पूरा देश नये साल के जश्न में है। सब अपने तरीके से इसे एंजॉय कर रहे होंगे। फिर भी इतिहास अपनी कहानी नहीं भूलने देता। 1 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में अचानक दो गुटों में लड़ाई छिड़ गई। हंगामा इतना हुआ कि सड़कें, रेल, सब जगह चक्का जाम कर दिया गया। यह लड़ाई थी दो गुटों के बीच अपने को सर्वश्रेष्ठ बताने की। इस लड़ाई का गर्त 200 साल पीछे है। जब देश अंग्रेजों का गुलाम था।

पुणे के पास भीमा नदी के तट पर जो लड़ाई हुई। उसका परिणाम आज देश की एकता पर पड़ रहा है। जिस फूट डालो राज करो नीति को हमनें आजादी के समय बेदखल किया था। वो आज भी हमारे वर्तमान में चल रही है तो उस जातिवादी लड़ाई की पूरी कहानी जानते हैं।

साल 1817

यह वो समय था जब भारत का लगभग हर कोना अंग्रेजों के कब्जे में था। कुछ राजा अपने राज्य को बचाने के लिए लड़ रहे थे। अंग्रेजों ने मराठा को अपने अधीन कर लिया था। ये वो समय था जो मराठा राजाओं से निकलकर पेशवाओं में आ गया था। उस समय पेशवा थे बाजीराव द्वितीय। जब सभी मराठा अपनी संधि से एक साथ आने लगे तो अंग्रेजों ने उनकी संधि तोड़ दी।

मराठाओं ने इससे आक्रोशित होकर पुणे में ब्रिटिश रेजीडेंसी को जला दिया। फिर 1817 में अंग्रेजों ने पुणे में मराठाओं को हराकर पुणे को पूरी तरह से अपने अधीन कर लिया। बस यहीं से दोनों के बीच टकराव शुरू हो गया और कोरेगांव की लड़ाई की नींव पड़ी।

कोरेगांव की लड़ाई

मराठा पुणे पर दोबारा कब्जा करने के लिए पुणे जा रहे थे। मराठा की सेना में 28,000 सैनिक थे। जब अंग्रेजों को इसकी खबर मिली तो उन्होंने अपने सैनिकों को इकट्ठा करना शुरु कर दिया। बाम्बे नेटिव इन्फेंट्री रेजिमेंट में 800 सैनिक थे। जिसमें 500 सैनिक महार जाति से भी थे। जो उस समय मराठाओं से परेशान थे और दबे-कुचले माने जाते थे। वे भी अंग्रेजों की मदद करने के लिए पुणे जा रहे थे। महारों की यह लड़ाई अपने आत्म सम्मान की लड़ाई थी। इसलिए दलित समाज के लिए इस लड़ाई का अलग महत्व था।

यह महज दो जातियों के बीच की लड़ाई नहीं थी बल्कि, यह एक जाति की विशिष्टता के खिलाफ लड़ाई थी। शुरुआत में महार समाज के लोग पेशवाओं के पास गए थे, उनके साथ मिलकर इस लड़ाई में शामिल होने के लिए लेकिन, उन्होंने महारों को दुत्कार दिया और उनकी काबिलियत पर सवाल उठाए। यह लड़ाई महारों की अपनी काबिलियत दिखाने और पेशवाओं की जातिगत मानसिकता का घमंड तोड़ने की थी।

प्रतीकात्मकर तस्वीर. फोटो सोर्स: गूगल

प्रतीकात्मकर तस्वीर. फोटो सोर्स: गूगल

1 जनवरी 1818 को पेशवा अपने 18,000 सैनिकों के साथ भीमा नदी के तट पर पहुंच गये थे। वहीं उनका सामना महार जाति की रेजिमेंट से हो गया। अब पुणे जाने के लिए मराठाओं को इस रेजिमेंट से युद्ध करना था। कोरेगांव में दोनों सेनाओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई। मराठा संख्या में बहुत ज्यादा थे लेकिन, महारों ने उनका डटकर सामना किया। 12 घंटे तक मराठा सेना को आगे नहीं बढ़ने नहीं दिया।

पुणे में जैसे ही अंग्रेजों को इस लड़ाई की सूचना मिली। उन्होंने अपना दूसरा दल अपने सैनिकों की मदद करने के लिए भेज दिया। पेशवा को जब इसकी खबर मिली। तो उन्होंने अपनी सेना को पीछे ले जाना उचित समझा और महारों की उस रेजिमेंट ने अंग्रेजों को वो लड़ाई जिता दी।

उस लड़ाई में मराठाओं की ओर से 500-600 सैनिक मारे गये। वहीं अंग्रेजों की ओर से लगभग 300 सैनिक मारे गये। भीमा कोरेगांव के जिस मैदान पर महार सैनिक मारे गये। अंग्रेजों ने 1822 में उनके सम्मान में विजय स्तंभ बनवाया। जिसमें मारे गये महार सैनिकों के नाम लिखे हैं।

अब विवाद क्यों है?

भीम राव अंबेडकर भी इस जगह आकर श्रद्धांजलि दे चुके हैं। 1 जनवरी 2018 को भी ऐसा ही कुछ हुआ था। तब दो दलों के विवाद ने दंगे का रूप ले लिया था। कथित तौर पर दलित मानते हैं कि ये लड़ाई अंग्रेजों ने नहीं उन्होंने जीती थी। इतिहास के गर्त में जो हुआ था। उसको नहीं बदला जा सकता लेकिन, हमें अपनी सोच बदलनी होगी। आज वो छुआछूत वाला दौर नहीं है। हमारे देश में संविधान और कानून है। हमें इतिहास की बातों पर आज को खराब नहीं करना चाहिए। लेकिन, आलम आज भी वही है जैसे पहले था।