करकरे से गोडसे तक…प्रज्ञा ठाकुर के ‘निजी बयान’

देश लोकसभा 2019 के चुनाव के आखिरी चरण में है। 19 मई को ये तूफान थम जाएगा और 23 मई को इसका असर पता चलेगा। तूफान इसलिए क्योंकि चुनाव देश के किसी और कोने मे हो रहे है और असर पूरे भारत पर दिख रहा है। लेकिन, ऐसा हो क्यों रहा है? क्या आप बता सकते है?

आप नहीं बता पाएंगे क्योंकि आप पढ़े-लिखे जो हैं। इसलिए हमें इस सवाल के जवाब के लिए कुछ जाहिलों के पास जाना पड़ेगा। फिर उनसे पूछना पड़ेगा कि सर/मैडम आप का इस मुद्दे पर, इस सवाल पर, गुज़रे हुए वक़्त या इतिहास के इस पन्नों में दर्ज इस व्यक्ति के बारे में क्या सोचते है? क्या कहना चाहेंगे? और फिर वो कुछ बहुमूल्य ज्ञान देंगे और लगभग पूरा का पूरा मीडिया जब तक उसे आप के एक दम अंदर तक पहुंचा न दे। जब तक आप ये मान न ले कि श्रीमान या श्रीमती ने जो कहा है उसमे कुछ तो सच्चाई है। तब तक देश के हर नागरिक के मुद्दों का ख़्याल रखने वाला ये मीडिया इस मुद्दे को नहीं छोड़ेगा।

लेकिन, रुक कर सोचने की बात ये भी है कि आख़िर मीडिया और आपसे ज़्यादा पढ़े-लिखे ये लोग इन ज्वलनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़े भी क्यों? अर्थशास्त्र में एक बात कही जाती है ‘जैसी डीमांड वैसी सप्लाई और व्यापार में एक बात मानी जाती है ‘जैसा ग्राहक वैसा माल’ इन सभी बातों से हम आपको बताना चाहते हैं कि अब आप अधिकतर मीडिया के लिए उनके ग्राहक हो चुके हैं, इसलिए अगर माल अच्छा और सच्चा चाहिए तो आपको भी सप्लाई  करने वालों पर आँख बंद कर भरोसा करने की बजाय उस पर नज़र रखनी पड़ेगी।

जब नज़र रखने की बात छिड़ी है तो आपको बता दूं कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने फिर से माफी मांगते हुए अपना एक बयान वापस ले लिया है और बीजेपी ने उनके बयान से किनारा कर लिया है।

17अप्रैल 2019, वो दिन जब भोपाल की लोकसभा सीट चर्चे का विषय बन गई वो इसलिए क्योंकि देश की सबसे बड़ी राष्ट्रभक्त पार्टी ने अपनी राष्ट्रभक्त उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने का ऐलान कर दिया। अपने पहले ही बयान में राष्ट्रभक्त उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने देश भर की सुर्खियां बटोर ली। क्योंकि उन्होंने एक राज़ से पर्दा उठाते हुए बताया कि 26/11 हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे उनके दिये श्राप के कारण मारे गए थे। ये राज़ देश के सामने आया तो प्रज्ञा और बीजेपी की ख़ुद की किरकिरी हो गई। लेकिन, अभी तो ये बस शुरुआत थी, क्योंकि अभी तो बहुत से राज़ खुलने बाकी थे।

दूसरे राज़ को खोलते हुए प्रज्ञा ने कहा कि वो बाबरी मस्जिद को तोड़ने गई थी, जिस पर उन्हें गर्व नहीं, महागर्व है और राम मंदिर के बनने पर वो ख़ुद राम मंदिर बनाने जाएंगी। अब ये महागर्व क्या होता है, ये तो वो ही जाने। इस बयान पर भी उन्हें माफी मांगनी पड़ी और बीजेपी ने इससे भी किनारा कर लिया। वहीं इस बयान की वज़ह से मामला बढ़ने पर चुनाव आयोग ने भी उनके चुनाव प्रचार पर 3 दिन का बैन लगा दिया था।

गोडसे पर नेताओं का ज्ञान!

