साल 1980 का वो दिन जब बंबई में एक ऐसी पार्टी का अधिवेशन चल रहा था, जो अभी-अभी बनी थी। पूरा मैदान खचाखच भरा हुआ था, मंच पर सभी बड़े नेता बैठै हुये थे। एक-एक करके सब आये और फिर अपनी बात रखते। आखिरी में आये इस नयी-नवेली पार्टी के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी। अटल बिहारी वाजपेयी बोलते रहे और कार्यकर्ता ताली बजाते रहे।

कभी वो जयप्रकाश नारायण को विचार कहते तो कभी जनता दल टूटने का अफसोस मनाते। उन्होंने इस पार्टी की विचारधारा बताई और कैसे काम करेगी इस पर भी बात की। आखिर में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा,

’भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर, मैं ये भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं। ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा’।

आज तब की बात में कहानी भारतीय जनता पार्टी बनने की।

Image result for atal bihari vajpayee in first adhiveshanभारतीय जनता पार्टी को उन नेताओं ने बनाया था जो संघ की शाखा से निकलकर जनसंघ और जनता पार्टी में आये थे। भारतीय जनता पार्टी के बनने की शुरूआत श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, वो शख्स जिन्होंने कांग्रेस से निकलकर साल 1951 में जनसंघ पार्टी को बनाया। ये कांग्रेस का समय था जहां हर कोई कांग्रेस पार्टी में जा रहा था। ऐसे में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कुछ युवा नेताओं के साथ इस पार्टी को आगे बढ़ाया।

साल 1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ की मात्र तीन सीटें आईं। इसके बाद वो घटना आती है जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू जाने के लिये रवाना होते हैं। उनके साथ उनका स्टेनोग्राफर युवा अटल बिहारी वाजपेयी थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ट्रेन जब पठानकोट पहुंचती है तब वे वाजपेयी से कहते हैं, जाओ और देश की जनता को बताओ कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ क्या हुआ? ऐसा उन्होने इसलिए कहा था क्योंकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जम्मू नहीं जाने दिया जा रहा था।

साल 1953 में जनसंघ अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी का श्रीनगर में निधन हो जाता है।

जनसंघ और वाजपेयी

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी पूरी तरह से जनसंघ में आये। वाजपेयी भाषण देने में माहिर थे। जनसंघ को एक ऐसा ही नेता चाहिए था जो नेहरू की संसद में घुसकर, उनकी बुराई कर सके। जब जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित यूएन चली गईं तो लखनउ की लोकसभा सीट खाली हो गई। जनसंघ ने अटल बिहारी वाजपेयी को वहां से चुनाव लड़ा दिया। कुछ कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर अटल बिहारी वाजपेयी ने खूब प्रचार किया लेकिन चुनाव हार गये। ये जनसंघ की हार थी, अटल बिहारी वाजपेयी की हार थी।

20 तस्वीरों में बीजेपी का इतिहास: जनसंघ से मोदी सरकार तकइसी समय संघ के अध्यक्ष गोलवलकर की नजर इस युवा नेता पर पड़ी। इस नेता को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए संघ के एक कार्यकर्ता को उनके साथ लगा दिया। वो नेता जो अटल बिहारी वाजपेयी का जोड़ीदार बनने वाला था। ये नेता आडवाणी थे और इस जोड़ी को लोग अटल-आडवाणी की जोड़ी के तौर पर याद करने वाले थे।

