देखा जाए तो गांधी-नेहरु परिवार भारतीय राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं। आज़ादी के बाद ऐसे कई मौके आए जब गांधी-नेहरु परिवार ने इस देश को बहुत कुछ दिया। चाहे वो देश के संविधान में अपना योगदान हो या फिर देश की राजनीति को नई हवा देने की बात। लेकिन साथ ही साथ इस परिवार कांग्रेस पार्टी के रुप में काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। गांधी-नेहरु परिवार ने ऐसे कई नेता दिए जिन्होंने देश के लिए उच्च पदों पर रहकर देश की सेवा की. इसी परिवार में जब संजय गांधी का जन्म हुआ फिर वहां से बदलाव होना शुरु हुआ। काफी कम उम्र में ही वे भारतीय राजनीति का जाना माना चेहरा बन गए। जब उनकी शादी हुई तब तक वे राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो चुके थे।

फिर दिन आया 13 मार्च 1980। गांधी परिवार के लिए यह दिन खुशियाँ लेकर आया क्योंकि घर में नए सदस्य का आगमन हुआ था। पिता संजय और मेनका गांधी दोनों काफी खुश थे। पूरा गांधी परिवार खुश था क्योंकि उन्हें सत्ता को आगे बढ़ाने के लिए एक ‘युवराज’ जो मिल गया था। नए सदस्य का नाम रखा गया वरुण गांधी। लेकिन शायद गांधी परिवार को किसी की नज़र लग गई और अभी बच्चे ने किलकारियां मारनी ही शुरु की थी कि पिता की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई।

Gandhi Family
राजीव गांधी और संजय गांधी अपनी पत्नी,बच्चों और माँ इंदिरा से साथ, फोटो सोर्स – गूगल

उस वक़्त वरुण सिर्फ तीन महीने के थे। संजय गांधी के मौत के बाद मेनका गांधी का मानना था कि इस इस मौत की वज़ह गांधी परिवार है. जिसके बाद उन्होंने अपने आप को गांधी परिवार से अलग कर लिया। पहले अपनी खुद की पार्टी से जीत हासिल करने के बाद 1988 में बीजेपी में शमिल हो गई। पीलीभीत से चुनाव में सांसद के रुप में जीत हासिल करने वाली मेनका के साथ-साथ उनके बेटे ने भी राजनीति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और साल 2009 में पीलीभीत से ही चुनावी सफर की शुरुआत की और इस सीट पर उन्होंने जीत हासिल की। फिर संजय गांधी ने सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने के लिए हुंकार भरी और 2014 में जीत भी हासिल की।

आसान नहीं रहा राजनीति सफर

1999 में जब वरुण गांधी सिर्फ 19 साल के थे तो उन्होंने अपनी मां के लिए चुनावी प्रचार करने की ठानी और सफल भी रहें। लेकिन 1999 से लेकर अभी तक का सफर आसान नहीं रहा है वरुण गांधी के लिए। अगर देखा जाए तो पिछले पांच सालो में वरुण गांधी का राजनीतिक सफर काफी मुश्किल भरा रहा। वरुण गांधी कहने के लिए बीजेपी के एक प्रतिष्ठित नेता है लेकिन उनके नाम पर रोज़ हज़ारों मामले पार्टी से बाहर निकलने के लिए दर्ज़ किए जाते है। एक समय में जब बीजेपी की बागडोर राजनाथ सिंह के हाथों में था तो उन्हें पार्टी का महासचिव बना दिया गया। पश्चिम बंगाल का प्रभारी  बनाया गया। बीजेपी के इतिहास में सबसे कम उम्र में महासचिव के रुप में इन्हें नियुक्त किया गया। लेकिन 2014 के बाद जब बीजेपी की बागडोर अमित शाह के पास आई तो उनसे एक-एक कर सारे पद और जिम्मेदारियां छिन गई।

फिसलती रही है ज़ुबान

वरुण गांधी बीजेपी के एकलौते ऐसे नेता है जिनको लेकर कई बार यही सोचा जाता है कि ये कब बीजेपी से बाहर हो जाए कोई कह नहीं सकता। जिस समय अमित शाह को बीजेपी की बागडोर मिली तो उन्होंने एक-एक कर सारी जिम्मेदारियां इनसे ले ली। बात जिम्मेदारियां छिन जाने तक सीमित रहती तो समझ में आता बल्कि सांसदों के वेतन और रोहिंग्याओं की वापसी जैसे कई मुद्दों पर बाकायदा प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से हिदायत भेजी गई कि वे अपनी बयानबाजी से पार्टी की मुश्किलें न बढ़ाएं। लेकिन इसके बावज़ूद उनकी आदतों में कोई बदलाव नहीं आया। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि वरुण गांधी को कभी भी राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी के बारे में बात करते हुए नहीं सुना गया है लेकिन बीजेपी के खिलाफ़ वे हमेशा कुछ न कुछ बोलकर विवादों में फंसने की कोशिश करते रहते है।

VArun Gandhi
वरुण गांधी, फोटो सोर्स – गूगल

वर्तमान स्थिति

2014 से 2019 आते-आते काफी कुछ बदल चुका है। चाहें वो देश का राजनीतिक नज़रिया हो या फिर राजनीतिक पार्टियों के आपसी तालमेल। सिर्फ नहीं बदला है तो वरुण गांधी का बेबाक बोलना। सांसदो के वेतन को लेकर बीजेपी के खिलाफ़ बोलने वाले वरुण गांधी को इस बार के लोकसभा चुनाव में टिकट मिलता भी है या नहीं फिलहाल ये प्रश्न संशय में ही है। क्योंकि वे दिन कब के जा चुके है जब वरुण गांधी को पार्टी के भीतरी दायरे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए चार पांच लोगों में गिना जाता था। अगर किसी ज़मीनी कारणों पर गौर किया जाए तो अमेठी राजपरिवार के वारिस और असम से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद संजय सिंह की पत्नी अमीता सिंह 2014 का लोकसभा चुनाव सुल्तानपुर में वरुण गांधी के खिलाफ लड़कर, फिर 2017 का विधानसभा चुनाव संजय सिंह की पहली पत्नी और बीजेपी उम्मीदवार गरिमा सिंह के खिलाफ लड़कर हारी थीं। सुल्तानपुर के आसपास यह अपुष्ट चर्चा सुनने में आ रही है कि अपना असर बचाने के लिए संजय सिंह बीजेपी के प्रभाव क्षेत्र में जा सकते हैं।

अब देखना यह होगा कि देश के एक बड़े राजनीतिक परिवार से आया यह 40 साल से कम उम्र का एक राजनेता सिर्फ सुल्तानपुर में ही सांसद बनकर खुश रहे यह कुछ अटपटा सा लग रहा है। और अब तो जैसे संकेत मिल रहे है उससे तो यही लग रहा है कि अब तो उन्हें सुल्तानपुर से टिकट मिलना भी तय नहीं है। इस आशंका का एक और पहलू यह भी है कि बतौर सक्रिय बुद्धिजिवी और एक सफल नेता के रुप में उभरकर वरुण गांधी का बाहर आना पार्टी को सही नहीं लग रहा हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here