अब बात करते है एक दम ताज़ा और गर्मा-गरम बयान की। जिसकी शुरुआत अभिनेता से नेतागिरी मे आए कमल हसन ने की। हिन्दू आतंकवाद पर कमल हसन ने ये बोलते हुए मुद्दा गरमा दिया कि,

“आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि यहां पर कई सारे मुस्लिम मौजूद हैं। मैं महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने खड़े होकर यह कह रहा हूं”

अब इसी का जवाब लेने एक रिपोर्टर प्रज्ञा ठाकुर के पास पहुंच गए। प्रज्ञा ने पलटवार में फिर से एक राज़ खोल दिया कि

“नाथूराम गोडसे देशभक्त थे, देशभक्त हैं और देशभक्त रहेंगे। उन्हें हिंदू आतंकवादी बताने वाले अपने गिरेबान में झांककर देखें। अबकी बार चुनाव में ऐसे लोगों को जवाब दे दिया जाएगा”

खैर, इसका जवाब तो 23 मई को मिल ही जाएगा। लेकिन फिलहाल प्रज्ञा को अच्छे जवाब नहीं मिले हैं। जिसकी वजह से प्रज्ञा को फिर से माफी मंगनी पड़ी है।

हाल-फिलहाल में हर बार की तरह बीजेपी ने इस बयान से भी ख़ुद को अलग कर लिया है।

कमल हसन ने भी सफाई देते हुए कहा कि, हर धर्म के आतंकवादी पाए जाते हैं और कोई धर्म यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी और धर्म से बेहतर है। हालांकि, वह अपने पिछले बयान पर कायम रहते हुए धरने पर बैठ गए है। धरने पर बैठते वक़्त उन्होंने कहा कि, मैं गिरफ्तार होने से डरता नहीं हूँ, उन्हें मुझे गिरफ्तार करने दो। लेकिन, अगर वो लोग ऐसा करते है तो, यह और अधिक समस्या पैदा करेगा और यह मेरी सलाह है न कि चेतावनी। वाह! चेतावनी हो तो ऐसी।

कमल हसन का ट्वीट देख लीजिए:

आनंत हेगड़े किसका समर्थन कर रहे है? प्रज्ञा या गोडसे?

लगभग पूरा मीडिया इस ताज़े ज्ञानी मुद्दे पर भिड़ा हुआ है, जिसमें अब एक चौकीदार का ट्वीट आया है। ये पेशे से चौकीदार नहीं, बल्कि मोदी सरकार में मंत्री हैं। इन्होंने सुबह के इस ट्वीट में प्रज्ञा का साथ दिया है और जनाब बहुत खुश है। खुशी मे इनका कहना है कि,

“मैं खुश हूं कि करीब 7 दशक के बाद आज की पीढ़ी नए बदलाव के साथ इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है। इस चर्चा को सुन आज नाथूराम गोडसे अच्छा महसूस कर रहे होंगे”

असली सलाह ये होती है जो हेगड़े ने प्रज्ञा को दी है कि,

“यह समय मुखर होने और बयान पर शर्मिंदा न होने का है”

अच्छा जब विवाद ने तूल पकड़ा तो हेगड़े ने ट्वीट कर जानकारी दी कि उनका अकाउंट हैक हो गया था, शायद ‘नेहरू ने कर लिया होगा’ (काफी पुराना, आउट डेटेड बहाना नहीं हो गया ये?)

लेकिन एक बात सोचने वाली है कि जिस बात पर पीएम मोदी के मंत्री सहमत हैं। उस पर पीएम साहब ख़ुद बड़े नाराज़ दिखे।

उन्होंने एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा कि,

“गांधी और गोडसे के संबंध भयंकर खराब है, हर प्रकार घृणा के लायक है, आलोचना के लायक है, सभ्य समाज में ऐसी बातें नहीं कही जा सकती हैं। ऐसा कहने वालों को आगे से 100 बार सोचना पड़ेगा। उन्होंने भले ही माफी मांग ली हो लेकिन मैं दिल से कभी उन्हें माफ नहीं कर पाऊंगा”

इस बयान का राजनीतिक मतलब समझ लीजिए क्योंकि यही वो पीएम मोदी हैं, जिन्होंने प्रज्ञा के बीजेपी उम्मीदवार बनाए जाने के हंगामे पर ये कहा था कि, प्रज्ञा का ऐलान ही हिन्दू आतंकवाद के खात्मे के मकसद से किया गया है।

