25 मार्च 2019 को बीते अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है। इस दिन बांका जिले के पीबीएस कॉलेज मैदान में 10 हजार से भी ज्यादा लोग बैठे हुए थे। मंच पर स्थानिय नेता के अलावा कोई भी सेलीब्रिटी मौजूद नहीं था। इसके बावजूद उत्साहित भीड़ को देखना बेहद दिलचस्प था। थोड़ी ही देर में राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड मैडल जितकर देश का नाम रौशन करने वाली अर्जुन पुरस्कार विजेता श्रेयसी सिंह मंच पर आती है।

श्रेयसी सिंह के मंच पर आते ही गगनभेदी नारे पाबीएस कॉलेज के मैदान में गूंजने लगता है। लोग नारा लगाते हुए कहते हैं दादा अमर रहे…बांका के सम्मान में पुतुल देवी मैदान में …अबकी बारी पुतुल कुमारी। इसके बाद पुतुल कुमारी मंच पर नॉमिनेशन करने के बाद आती है। पुतुल के मंच पर आते लोग फिर से उत्साहित होकर नारा लगाने लगते हैं।

दरअसल, पुतुल कुमारी ने एनडीए गठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया। पुतुल के इस फैसले के बाद भाजपा ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद बांका के लोगों ने इस चुनाव को अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखना शुरी कर दिया। बांका में अब चुनाव तीन उम्मीदवारों के बीच हो गया है। राजद की तरफ से जयप्रकाश यादव यहां से चुनाव लड़ रहे हैं जबकि एनडीए ने जदयू विधायक व पूर्व सांसद गिरधारी यादव को मैदान में उतारा है। पुतुल कुमारी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में दोनों दलों के उम्मीदवार के लिए चुनौती बनी हुई है। भाजपा समर्थित उम्मीदवार के लिए पुतुल देवी का चुनाव लड़ना एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

भाजपा से दो-दो हाथ करने वाली महिला कौन है?

भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर होने के बावजूद पार्टी के खिलाफ जाकर चुनाव लड़ने वाली पुतुल देवी सामान्य नेता नहीं हैं। पुतुल देवी बांका व बिहार के कद्दावर नेता स्वर्गीय दिग्विजय सिंह की पत्नी है। दिग्विजय सिंह कौन हैं ये जानने के लिए आपको बिहार के राजनीति को कुछ साल पीछे जाकर जानना होगा।

दिग्विजय सिंह बांका से दो-दो बार सांसद रह चुके हैं। अटल जी की सरकार में उन्हें विदेश राज्य मंत्रालय और रेलवे राज्य मंत्रालय दिया गया था। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर दिग्विजय सिंह जब चुनाव लड़ रहे थे तो प्रभाष जोशी व कुलदीप नैय्यर जैसे पत्रकार भी उनके समर्थन में बांका जाते थे। यही नहीं बांका के लोग उन्हें दादा कहकर पुकारा करते थे।

दिग्विजय सिंह ने नीतिश कुमार, जार्ज फर्नांडिस और शरद यादव के साथ मिलकर जनती दल यूनाइटेड पार्टी बनाया था। नीतिश कुमार ने जार्ज को मुजफ्फरपुर से और फिर दिग्विजय सिंह को बांका से टिकट नहीं देकर पार्टी से अलग करने के लिए सोच लिया। लेकिन नीतिश के इस फैसले के खिलाफ दिग्विजय सिंह ने चुनाव लड़ने के लिए ठान लिया।

2009 के लोकसभा चुनाव में बांका की सीट एक जबरदस्त मुकाबले की गवाह बन रही थी। कभी जनता दल (यू) के कद्दावर नेता रहे दिग्विजय सिंह इस सीट से चुनाव लड़ रहे थे और सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इज्जत दांव पर लगी हुई थी।

दिग्विजय सिंह ने नॉमिनेशन के बाद हाथ उठाकर लोगों के समर्थन के लिए शुक्रिया अदा किया तो लोग गगनभेदी नारा लगाने लगे।इसके बाद वो अपने रंग में आ गए। उन्होंने मंच के पीछे लगे पोस्टर की तरफ इशारा किया और बोले-

