्टर किया गया। 19 नवम्बर 2011 को आरोपी को अरैस्ट कर लिया गया और 31 जनवरी 2012 को जाकर चार्ज-शीट फ़ाइल की गयी।

एडिशनल सेशन जज, पुणे ने आरोपी पर धारा 366 और 376 के तहत कार्यवाही की जिसके बाद आरोपी के पक्ष ने कोर्ट में अपील किया कि 366 और 376 की धाराएँ हटा कर उसपर आईपीसी की धारा 511 के तहत कार्यवाही की जाए। इस घटिया हादसे के एक दिन बाद 10 नवम्बर, 2011 को बच्ची का मेडिकल टेस्ट किया गया।

जहां डॉ विपुल गौरव ने बताया कि:

“उन्हें बच्ची के प्राइवेट अंगों में घाव मिले हैं लेकिन वो पुराने हैं और भर गए हैं।”

इसके अलावा कोर्ट ने बच्ची के बयान को मद्देनज़र रखते हुए कार्यवाही की। बच्ची ने कोर्ट को बताया कि:

“आरोपी ने उसकी अंडरगारमेंट उतारे और उसके प्राइवेट अंगों को गलत तरह से छुआ। उसने ज़बरदस्ती सेक्शुअल इंटरकोर्स करने की भी कोशिश की।”

लेकिन कानून तो सबूत और गवाहों पर चलता है। तो आरोपी के वकील ने आरोपी को बचाने के लिए तरह-तरह की कानूनी दलीलें पेश करना शुरू कर दिया। कभी बच्ची की बातों का हवाला दे कर, कभी रेप और रेप अटैम्प्ट के अंतर को लेकर।

पर कोर्ट ने इन सभी अर्जियों को खारिज कर दिया और कहा कि:

“इस तरह की कोशिशों को भी दंडनीय बनाया जाता है, क्योंकि बलात्कार की कोशिश भी पीड़ित को मानसिक या शारीरिक चोट पहुँचाती है  और इस तरह की घटनाओं  को एक अलार्म की तरह देखना चाहिए, जो कि स्वयं समाज पर एक चोट है। अपराधी का अपराध करने की कोशिश करना भी वैसा ही है जैसे कि वह अपराध करने में सफल हुआ हो। ”

कोर्ट के फैसले की कॉपी देखने के लिए दिये गए लिंक पर देख सकते हैं।

file:///C:/Users/PC1/Downloads/pdf_upload-361376.pdf       

कोर्ट के जजमेंट की कॉपी, फोटो सोर्स: लाइव लॉं

अब ये तो समझने वाली बात है कि किसी को जान से मार देना और मारने की कोशिश करना दो अलग-अलग चीज़ें हैं लेकिन दोनों का मक़सद एक ही है। दोनों ही समाज में नफरत की हद पार होने का संकेत देते हैं। उसी तरह बलात्कार जैसे मामले में तो ऐसी कोशिश करना भी उतना ही गंभीर और निंदनीय है जितना की बलात्कार करना।
ज़रा सोच के देखो कि क्या सोचेगी वो महिला जिसके जेहन में उसका बलात्कार हो जाने की याद भी दफन हो। कोई बच्ची कैसे अपनी ज़िंदगी खुशी से बिता पाएगी जब उसे याद आएगा कि कोई उसके कपड़े उतार कर उसका शारीरिक शोषण करने की कोशिश कर रहा था।

बलात्कार हमारे देश में एक बहुत बड़ी आपदा की तरह बढ़ता जा रहा है और इसका सीधा संपर्क हमारी मानसिक स्थिति से है। बलात्कार एक बहुत गलत शब्द है। साथ-साथ एक गलत सोच भी है और इस तरीके की सोच को लेकर किसी तरीके की रियायत नहीं बरती जानी चाहिए या दफाओं को लेकर किसी भी तरह का कोई विभाजन नहीं करना चाहिए।
ऐसे जुर्म की सज़ा का जब तर्क के आधार पर विभाजन होता है तो वो इंसान के दिमाग में जुर्म को लेकर एक ढील पैदा करता है। मतलब रेप अटैम्प्ट पर कम सज़ा होने से लोगों के मन में ये विचार उत्पन्न हो सकता है कि अगर वो बलात्कार को पूरी तरह अंजाम नहीं दे रहे और सिर्फ छेड़-छाड़ या ज़बरदस्ती कर रहे हैं तो वो उतना गलत नहीं है जितना की बलात्कार।

 

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