सियासत और असल लाइफ मेें कहा जाता है कि आप तब तक चोर नहीं है जब तक आपको चोरी करते पकड़ा न जाये। सारे सियासी नेता सफेद कपड़े अपने काले रंग छिपाना चाहते हैं। कुछ इस सफेद कपड़ों में अच्छे होते हैं लेकिन उनकी छोटी सी गलती बहुत भारी पड़ जाती है। ऐसे ही हमारे सियासत के इतिहास में एक नेता हैं जिन्हें देश के सबसे बड़े दलित नेता के रूप में जाना गया। इस नेता के नाम संसद में सबसे अधिक बैठने का रिकाॅर्ड है, इस नेता के नाम सबसे ज्यादा बार कैबिनेट में बैठने का रिकाॅर्ड है। मैं बात कर रहा हूं देश की संसद में चालीस बरस तक बैठने वाले बाबू जगजीवन राम की।

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बाबू जगजीवन राम देश के राजनीति के बड़े पुरोधाओं में से एक रहे हैं। उनके नाम जीतने के अधिक रिकाॅर्ड रहे हैं। एक समय बाबू जगजीवन राम इंदिरा के दौर में उनके साथ खड़े रहे तो एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने इंदिरा को छोड़कर अलग चुनाव लड़ा और जीते भी। लेकिन जब-जब उनके पास प्रधानमंत्री बनने का मौका आया, वो उससे उतना ही दूर हो गए। फिर वो तस्वीर सामने आई जिसने उनका राजनैतिक कैरियर, उनका रसूख ही खत्म कर दिया। उनकी दिली तमन्ना प्रधानमंत्री बनने की थी और वो उस तस्वीर की वजह से नहीं हो पाया।

वो किस्सा

साल था 1978। इंदिरा गांधी की बहू मेनका गांधी के संपादन में एक मैग्जीन छपती थी नाम था ‘सूर्या’। इसके एडिटर थे खुशवंत सिंह। एक दिन खुशवंत सिंह के दफ्तर में पीले लिफाफे में कुछ फोटोज आती हैं। यह फोटो सुरेश कुमार की थी। सुरेश, जगजीवन राम की दूसरी पत्नी का बेटा था। खुशवंत सिंह इन तस्वीरों के बारे में अपनी ऑटो-बायोग्राफी में बताते हैं कि ये साक्षात पोर्न थीं।

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सुरेश की जो तस्वीरें सामने आईं। उसमें वे किसी लड़की के साथ सैक्स कर रहे थे। खुशवंत सिंह लिखते हैं कि कामदेव की 64 मुद्रायें होती हैं। उसमें 10 सुरेश कुमार की इन फोटोज में थीं।

खुशवंत सिंह इन फोटोज को छापने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने छापने से मना भी किया। लेकिन वो फोटोज छप गईं और यहीं से जगजीवन का कैरियर शिखर से पतन की ओर चलने लगा। सुरेश ने इन तस्वीरों पर सफाई दी कि उनको किडनैप किया गया था और बेहोश करके उनकी तस्वीरें ली गई। लेकिन इस सफाई पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। बाद में सुरेश कुमार ने सुषमा नाम की उस लड़की से शादी कर ली जो डीयू में पढ़ती थी। लेकिन इससे उनकी छवि नहीं सुधरी।

इसके बाद 1980 में जगजीवन राम ने आखिरी बार दम लगाया कि वे प्रधानमंत्री बन सकें। लेकिन उनको मौका नहीं मिल पाया। इस पतन के बाद वे साल 1986 तक लोकसभा में रहे और 6 जुलाई 1986 को देहांत हो गया। बाबू जगजीवन राम का वो कथन हर दलित को और हर महिला को याद रखना चाहिये।

‘‘बिना शिक्षा के कोई महिला और दलित आगे नहीं बढ़ सकता।’’ 

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