“मैं अपने सामने आए कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ. यहाँ के हालातों में मुझे मौत का क्षणिक डर ज़रूर है लेकिन, जब मैं गीता में कहे भगवान कृष्ण के उस वचन को याद करता हूँ तो मेरा डर मिट जाता है. भगवान कृष्ण ने कहा था कि आत्मा अमर है, तो फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि ये शरीर रहे या ना रहे. पिताजी मैं आपको डरा नहीं रहा हूँ लेकिन, अगर मैं मर भी गया तो आपको यकीन दिलाता हूँ कि मैं एक बहादुर सैनिक की मौत मरूँगा. मरते समय मुझे प्राण देने का कोई दु:ख नहीं होगा. ईश्वर आप सब पर अपनी कृपा बनाए रखे”

सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मनित मेजर सोमनाथ ने ये बातें साल 1941 दिसंबर को अपने माता पिता को एक पत्र में लिखी थी. 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में मेजर सोमनाथ ने अपने पराक्रम और वीरता का जो परिचय दिया था, उसका पूरा देश आज भी कायल है. आज देश के इस वीर शहीद योद्धा की जयंती है.

मेजर सोमनाथ शर्मा, फोटो सोर्स - गूगल'

मेजर सोमनाथ शर्मा, फोटो सोर्स – गूगल’

आज ही के दिन यानि 31 जनवरी साल 1923 को मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म हिमाचल प्रदेश के कांगरा जिले के गांव डाढ़ में रहने वाले एक सैन्य परिवार में हुआ था. पिता का नाम अमर नाथ शर्मा और माँ का नाम सरस्वती था. सोमनाथ के पिता एक सैन्य अधिकारी थे जो आर्मी मेडिकल सर्विस के डायरेक्टर जनरल के पद से रिटायर हुए थे. पिता के अलावा मेजर सोमनाथ पर उनके मामा किशन दत्त वसुदेव की गहरी छाप पड़ी जो 4/19 हैदराबादी बटालियन का हिस्सा थे.

1942 में मलाया में जापानियों से हुए युद्द में सोमनाथ के मामा शहीद हुए थे. परिवार में चल रही सैन्य परंपरा के चलते सोमनाथ ने बचपन में ही भारतीय सेना में जाने का लक्ष्य बना लिया था. वहीं सोमनाथ के दादा ने उनको बचपन से ही भगवद गीता में कृष्ण और अर्जुन की शिक्षा दी थी जिस पर वे अपनी ज़िंदगी के आखिर लम्हों तक चलते रहे.

अपनी सैन्य परिवार के साथ मेजर सोमनाथ शर्मा, फोटो सोर्स - गूगल

अपने सैन्य परिवार के साथ मेजर सोमनाथ शर्मा, फोटो सोर्स – गूगल

शुरुआती पढ़ाई और सेना में शामिल 

शुरुआती पढ़ाई नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से पूरी करने के बाद सोमनाथ ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए देहरादून के प्रिन्स ऑफ़ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज में दाखिला लिया.

22 फरवरी वर्ष 1942 को ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होते हुए सोमनाथ कुमाऊं रेजिमेंट का हिस्सा बने. इसी दौरान दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ जिसके चलते उनको मलाया के पास के रण में तैनात किया गया. अपनी पहली पोस्टिंग के दौरान ही सोमनाथ ने अपने पराक्रम के तेवर दिखाये जिसके बाद वो एक बहादुर सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे थे.

फोटो सोर्स - गूगल

फोटो सोर्स – गूगल

बंटवारे के बाद भारत-पाकिस्तान की सेनाओं के बीच हुई पहली जंग

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद 22 अक्टूबर, 1947 को पकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर हमला बोल दिया था. उस वक्त सोमनाथ, हॉकी खेलते हुए बांया हाथ टूट जाने की वजह से अस्पताल में भर्ती थे. पाकिस्तानी सेना से खदेड़ने के लिए चार कुमाऊं रेजीमेंट को कश्मीर भेजा जा रहा है, जब इस बता की खबर अस्पताल में इलाज करा रहे सोमनाथ को मिली तो, उन्होंने अपनी रेजीमेंट का हिस्सा बनने की जिद पकड़ ली. सोमनाथ की इस जिद पर हैरानी जताते हुए सीनियर अधिकारियों ने कहा,

तुम्हारे हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ है, ऐसे में तुम्हारा जंग में जाना ठीक नहीं है.

सीनियर अधिकारी ने सोमनाथ को बहुत समझाया लेकिन, भारत मां का वो सच्चा सपूत कहाँ मानने वाला था. अधिकारियों से अनुमति मिलते ही अपने टूटे हाथ के साथ सोमनाथ तुरंत एयरपोर्ट पहुंचे और अपनी डेल्टा कंपनी को ज्वाइन कर लिया. सोमनाथ शर्मा इसी कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी कमांडर थे. 3 नवम्बर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी समेत 3 और टुकड़ियों को कश्मीर घाटी के बडगाम मोर्चे पर तैनात किया गया.

इस भारतीय बटालियन को उत्तर की तरफ से बढ़ने वाले पाकिस्तानी सैनिकों को श्रीनगर पहुंचने से रोकना था. उसी दौरान मेजर सोमनाथ शर्मा की डी कंपनी के जवानों पर स्थानीय घरों से फायरिंग होनी शुरू हो गई. सैनिकों ने आम जानमाल को नुकसान न पहुंचे इसलिए जवाबी कार्रवाई नहीं की.

इसी समय खबर आती है कि करीब 700 आतंकियों और पाकिस्तानी सैनिकों की एक टुकड़ी बडगाम की तरफ बढ़ रही है और डी कंपनी गुलमर्ग से बडगाम की तरफ बढ़ रही थी. ऐसे में डी कंपनी तीन तरफ से दुश्मनों से घिर चुकी थी. तभी दुश्मनों ने सोमनाथ की कंपनी पर मोटार्र से हमला बोल दिया जिसमें कई जवान घायल हो गए.

इतने विपरीत हालातों में भी मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी ने बहादुरी से दुश्मन का मुकाबला करते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोके रखा. मेजर सोमनाथ शर्मा भाग-भागकर अपने जवानों के बीच हथियार और गोला-बारूद की सप्लाई कर रहे थे और एक लाइट मशीनगन अपने हाथ में उठा रखी थी जिससे वो लगातार दुश्मनों पर फायर कर रहे थे.

युद्ध के दौरान की एक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल

युद्ध के दौरान की एक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

इसी दौरान आतंकियों का एक मोटार्र शेल गोला-बारूद के एक जखीरे पर आ गिरा. भयानक विस्फोट हुआ. इस भयानक विस्फोट से मेजर सोमनाथ शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए. शहीद होने से पहले उन्होंने अपने हेडक्वॉर्टर को संदेश भेजा था. उसमें उन्होंने लिखा था-

‘दुश्मन हमसे सिर्फ 50 यार्ड्स की दूरी पर है. हमारी संख्या काफी कम है. हम भयानक हमले की जद में हैं लेकिन, हमने एक इंच जमीन नहीं छोड़ी है. हम अपने आखिरी सैनिक और आखिरी सांस तक लड़ेंगे.’

पाकिस्तान के साथ हुए इस  युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा समेत 21 जवान शहीद हो गए. मेजर सोमनाथ की डेडबॉडी तीन दिन बाद मिली थी. मेजर शर्मा के शव को उनके पिस्टल के होल्डर और सीने से चिपके भगवद गीता से पहचाना जा सका था.

अद्वितीय वीरता, साहस एवं कुशल नेतृत्व के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च वीरता पदक परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.