कमल खिलाते हुये मोदी जी, फोटो सोर्स- गूगल

अब मोदी क्यों कह रहे है कि वो प्रज्ञा को कभी दिल से माफ नहीं कर पाएंगे। इसलिए क्योंकि वक़्त ने फिर से ख़ुद को दोहराया है। ये असल मे नाराज़गी नहीं, बल्कि कुर्सी खिसक जाने का डर है। मणिशंकर अय्यर का वो बयान याद है आपको, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी को ‘नीच’ कह दिया था और कांग्रेस के लाख इस बयान से किनारा करने और अय्यर पर कार्यवाही करने के बावजूद कांग्रेस गुजरात की कुर्सी हार गई थी। ऐसा ही कुछ अब बीजेपी के साथ हो रहा है, तभी तो एक के बाद एक बीजेपी के बड़े नेता हो या बीजेपी के अध्यक्ष और ख़ुद मोदी तक अब नाराज़ हो गए है। वो कहते है न ‘हमाम में सब नंगे हैं’ चाहे बीजेपी हो, कांग्रेस हो या कोई और पार्टी।

अब आप बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बयान जान लीजिए, सारा खेल आपको खुद-ब-खुद समझ में आ जाएगा। इस पूरे मामले पर बवाल बढ़ता देख अमित शाह ने आज कहा कि,

“पिछले 2 दिनों में अनंतकुमार हेगड़े, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और नलीन कटील के जो बयान आए हैं वो उनके निजी बयान हैं, उन बयानों से बीजेपी का कोई संबंध नहीं है। इन लोगों ने अपने बयान वापस लिए हैं और माफी भी मांगी है। फिर भी सार्वजनिक जीवन और बीजेपी की गरिमा और विचारधारा के विपरीत इन बयानों को पार्टी ने गंभीरता से लेकर तीनों बयानों को अनुशासन समिति को भेजने का निर्णय किया है। अनुशासन समिति तीनों नेताओं से जवाब मांगकर उसकी एक रिपोर्ट 10 दिन के अंदर पार्टी को दे, इस तरह की सूचना दी गई है”

अमित शाह के इस बयान में जिस नलीन कटील का ज़िक्र है। वो कर्नाटक की दक्षिण कन्नड़ सीट से बीजेपी सांसद है। नलीन कटील ने 1984 के सिख दंगों का हवाला देते हुए ट्विटर पर लिखा कि नाथूराम गोडसे ने तो एक व्यक्ति को ही मारा, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो 17 हजार लोगों को मारा। हालांकि, जब विवाद बढ़ा तो नलीन ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

अब जब आपने पूरा मामला जान लिया है। तो अब ये सोचिए कि आखिर ये सब देश मे चल क्या रहा है? मतलब चुनाव चल रहा है या चुनाव की आड़ में हर कोई अपना-अपना मुद्दा साफ कर रहा है। जिस देश में रोज़गार, इकॉनमी, हर बड़ी सरकारी संस्था, शिक्षा, स्वास्थय, गरीबी, साफ पानी, यहां तक न्यायपालिका पर सेंध लगने जैसे बड़े-बड़े और ज़रूरी मुद्दे हों। उस देश के प्रधानमंत्री से लेकर हर छोटे से छोटा नेता सिर्फ अपनी ही बातें कहने मे लगा है। जहां मीडिया भी बंट चुकी है। मानो हर कोई या तो इधर की बात कर रहा है या उधर की। जनता की बातें और मुद्दे जिन प्रतिनिधितियों को राज्यों की विधान सभा और देश की लोकसभा मे उठाने चाहिए। उन्हें तो अपने मुद्दे उठाने से ही फुर्सत नहीं!

ये भी कितना मज़ेदार चल रहा है न कि, किसी भी पार्टी का कोई नेता या उम्मीदवार बेतुके बयान देता रहे। फिर अगर विवाद बढ़ जाए, चुनाव हारने या वोटर की नाराजगी का डर सताने लगे। तो उस बयान को अपनी पार्टी की विचारधारा से अलग कर किनारा कर लो। बोलने वाले का या तो ट्वीटर अकाउंट हैक हो जाता है या वो खुद डिलीट कर देता है। तरह-तरह की सफाई देते रहो जब तक की मामला ठंडा न हो जाए या मीडिया कोई और मुद्दा न मिल जाए। फिर अगर वही उम्मीदवार जीत जाए तो उसे पार्टी का हीरो बताने लग जाओ। देश का आने वाला एक बड़ा नेता बताने लग जाओ, फिर चाहे वो कोई भी पार्टी हों।

अरे हाँ, आखिर में ये भी जान लीजिए कि प्रज्ञा ने माफी मांगते हुए ये बात भी साफ कर दी है कि, “मैं अपने संगठन भाजपा में निष्ठा रखती हूं, उसकी कार्यकर्ता हूं और पार्टी की लाइन, मेरी लाइन है।”

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