‘किसने सोचा था ये दिन भी आएगा’

आज की दौड़ती भागती ज़िंदगी में जहां हर चीज़ अपनी रफ्तार से ज़्यादा स्पीड पकड़ने की कोशिश कर रही है। वहीं, हमारे देश में एक सेवा ऐसी भी है जिसकी गारंटी बिलकुल नेताओं के वादे की तरह है और सरकारी कामों की तरह हमेशा लेट ही चलती है। वैसे तो ये देश की सबसे बड़ी सेवाओं मे से एक है। लेकिन फिर भी इसकी तबीयत अलग-अलग वजहों से कुछ ठीक नहीं रहती। वज़ह तो हम बता ही देंगे लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए कि आज का मुद्दा गमगीन नहीं, संवेदनशील है। संवेदनशील इसलिए क्योंकि दिल्ली रेलवे मंडल ने फैसला ही कुछ ऐसा लिया है। हालांकि, यात्रियों के लिए ये राहत की बात है।

फैसला और उसकी वज़ह जान लीजिए!

वजह तो एकदम आम है लेकिन, फैसला एक दम मज़ेदार और ख़ास। वजह ये है जो अक्सर आपने सुनी होगी कि ट्रेन लेट है, पता नहीं कब तक आएगी और आएगी भी या नहीं, पता नहीं। लेकिन ऐसा होता क्यों है? वैसे तो बहुत सी वजह है। लेकिन जिस वजह के खात्मे के लिए फ़ैसला लिया है। वो है रेलवे क्रॉसिंग पर भारी ट्रैफिक का होना। जिसकी वजह से अक्सर ट्रेने लेट हो जाती है। ऐसा नहीं है कि रेल्वे क्रॉसिंग पर कोई इस चीज़ को कंट्रोल करने के लिए तैनात नहीं होता।

रेलवे क्रॉसिंग पर आरपीएफ़ के कुछ जवान तैनात तो रहते है, लेकिन इनसे कंट्रोल नहीं होता। न ट्रैफिक, न रेलवे फाटक खुलने के बाद आते-जाते लोग। ट्रैफिक नियमों का खयाल किए बस सबको अपनी मंज़िल को जाना है। कुछ तो ऐसे होते है मानो ट्रक ड्राईवर न हो गए बड़े साहब के छोटे गुंडे हो गए। ऐसे ही खलिहर लोगों से निपटने और उनसे ट्रैफिक नियमों का पालन करवाने के लिए दिल्ली रेलवे मंडल ने एक अत्याधुनिक फैसला लिया है।

रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेफिक (प्रतीकात्मक तस्वीर),फोटो सोर्स- गूगल

अत्याधुनिक फैसला ये है कि अब ऐसे रेलवे क्रॉसिंग, जहां बहुत अधिक ट्रैफिक होता है। एक बार गेट खुलने पर बंद करना मुश्किल हो जाता है। और तमाम ऐसी वजहों से ट्रेने काफी लेट हो जाती हैं। ऐसे संवेदनशील रेलवे क्रॉसिंग्स पर अब आरपीएफ़ की जगह बाउंसर तैनात होंगे। फिलहाल राजधानी में ऐसे 5 ही संवेदनशील रेलवे क्रॉसिंग है। दिल्ली मंडल के सभी 5 संवेदनशील रेलवे क्रॉसिंग पर आरपीएफ को हटाकर उनकी जगह बाउंसर(मार्शल) तैनात किए जा रहे हैं।

इन क्रॉसिंग पर एक शिफ्ट में चार बाउंसर मुस्तैद रहेंगे और यह टू-इन-वन काम करेंगे। मतलब दोनों तरफ के ट्रैफिक मैनेजमेंट करने के साथ-साथ ट्रेन के आने-जाने पर फाटक बंद करना भी इन्हीं के ज़िम्मे होगा। इस फैसले पर दिल्ली मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “रेलवे क्रॉसिंगों पर वाहनों की संख्या अधिक होने के चलते ट्रेन को चलाना बेहद मुश्किल हो रहा है”  वैसे भी सरकारी सिस्टम को चलाना और खुद उसमे चल पाना आसान कहा होता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

वैसे इन साहब कि मुश्किलों में जिन रेलवे क्रॉसिंग्स का ज़िक्र है। उनमें से दिल्ली रोहतक रोड पर घेवरा और नांगलोई दिल्ली-सोनीपत रूट पर नरेला-बादली के बीच तीन रेलवे क्रॉसिंग ऐसी हैं। जहां सच में काफी ट्रैफिक होता है और ये क्रॉसिंग्स ऐसी है कि एक बार खुल जाए तो ट्रेनो को वक़्त पर जाने नहीं देती।

वैसे इन रेलवे स्टेशनों पर एक और ऐसी सुविधा दी जा रही है जो आपने, राजीव चौक और केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशनों पर लगी देखी होंगी। इस सुविधा से जहां आपको फ़ायदा पहुंचेगा, वहीं रेलवे को भी कमाई हो जाएगी। वो ऐसे कि रेलवे प्रशासन ने रेलवे स्टेशन पर बड़े डिस्प्ले लगाने का फैसला लिया है। क्योंकि रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद ट्रेन की जानकारी के लिए छोटे डिस्प्ले बोर्ड परेशानी का सबब बनते हैं। यह योजना पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत चलेगी। जिसमें रेलवे स्टेशनों पर मेट्रो स्टेशनों के तर्ज पर वीडियो वॉल लगाई जाएगी। जहां वीडियो वॉल से एक तरफ यात्रियों को जानकारी मिलेगी। वहीं रेलवे इस पर विज्ञापन दिखा कर हर माह 20 लाख रुपए की आमदनी कर लेगा।

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राजीव चौक मेट्रो स्टेशन, फोटो सोर्स- गूगल

इस वीडियो वॉल पर पैसेंजर ट्रेनों से जुड़ी लगभग सभी जानकारी आपको दिख जाएगी। जैसे स्टेशन पर आने-जाने वाली ट्रेनों के नाम, प्लेटफॉर्म नंबर वगैरह।

दिल्ली डिवीजन के एक अधिकारी के अनुसार,

“हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर वीडियो वॉल लगाने का काम शुरू हो गया है। बाद में इसे नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली, आनंद विहार रेलवे स्टेशनों पर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप योजना के तहत वीडियो वॉल को लगाया जाएगा। वीडियो वॉल पर 70% ट्रेनों की जानकारी और 30% कमर्शियल विज्ञापन दिखाए जाएंगे। ऐसे वीडियो वॉल राजीव चौक और केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशनों पर लगी हैं”

वैसे रेलवे क्रॉसिंग पर आरपीएफ़ की जगह बाउंसर तैनात करना एक अच्छा फैसला साबित हो सकता है। लेकिन, शायद इससे अच्छा ये होता कि आरपीएफ़ को ही इस सिचुएशन से निपटने के लिए तैयार किया जाता। ट्रेनिंग दी जाती। लेकिन खैर जाने दीजिए सरकारी अफसरों को ‘सलाह देना भी भैंस के आगे बीन बजाने से कम थोड़ी है’

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