उस समय जनसंघ को संभाल रहे थे दीनदयाल उपाध्याय। दीनदयाल तब जनसंघ के महासचिव के पद पर थे। तभी 1957 के लोकसभा चुनाव हुये। दीनदयाल उपाध्याय चाहते थे कि वाजपेयी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इसलिए अटल बिहारी वाजपेयी को 1957 के आम चुनाव में तीन सीटों से चुनाव लड़ाया गया, लखनउ, मथुरा और बलरामपुर। लखनउ में अटल की जमानत जब्त हो गई, मथुरा में दूसरे नंबर पर रहे और बलरामपुर से चुनाव जीत गये। 33 साल के अटल पहली बार संसद पहुंचे, इस चुनाव में जनसंघ की 5 सीटें आईं। इस समय जनसंघ के अध्यक्ष थे, आचार्य देव प्रसाद घोष। जो 1959 तक जनसंघ के अध्यक्ष का दायित्व संभालते रहे।

घोष के बाद जनसंघ के अध्यक्ष बहुत जल्दी-जल्दी बदलते रहे पहले पीताम्बार दास, अवसरला राम राव और फिर दोबारा घोष। एक तरफ जनसंघ के अध्यक्ष बदलते जा रहे थे। दूसरी तरफ जनसंघ का नेता अटल बिहारी वाजपेयी, नेहरू की नीतियों की आलोचना करते और नेहरू को सलाह दे डालते। नेहरू को पता था कि ये नेता बड़ा बनेगा, साथ में ये भी जानते थे कि ये नेता कांग्रेस को दिक्कत दे सकता था।

जब 1962 में तीसरे आम चुनाव हुये तो अटल बिहारी वाजपेयी फिर से बलरामपुर से चुनाव लड़े। तब जवाहर लाल नेहरू ने वाजपेयी को हराने के लिए दिल्ली की दिग्गज नेता और अच्छे भाषण देने के लिए मशहूर सुभद्रा जोशी को बलरामपुर भेज दिया। सुभद्रा जोशी के लिए उस समय के मशहूर अभिनेता बलराज साहनी प्रचार-प्रसार करने आये। नतीजा सुभद्रा जोशी जीतीं और वाजपेयी हार गये। इस चुनाव में जनसंघ ने 14 सीटे जीतीं, जो जनसंघ के लिए अब तक की सबसे बड़ी जीत थी।

20 तस्वीरों में बीजेपी का इतिहास: जनसंघ से मोदी सरकार तकवाजपेयी-आडवाणी का दौर

इसके चुनाव के बाद जनसंघ में मतभेद बढ़ने लगते हैं। आपस में ही कुछ दिग्गज नेताओं में टकराव शुरू हो जाता है। इसकी शुरूआत होती है एक अधिवेशन से जिसमें कुछ दिग्गज नेता जाते ही नहीं है। कौन थे ये नेता? अटल बिहारी वाजपेयी और बलराज मधोक। बलराज मधोक जनसंघ के अध्यक्ष बन जाते हैं और अब अध्यक्ष पद से जाने की बारी बलराज मधोक की आती है। बलराज मधोक 1967 के चुनाव के वक्त अध्यक्ष थे, इसी चुनाव में अब जनसंघ की 35 सीटें आईं। जो अब तक के हुये चुनाव में सबसे ज्यादा थीं। बलराज मधोक को लगता था कि पार्टी की इतनी ज्यादा सीटें उनकी ही बदौलत आई हैं। बलराज मधोक को हटा दिया जाता है और अध्यक्ष बनते हैं अटल बिहारी वाजपेयी के राजनैतिक गुरू दीनदयाल उपाध्याय। उनके अध्यक्ष बनने के 43 दिनों के अंदर ही उनकी लाश मुगलसराय स्टेशन पर मिलती है।

Related imageइसके बाद पार्टी में अध्यक्ष बनने के लिए घमासान शुरू हो जाता है। दावेदारी कई लोग कर रहे थे जिसमें सबसे बड़ा नाम था, बलराज मधोक का। लेकिन अध्यक्षीय का सेहरा जाता है, अटल बिहारी वाजपेयी के सर पर। अटल बिहारी वाजपेयी 1969 में जनसंघ के अध्यक्ष बनते हैं। इस बात से सबसे ज्यादा नाखुश थे पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक। वे अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ बयान देने लगे, वाजपेयी के लाये सभी प्रस्ताव पर अडंगा लगा देते। तब अटल बिहारी वाजपेयी की इस समस्या का हल किया लालकृष्ण आडवाणी ने।