ये नगाड़ा विद्रोह का नगाड़ा है। हमें इसे इतना बजाना है कि नीतीश कुमार की नींद हराम हो जाए।

 दिग्विजय सिंह के बोलते ही लोगों का उत्साह चरम पर पहुंच गया। यह चुनाव दादा जीत गए। यही वजह है कि इस बार फिर से जब बांका लोकसभा से भाजपा या गठबंधन दलों ने पुतुल को टिकट नहीं दिया तो बांका के लोगों ने इस चुनाव को अपने स्वाभिमान से जोड़ लिया।

 इन मुद्दों पर पुतुल देवी लड़ रही हैं चुनाव

 एक तरफ बांका में जहां राजनाथ सिंह, रविशंकर प्रसाद, भूपेंद्र यादव, नीतिश कुमार जैसे नेता एनडीए गठबंधन को जिताने के लिए रैली कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ तेजस्वी राजद उम्मीदवार के लिए बांका में कैंप कर रहे हैं। इसके बावजूद पुतुल देवी अपनी दो बेटी मानसी और श्रेयसी के साथ डोर टू डोर कैंपन कर रही है। पुतुल देवी अपने पति के किए कामों के आधार पर वोट मांग रही हैं। पुतुल बांका की रेल परियोजना, शहर के अस्पताल, सड़क, डैम आदि के नाम पर वोट मांग रही हैं। यही वजह है कि किसी भी दल से नहीं होने के बावजीद पुतुल कुमारी को समर्थन मिल रहा है।

बांका के वोटरों का समीकरण

बांका के लोकसभा चुनाव में कई मुद्दों के अलावा जातीय समीकरण अहम भूमिका निभाता रहा है। बांका लोकसभा क्षेत्र में जातीय समीकरण की बात करें तो यादव- तीन लाख , मुस्लिम दो लाख, गंगोता 80 हजार, कोईरी व कुर्मी 1 लाख 80 हजार, ब्राह्मण सवा लाख, भूमिहार 50 हजार व राजपूत डेढ़ लाख वैश्य दो लाख और महादलित वोटर ढ़ाई लाख हैं। दिग्विजय सिंह जब चुनाव लड़े तो जाति फैक्टर असफल हो गया। इस बार देखना यह है कि लोग पुतुल देवी का कितना साथ देते हैं।

यहां लोगों की सबसे बड़ी समस्या सिंचाई है। क्षेत्र में नहर की कमी है जिसके कारण किसानों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

यहां रोजगार भी काफी बड़ी समस्या है। क्षेत्र में उद्योगों की भारी कमी है जिसके कारण यहां रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे हैं। बांका की साक्षरता दर 58% है।  इतने कम साक्षरता दर की बड़ी वजह यहां शैक्षणिक संस्थानों की कमी है।

 समाजवादी नेताओं की धरती है बांका

बांका लोकसभा को समाजवादी नेताओं की धरती माना जाता है। इस लोकसभा से महान समाजवादी नेता मधु लिमये से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर चुनाव लड़ चुके हैं। यही नहीं इस बांका लोकसभा से जार्ज फर्नांडिस भी चुनाव लड़ चुके हैं। इसके बाद समाजवादी नेता दिग्विजय सिंह ने इस लोकसभा को अपनी कर्म भूमी बना लिया। इसके बाद राजद व जदयू दल के नेताओं ने भी यहां से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज किया।

2014 में RJD नेता जयप्रकाश नारायण यादव जीते थे। जयप्रकाश नारायण यादव को 2,85,150 वोट मिले थे। BJP उम्मीदवार पुतुल कुमारी को 2,75,006 वोट मिले थे। मात्र 10,144 वोट के अंतर से पुतुल कुमारी को हार मिली थी।

1957 में अस्तित्व में आए बांका लोकसभा क्षेत्र समाजवादियों का गढ़ रहा है।1967 में भारतीय जनसंघ के बी.एस. शर्मा जीते थे। 1971 और 1977 में समाजवादी नेता मधु लिमये यहां के सांसद चुने गए। 1998,1999 और 2009 में दिग्विजय सिंह को लोकसभा चुनाव में सफलता मिली।

 

 

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