मराठाओं में जब जांबाजों को याद करते हैं जो छत्रपति शिवाजी का नाम जेहन में आता है। जिनकी बहादुरी के बारे में हमने अपनी टेक्सट बुक में पढ़ा है, टीचरों के मुंह से सुना और अब इंटरनेट की दुनिया में विवाद भी देखे हैं। आज उन्हीं वीर सपूत छत्रपति शिवाजी की जयंती है। उनकी जयंती पर याद करते हैं उनकी बहादुरी भरे किस्सों को।

Image result for shivajiनिडर शिवाजी

बचपन में शिवाजी अपनी दोस्तों को इकट्ठा कर उनके नेता बनकर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे। युवावस्था में आते ही शत्रुओं पर आक्रमण करने लगे। कम उम्र में ही शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर कब्जा कर लिया। जिसके बाद पूरा दक्षिण शिवाजी को जानने लगा। दिल्ली तक उनकी धाक जम गई।

बीजापुर के शासक आदिलशाह शिवाजी को बंदी बनाना चाहते थे। लेकिन जब वे ऐसा नहीं कर पाये तो शिवाजी के पिता को बंदी बना लिया। शिवाजी ने अपनी नीति और साहस का सहारा लेकर पिता को आजाद कराया। जिसके बाद बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश दिया। उन्होंने इस काम के लिए सेनापति अफजल खां को भेजा। उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारने की कोशिश की। तब शिवाजी ने समझदारी से अफजल खां को ही मार दिया।

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शिवाजी की बढ़ती ताकत देखकर मुगल बादशाह औरंगजेब परेशान हो गया। उसने दक्षिण में नियुक्त अपने सूबेदार को शिवाजी पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। लेकिन सुबेदार को मुंह की खानी पड़ी। इस हार के बाद औरंगजेब ने अपने सबसे अच्छे सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह को 1,00,000 सैनिकों के साथ भेजा।  शिवाजी को कुचलने के लिए राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान से संधि कर ली। जिसके बाद दोनों ने मिलकर पुरन्दर के किले को अधिकार में लेने के लिये व्रजगढ किले पर अधिकार कर लिया। शिवाजी समझ गये इस किले को बचाना मुश्किल है। तब उन्होंने पुरंदर की संधि की।

मुस्लिम विरोधी नहीं थे शिवाजी

ऐसा अक्सर कहा जाता है शिवाजी मुस्लिम विरोधी थे। लेकिन ये बात सही नहीं है। उनकी सेना में ज्यादा संख्या में मुस्लिम नायक एवं सेनानी थे। अनेक मुस्लिम सरदार और सूबेदारों जैसे लोग थे। शिवाजी किसी जाति को खत्म करने के लिये नहीं लड़ रहे थे। वे तो कट्टरता के खिलाफ थे। वे तो हिंदुओं को सुरक्षित कर रहे थे न कि मुसलमानों को खत्म।
उनके शासन में आने के बाद दबी-कुचली हिंदू जनता के अंदर जो डर था, वो छूमंतर हो गया। शिवाजी के शासन में दोनों संप्रदायों के पूजा स्थलों की रक्षा की गई और धर्मांतरण कर चुके लोगों को भी सुरक्षा का जिम्मा लिया गया। शिवाजी की मृत्यु 1680 में हुई। जब तक वे सिंहासन पर रहे मराठा पताका उदय ही रही।

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