कोरोना हुआ, देश अस्त-व्यस्त होने लगा. व्यवस्थाएं बदलने लगीं. सुविधाएं सीमित होने लगीं. इन सब बदलते हालातों के बीच देश का एक बहुत बड़ा वर्ग इसके अनुरूप खुद को ढाल न सका. वो वर्ग था प्रवासी मजदूरों का. इस वर्ग ने जो दिन देखे, वो शायद हीं इन्होने या किसी ने भी कभी सोचा होगा. किसी ने कभी क्यों नहीं सोचा? इसपर अलग से चर्चा की जा सकती है. मजदूर हर प्रकार से कोशिश करके, तमाम तरीकों से अपने-अपने घर जाने लगें. जब यह सब कुछ शुरू हुआ तब किसी सरकार ने कुछ नहीं किया. लेकिन जब सारी बातें मिडिया में आने लगीं तो सरकारों के हाथ पाँव फूलने लगे. आनन्-फानन में सबने कुछ न कुछ व्यवस्था की. केंद्र सरकार ने ट्रेनें चलवाईं. राज्य सरकारों ने बसों की व्यवस्था की. इन्हीं सबके बीच प्रियंका गाँधी ने भी मजदूरों के लिए बसों की बात की.

लेकिन भारत में नौकरशाही और राजनीतिक लालफीताशाही की वजह से किसी के अच्छे इरादों के लिए यह कितना मुश्किल है कि उसे अच्छा काम करने दिया जाए. जाहिर है, यूपी ने प्रवासियों की मदद करने में कांग्रेस के क्रेडिट को नकारने के लिए बसों का उपयोग नहीं किया. लेकिन राज्य ने औपचारिक रूप से इसका कारण नहीं बताया; उन्होंने  कहा कि कुछ बसों के कागजात सही नहीं थे. विडंबना यह है कि केंद्रीय परिवहन मंत्री, नितिन गडकरी ने एक आदेश जारी किया था कि वाहन के कागजात और ड्राइवरों के लाइसेंस लॉकडाउन के कारण अपडेट नहीं किए जा सकते हैं और 30 जून तक इसे ठीक माना जाना चाहिए.

यह सबकुछ यहीं नहीं रुका. भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि राजस्थान ने कुछ अतिरिक्त बसों के लिए भुगतान किया है जो यूपी सरकार ने कोटा से छात्रों को लाने के लिए मांगी थी. भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट किया कि , “कोटा से छात्रों को लाने के दौरान कुछ यूपी बसों को डीजल की आवश्यकता थी. मदद तो भूल जाइए, प्रियंका वाड्रा की सरकार ने यूपी सरकार से 19 लाख रुपये के लिए आधी रात को कार्यालय खोलने पर  मजबूर किया और उसके बाद ही बसों को चलने की अनुमति दी। मदद करने का यह कैसा तरीका है! ” पात्रा ने अपने दावे को पुष्ट करने के लिए ट्वीट के साथ चेक की एक प्रति पोस्ट की.

यह इसलिए था ताकि आशुक गहलोत की सरकार की मंशा पर लोग शक कर सकें. लेकिन तथ्य पूरी तरह से अलग थे. यूपी सरकार ने अप्रैल में कोटा के लिए 150 बसें भेजीं और राजस्थान को डीजल उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, जो किया गया. इसके बाद यूपी ने राजस्थान को पत्र लिखकर डीजल का भुगतान करने का वादा किया. भुगतान 5 मई को किया गया था – पात्रा द्वारा पोस्ट किए गए चेक की तस्वीर में स्पष्ट रूप से तारीख 5 मई दिखाई गई थी.

किसी ने पात्रा को आधी रात के नाटक के बारे में एक बनी-बनाई कहानी बताने से नहीं रोका. यहां तक ​​कि उन्होंने 22 मई तक इसी कहानी को अपने अलग-अलग मैत्रीपूर्ण टीवी चैनलों पर अपने झूठे दावों के साथ बताना जारी रखा, इसके बाद राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यूपी और राजस्थान के बीच फैले इस झूठ का पर्दाफाश किया.

मीडिया में हावी रहने का भाजपा का यह जुनून इस भयानक मानवीय संकट के बीच भी कम नहीं हो रहा है. लॉकडाउन ने पार्टी को नियमित रूप से प्रेस ब्रीफिंग करने से रोका है और इसलिए पार्टी के मीडिया रणनीतिकार लोगों का ध्यान खींचने के लिए आउट-ऑफ-द-बॉक्स तरीके विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं. हाल ही में, भाजपा ने कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में अपने मंत्रियों के साथ दो फेसबुक लाइव कंडक्ट किया.

जिसमे पार्टी के प्रवक्ताओं को टीवी एंकरों की तरह मंत्रियों के साथ साक्षात्कार करना था. उनमें से एक में पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने रेल मंत्री पीयूष गोयल के साथ बातचीत की. गोयल पूरी ईमानदारी के साथ अपने कार्यालय में बैठे और प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह राज्यों में ले जाने के लिए चलाई जा रही ट्रेनों का विवरण दिया और यूपी के मुख्यमंत्री, “महाराज योगी आदित्यनाथ जी” की प्रशंसा की। दुर्भाग्य से, “आउट ऑफ द बॉक्स” कदम को मीडिया में उतना कवरेज नहीं मिला.

मिडिया में उतना कवरेज न मिलने पर पार्टी के एक मीडिया रणनीतिकार ने कहा:

तो क्या हुआ, हमारे फेसबुक लाइव को हजारों व्यूज मिले. हमारा उद्देश्य लोगों की मानसिकता पर हावी होना है और हम सफल हो रहे हैं