हमारे देश में बहुत से धर्म हैं। धर्मों में बहुत-सी धार्मिक आस्थाएं, परम्पराएं मौजूद हैं। आबादी के लिहाज़ से हमारे देश का सबसे बड़ा तबका हिन्दू धर्म से आता है। हिंदू धर्म में कई सारी परंपराएं जो सदियों से चली आ रही हैं और आज भी समाज में मौजूद हैं। लेकिन इन परंपराओं में से एक ऐसी परंपरा है जिसे भारत और पाकिस्तान बॉर्डर पर बसे इस गाँव ने अब छोड़ने का फैसला कर लिया है।

ये है पूरा मामला

ये गुड न्यूज़ भारत और पाकिस्तान बॉर्डर के एक गाँव से आई है। गाँव का नाम अकली है। यहां ज़्यादातर राजपूत हिंदुओं की आबादी हैं। यह गाँव राजस्थान के बाड़मेर जिले में है। गांव की पूरी आबादी 2011 की जनगणना के हिसाब से कुल मिला कर सिर्फ 199 है। मतलब यहां के 42 घरों में सिर्फ 199 लोग रहते हैं। ये तो रही इस गाँव की थोड़ी सी जानकारी, जिसे सिर्फ इसलिए बताया ताकि आप इनकी इस खूबसूरत पहल से यह अनुमान लगा सके कि किसी भी अच्छी चीज़ के लिए हमेशा ज़्यादा होना ही ज़रूरी नहीं हैं।

असल में मुद्दा ये है कि हिन्दू धर्म में किसी की मृत्यु के बाद ‘मृत्यु-भोज’ करवाया जाता है। जो कि अनिवार्य होता है क्योंकि मरने वाले के परिवार वालों ने अगर यह मृत्यु-भोज नहीं कराया तो पूरा समाज उसका बहिष्कार कर देता है। इस मृत्यु-भोज में तेरहवीं के दिन ब्राह्मणों को सबसे पहले भोजन कराना होता है। उसके बाद रिश्तेदारों और समाज के सभी लोगों को भोज के रूप में खाना खिलाना होता है। गांव में भी कुछ ऐसी ही परंपरा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

अब यहां सवाल ये है कि अगर किसी गरीब के घर में मौत हो जाती है तो वह कैसे पूरे गाँव को मृत्यु-भोज परंपरा के अनुसार खाना खिलाएगा? उस पर भी भोज न खिला पाने का डर, कि कहीं उसका सामाजिक बहिष्कार न कर दिया जाए। इसलिए वह फिर लोगों से उधार व कर्ज़ मांगने लगता है। जिसकी वजह से वह सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से दब जाता है। अब जरा सोचिए कैसे वह गरीब आदमी जो अपने घर का ख़र्चा उठाने में सक्षम नहीं है, कर्ज लेने के बाद अपना घर चलाए या लिया हुआ कर्ज़ चुकाए?

बस समाज की इन्हीं ज़्यादतियों और तकलीफ़ों को देख कर अकली गांव ने यह फैसला लेते हुए एक सामाजिक सुधार की पहल की है। फैसला यह है कि अकली गांव में रहने वाले राजपूत समाज के लोगों ने मृत्यु भोज की परंपरा को छोड़ दिया है। और इसके बदले एक साधारण-सा नियम बनाया है।

नियम क्या है?

मृत्यु भोज की परंपरा को छोड़ देने वाला यह गाँव, अब से इस नियम का पालन करेगा कि ‘अब से गाँव में किसी बुजुर्ग की मौत होने पर तेरहवें दिन के मृत्युभोज पर पांच पकवान बनेगा और इसके लिए भी समाज ने कुछ नियम बनाए हैं’

प्रतीकात्मक तस्वीर/ फोटो सोर्स- गूगल

मज़ेदार बात तो यह है कि अगर कोई इस फैसले के खिलाफ जाएगा, तो उसका ही सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा। यह फैसला रविवार को एक बैठक में लिया गया। इस पूरे मामले पर इसी गांव के प्रतापसिंह सोढ़ा का कहना है कि,

“बारहवें दिन शोक भंगाई के तौर पर शराब पिलाने की रस्म भी नहीं होगी। गुड़ से शोक खत्म किया जाएगा। कोई भी शख्स गांव वालों के दबाव में आकर परिजन के बिछड़ने के गम के बीच मृत्यु भोज के लिए पैसा जुटाने में लग जाता है। कर्ज में डूबा वह व्यक्ति किसी के सामने अपनी पीड़ा भी नहीं बता पाता था”

ये भी जान लीजिए?

पहल करने की दिशा में भारत और पाकिस्तान के बॉर्डर का सिर्फ यहीं गाँव आगे नहीं आया है। बल्कि भारत और पाकिस्तान बॉर्डर से सटा एक और गाँव है, जिसने एक पहल अनोखे अंदाज़ से शुरू की है। इस गाँव का नाम भियाड़ है।

पहल के रूप में इस गाँव के लोग नशे के खिलाफ खड़े हो गए हैं। नशे के खिलाफ खड़ा होना एक अच्छी पहल है, लेकिन इस पहल को एक नए अंदाज़ से किया गया है। नया अंदाज़ यह है कि अब यहां के लोग शादी के कार्ड पर यह साफ-साफ शब्दों में छपवा रहे हैं कि शादी में नशे का कोई सामान नहीं मिलेगा। इसलिए नशा छोड़ दें और फलां तारीख़ को शादी में ज़रूर आएं।

शादी के कार्ड में नशा नहीं करने की मनुहार।
शादी का कार्ड, फोटो सोर्स- गूगल

ऐसी ही एक मिसाल इस गांव के शिक्षक राजेंद्र सिंह ने अपनी बहन की शादी के कार्ड पर छपवा कर दी। शिक्षक राजेंद्र ने कार्ड में लिखवाया कि ‘शादी में अफीम, डोडा, शराब, बीड़ी, तंबाकू का सेवन पूर्णतः बंद रहेगा।

आख़िर में…

खैर, इन गांवों के लोगों ने तो अपने-अपने स्तर पर यह पहल शुरू कर दी हैं। अब देखते है जो लोग इन गांव वालों की पहल से सहमत हैं, वह कब ऐसी किसी प्रथा को ख़त्म करने के लिए कोई अनोखी पहल शुरू कर मिसाल बनते हैं?

इस लेख के अंश दैनिक भास्कर से लिए गए हैं।

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