साल 1973 के कानपुर अधिवेशन में आडवाणी को जनसंघ का अध्यक्ष बनाया जाता और आडवाणी, बलराज मधोक को अनुशासनहीनता के चलते तीन साल के लिए पार्टी से बाहर कर देते हैं। इसके बाद शुरू होता है अटल-आडवाणी का दौर।

1975 में इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ जाते हुए देश में आपातकाल लागू कर दिया। देश भर की जेलों में कांग्रेसी विरोधी नेताओं को भर दिया गया। वाजपेयी, आडवाणी जैसे नेता भी जेल में ठूंस दिये गये। कई कांग्रेसी नेताओं ने इमरजेंसी का विरोध किया और पार्टी छोड़ दी। तब कांग्रेस के खिलाफ एक खेमा खड़ा हो रहा था और इसको एकजुट करने में लगे हुये थे, सोशलिस्ट नेता जयप्रकाश नारायण। जयप्रकाश नारायण ने देश भर की पार्टियों से एकजुट होने का आह्वान किया। जिसमें लोकदल, सोशलिस्ट, जनसंघ और कांग्रेस छोड़कर सभी नेता आए। इन सभी ने मिलकर एक पार्टी बनाई और नाम दिया जनता दल। जनता दल का मकसद था, इंदिरा गांधी को बेदखल करना और जनता को एक सही सरकार देना। 1977 में आपातकाल खत्म हुआ और लोकसभा चुनाव हुये।

पहली गैर-कांग्रेसी सरकार

इंदिरा गांधी विरोधी लहर चल रही थी। जनता दल चुनाव जीती और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। प्रधानमंत्री पद के तीन उम्मीदवार थे, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम। जय प्रकाश नारायण को ये चुनाव करना था और उन्होंने मोरारजी देसाई को चुना। जनसंघ के तीन नेताओं को कैबिनेट में जगह मिली अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और बृजलाल खाबरी।

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अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्रालय दिया गया और आडवाणी को सूचना और प्रसारण मंत्रालय। तभी उनका वो फेमस बयान आता है जब वो पत्रकारों से कहते हैं, ‘आप लोगों को तो झुकने को कहा गया था लेकिन आप लोग तो रेंगने ही लगे’। आपातकाल की जांच के लिए शाह आयोग का गठन हुआ और इंदिरा गांधी को गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के आदेश पर गिरफ्तार कर लिया गया। प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई इससे इत्तेफाक नहीं रखते थे। उनका मानना था कि आपातकाल की सजा जनता ने उनको सरकार से हटा कर दे दी है। इसी के चलते दोनों में मतभेद होने लगे और 1979 में चौधरी चरण सिंह ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार गिर गई, लेकिन जनता पार्टी अभी भी बनी हुई थी।

जनता पार्टी के समाजवादी नेताओं को तब जनसंघ के नेताओं की दोहरी सदस्यता से समस्या होने लगी। जनसंघ के नेताओं का संबंध संघ से जुड़ा हुआ था। समाजवादी नेताओं का मानना था ऐसे नेताओं को संघ से दूर हो जाना चाहिये। संघ की शाखा से नेता बने वाजपेयी-आडवाणी ऐसा करने के लिए कतई राजी नहीं थे। तब जनता पार्टी के एक अधिवेशन में जनसंघ के नेताओं को जनता दल से बाहर कर दिया गया।

इसके बाद 6 अप्रैल 1980 को अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी एक नई पार्टी का गठन करते हैं, भारतीय जनता पार्टी। भारतीय जनता पार्टी का पहला अधिवेशन होता है और वाजपेयी का वो कथन सबको याद रह जाता है-

‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा’।

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